(i) आँकड़ों से —
प्रायोगिक P(3) = 3 आने की संख्या / कुल फेंक
= 3/12
= 1/4 = 0.25 अथवा 25%
(ii) निष्पक्ष पासे की सममिति से —
S = {1, 2, 3, 4, 5, 6}, n(S) = 6; अनुकूल = {3}, n = 1
सैद्धांतिक P(3) = 1/6 = 0.1666… ≈ 0.167 अथवा 16.7%
(iii) भिन्नता इसलिए है कि 12 फेंक बहुत छोटी शृंखला है। 12 फेंकों में 3 आने की अपेक्षित संख्या 12 × 1/6 = 2 है, और 2 के स्थान पर 3 आ जाना एक साधारण उतार-चढ़ाव है — केवल एक अतिरिक्त 3 भिन्न को 0.167 से 0.25 तक पहुँचा देता है, क्योंकि हर इतना छोटा है।
ऐसा क्यों होता है: प्रायोगिक प्रायिकता एक ऐसी भिन्न है जिसका हर परीक्षणों की संख्या है। हर जितना बढ़ता है, कोई एक अप्रत्याशित परिणाम भिन्न को उतना ही कम हिलाता है, अतः मान स्थिर होता जाता है। यही बृहत् संख्याओं का नियम है — परीक्षण बढ़ने पर प्रायोगिक प्रायिकता 1/6 की ओर बढ़ती है। ध्यान दीजिए कि यह क्या नहीं कहता — यह कभी नहीं कहता कि गिनतियाँ बराबर हो जाएँगी, केवल यह कि अनुपात स्थिर होता जाएगा।
संकेत: यदि 6000 फेंकों के बाद भी लगभग 0.25 ही मिले तो उचित निष्कर्ष यह नहीं होगा कि "नियम विफल हो गया", अपितु यह कि "यह पासा निष्पक्ष नहीं है"। किसी मान्यता की जाँच के लिए प्रायोगिक प्रायिकता का उपयोग इसी प्रकार होता है।