प्र1.
मनुष्य वृत्ताकार आकृतियों का इतना अधिक उपयोग क्यों करते थे? क्या यह केवल व्यावहारिक कारणों से था अथवा इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते थे? मनुष्य ने वृत्ताकार आकृतियों के लिए किस प्रकार की वस्तुएँ अन्वेषित की हैं?
उत्तर
दोनों कारण हैं। वृत्त सबसे मितव्ययी आकृति है, और वही आकृति मनुष्य को सबसे अर्थपूर्ण भी लगी है।
व्यावहारिक कारण।
- दिए गए परिमाप में सबसे अधिक क्षेत्रफल। दी गई लंबाई की मिट्टी या फूस की दीवार वृत्ताकार झोपड़ी में किसी भी अन्य आकृति से अधिक फ़र्श घेरती है — यही समपरिमापी गुण है। वृत्ताकार कोठी या गाँव की परिधि-दीवार पर भी यही तर्क लागू होता है।
- बनाना सबसे सरल। एक खूँटा, एक रस्सी और एक छड़ी पर्याप्त हैं। न मापन, न समकोण, न कोई सर्वेक्षण उपकरण — इसीलिए वृत्ताकार योजनाएँ हर प्राचीन संस्कृति में स्वतंत्र रूप से मिलती हैं।
- यह लुढ़कता है। परिधि का प्रत्येक बिंदु केंद्र से समान दूरी पर है, अतः धुरी पर लगा पहिया स्थिर ऊँचाई बनाए रखता है। कुम्हार का चाक, गाड़ी का पहिया, चक्की और घिरनी — सब इसी एक गुण पर टिके हैं।
- कोई कोना नहीं जो कमज़ोर पड़े या जहाँ से ऊष्मा निकले, और किसी भी दिशा से आया दाब चारों ओर बराबर बँट जाता है। इसीलिए कुएँ, मेहराब, घड़े और तंबू की दीवारें वृत्ताकार होती हैं।
अन्य कारण।
- आकाश जो दिखाता है। सूर्य और पूर्णिमा का चंद्रमा चक्रिकाएँ हैं, क्षितिज एक वृत्त है और तारे वृत्तों में घूमते हैं। वृत्ताकार प्रतीक इसी से जन्मे।
- सममिति और समानता। वृत्त हर दिशा से एक जैसा दिखता है और उसमें कोई "प्रधान स्थान" नहीं होता। बातचीत के लिए घेरे में बैठना, गरबा या बिहू का घेरा, रंगोली, चक्र, मंडल — आकृति स्वयं यह कहती है कि कोई स्थान विशेष नहीं है।
ऐसा क्यों होता है: व्यावहारिक और प्रतीकात्मक — दोनों कारण एक ही गणित के दो रूप हैं। दोनों वृत्त के परिभाषक गुण से निकलते हैं — वृत्त का प्रत्येक बिंदु केंद्र से समान दूरी पर होता है। इसी एक तथ्य से अधिकतम घिरा क्षेत्रफल, लुढ़कने पर स्थिर ऊँचाई, दाब का समान बँटवारा और वह पूर्ण घूर्णन सममिति निकलती है जिसे लोग संतुलन और पूर्णता के रूप में पढ़ते हैं।