कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 अव्ययीभावसमासः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं — नाम का अर्थ, पहचान और लिङ्ग-वचन का नियम क्या है?
उत्तर

पुस्तक की परिभाषा (पृष्ठ 175) —

पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावसमासः। अनव्ययम् अव्ययं भवति इति अव्ययीभावः।
अव्ययीभावसमासस्य भेदाः प्रायः त्रयस्त्रिंशत् सन्ति। तेषु केचन प्रसिद्धाः भेदाः एव अत्र प्रदर्शिताः।

हिन्दी अर्थ — जिसमें पूर्वपद का अर्थ प्रधान हो, वह अव्ययीभाव है। नाम का अर्थ है — ‘जो अव्यय नहीं था, वह अव्यय बन जाता है’। पुस्तक बताती है कि इसके लगभग तैंतीस भेद होते हैं; यहाँ केवल कुछ प्रसिद्ध भेद ही दिखाए गए हैं (तालिका में बीस)।

प्रश्नअव्ययीभाव में उत्तर
प्रधान पद कौन ?पूर्वपद — जो प्रायः अव्यय या उपसर्ग है (उप, निर्, अनु, प्रति, यथा, आ, अभि, स, अधि, सु, अति, पारे, मध्ये)
समस्तपद का लिङ्ग-वचन ?सदा नपुंसकलिङ्ग, एकवचन — और वह पूरा पद अव्यय बन जाता है, अतः रूप कभी नहीं बदलता
विग्रह किस प्रकार का ?प्रायः अस्वपदविग्रह — अव्यय का अर्थ खोलने के लिए बाहर से शब्द लाना पड़ता है (उप → समीपे, निर् → अभावः)
पहचान का सबसे सरल चिह्न ?समस्तपद प्रायः ‘-म्’ पर समाप्त होता है और वाक्य में क्रियाविशेषण की तरह काम करता है — उपनगरम्, प्रतिदिनम्, यथाशक्ति
‘अनव्ययम् अव्ययं भवति’ का अर्थ खोलिए: ‘नगर’ अव्यय नहीं है — उसके राम-रूप बनते हैं (नगरम्, नगरस्य, नगरे…)। पर ‘उप’ के साथ जुड़ते ही ‘उपनगरम्’ बन गया, और अब इसका कोई और रूप नहीं बनेगा — यह जम गया, अव्यय हो गया। जो अव्यय नहीं था, वह अव्यय बन गया — यही नाम का पूरा अर्थ है।
तत्पुरुष से भ्रम न कीजिए: ‘उपनगरम्’ में पूर्वपद ‘उप’ प्रधान है (अव्ययीभाव), पर ‘प्राचार्यः’ में पूर्वपद ‘प्र’ होते हुए भी प्रधान ‘आचार्य’ है (प्रादितत्पुरुष)। अन्तर यह है कि अव्ययीभाव में समस्तपद अव्यय बन जाता है और नपुंसक एकवचन में जम जाता है; प्रादितत्पुरुष में वह सामान्य नाम-पद बना रहता है और उसके सब रूप चलते हैं।
प्र२.
अव्ययीभाव के भेदों की पुस्तक की पूरी तालिका दीजिए — सभी बीस।
उत्तर

पुस्तक की तालिका, पूरी, ज्यों-की-त्यों (पृष्ठ 175–176) —

क्र.सं.समासनामविग्रहःसमासः (समस्तपदम्)
१.समीपार्थे अव्ययीभावःग्रामस्य समीपेउपग्रामम्
२.अभावार्थे अव्ययीभावःमशकानाम् अभावःनिर्मशकम्
३.योग्यतार्थे अव्ययीभावःरूपस्य योग्यम्अनुरूपम्
४.वीप्सार्थे अव्ययीभावःदिने दिनेप्रतिदिनम्
५.पदार्थ-अनतिवृत्त्यर्थे अव्ययीभावःशक्तिम् अनतिक्रम्ययथाशक्ति
६.मर्यादार्थे अव्ययीभावःआ मुक्तेःआमुक्ति (संसारः)
७.अभिविध्यर्थे अव्ययीभावःआ बालेभ्यःआबालम् (हरिभक्तिः)
८.आभिमुख्यार्थे अव्ययीभावःअग्निम् अभिअभ्यग्नि
९.मात्रार्थे अव्ययीभावःशाकस्य लेशःशाकप्रति
१०.अवधारणार्थे अव्ययीभावःयावन्तः श्लोकाःयावच्छलोकम् (अच्युतप्रणामाः)
११.पारेशब्दयुक्तः अव्ययीभावःपारे समुद्रस्यपारेसमुद्रम्
१२.मध्येशब्दयुक्तः अव्ययीभावःमध्ये गङ्गायाःमध्येगङ्गम्
१३.सादृश्यार्थे अव्ययीभावःसख्या सदृशःससखि
१४.सम्पत्त्यर्थे अव्ययीभावःक्षत्राणां सम्पत्तिःसक्षत्रम्
१५.साकल्यार्थे अव्ययीभावःतृणमपि अपरित्यज्यसतृणम्
१६.पश्चादर्थे अव्ययीभावःरामस्य पश्चात्अनुरामम्
१७.विभक्त्यर्थे अव्ययीभावःविद्यालये इतिअधिविद्यालयम्
१८.समृद्ध्यर्थे अव्ययीभावःधान्यानां समृद्धिःसुधान्यम्
१९.असम्प्रत्यर्थे अव्ययीभावःनिद्रा सम्प्रति न युज्यतेअतिनिद्रम्
२०.आनुपूर्व्यार्थे अव्ययीभावःज्येष्ठस्य आनुपूर्व्येणअनुज्येष्ठम्

पूर्वपद के अनुसार वही तालिका, याद रखने के लिए —

पूर्वपद (अव्यय)किन अर्थों मेंउदाहरण
उपसमीपताउपग्रामम् (गाँव के पास)
निर्अभावनिर्मशकम् (मच्छरों का अभाव)
अनुयोग्यता · पश्चात् · आनुपूर्व्यअनुरूपम्, अनुरामम्, अनुज्येष्ठम्
प्रतिवीप्सा (बार-बार) · मात्रा (थोड़ा)प्रतिदिनम्, शाकप्रति
यथाअनतिक्रम (उल्लंघन न करना)यथाशक्ति
मर्यादा (तक, उससे पहले) · अभिविधि (सहित, समेत)आमुक्ति, आबालम्
अभिआभिमुख्य (सामने)अभ्यग्नि (आग के सामने)
पारे · मध्येपार · बीचपारेसमुद्रम्, मध्येगङ्गम्
सादृश्य · सम्पत्ति · साकल्यससखि, सक्षत्रम्, सतृणम्
अधिविभक्ति-अर्थ (अधिकरण)अधिविद्यालयम्
सुसमृद्धिसुधान्यम्
अतिअसम्प्रति (अब उचित नहीं)अतिनिद्रम्
छपाई पर एक टिप्पणी: भेद १० में पुस्तक ने समस्तपद ‘यावच्छलोकम्’ छापा है। ‘यावत् + श्लोक’ की सन्धि से मानक रूप ‘यावच्छ्लोकम्’ बनता है (छ् + ल् का संयुक्त वर्ण)। यह मुद्रण की चूक जान पड़ती है; ऊपर तालिका में पुस्तक का ही पाठ रखा गया है, पर लिखते समय यावच्छ्लोकम् लिखिए।
कोष्ठक के शब्द किसलिए हैं: भेद ६, ७ और १० में कोष्ठक में एक शब्द दिया है — (संसारः), (हरिभक्तिः), (अच्युतप्रणामाः)। ये प्रयोग-वाक्य के शेष अंश हैं, जिनसे अर्थ पूरा होता है : ‘आमुक्ति संसारः’ = मुक्ति तक संसार है; ‘आबालं हरिभक्तिः’ = बच्चों तक (सब में) हरि-भक्ति है; ‘यावच्छ्लोकम् अच्युतप्रणामाः’ = जितने श्लोक, उतने प्रणाम। अव्ययीभाव अकेला खड़ा नहीं होता — वह किसी बात का विशेषण या क्रियाविशेषण बनकर आता है।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — अव्ययीभाव
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। केवल स्वयं जाँच के लिए, उत्तर सहित।

(क) विग्रह कीजिए —

समस्तपदम्विग्रहःअर्थ
प्रतिवर्षम्वर्षे वर्षेहर वर्ष (वीप्सा)
यथामतिमतिम् अनतिक्रम्यबुद्धि के अनुसार
उपकूलम्कूलस्य समीपेकिनारे के पास
निर्भयम्भयस्य अभावःभय का अभाव
आजन्मआ जन्मनःजन्म से लेकर (मर्यादा)
अधिहरिहरौ इतिहरि के विषय में (विभक्त्यर्थ)
अनुगङ्गम्गङ्गायाः पश्चात् / गङ्गाम् अनुगंगा के किनारे-किनारे
यथाविधिविधिम् अनतिक्रम्यविधि के अनुसार

(ख) पहचानिए — नीचे के पद अव्ययीभाव हैं या नहीं ?

१. प्रतिदिनम् — हाँ, अव्ययीभाव (वीप्सार्थ)।
२. प्राचार्यः — नहीं; यह प्रादितत्पुरुष है, क्योंकि प्रधान ‘आचार्य’ है और पद के सब रूप चलते हैं।
३. निष्कृपः — नहीं; यह प्रादिबहुव्रीहि है (निर्गता कृपा यस्मात् सः) — प्रधान वह व्यक्ति है।
४. निर्मशकम् — हाँ, अव्ययीभाव (अभावार्थ) — यहाँ प्रधान ‘अभाव’ अर्थात् पूर्वपद ‘निर्’ है।
५. सशिष्यः — नहीं; यह सहपूर्वपद बहुव्रीहि है (शिष्येण सह वर्तते इति) — प्रधान वह गुरु है।
६. सतृणम् — हाँ, अव्ययीभाव (साकल्यार्थ) — तिनके तक को न छोड़कर, अर्थात् सब कुछ सहित।

‘निष्कृपः’ और ‘निर्मशकम्’ में अन्तर ही पूरी कहानी है: दोनों का पूर्वपद ‘निर्’ है, पर ‘निष्कृपः’ में प्रधान वह निर्दय व्यक्ति है जो समास में लिखा ही नहीं — इसलिए बहुव्रीहि। ‘निर्मशकम्’ में प्रधान अभाव ही है, अर्थात् पूर्वपद का अर्थ — इसलिए अव्ययीभाव। साथ ही ‘निष्कृपः’ के सब विभक्ति-रूप बनते हैं, ‘निर्मशकम्’ जमा हुआ अव्यय है। प्रधान कौन — यही एक प्रश्न हर बार बचाता है।
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