कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 पूरे परिशिष्ट का सार के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
चारों समास एक दृष्टि में — तुलनात्मक तालिका दीजिए।
उत्तर
समासप्रधान पदविग्रह में क्या आता हैसमस्तपद का स्वभावउदाहरण
अव्ययीभावःपूर्वपद (अव्यय)समीपे · अभावः · अनतिक्रम्य · दिने दिनेनपुंसक, एकवचन, अव्यय — रूप नहीं बदलताउपनगरम्, यथाशक्ति, प्रतिदिनम्
तत्पुरुषःउत्तरपदपूर्वपद पर कोई विभक्ति (द्वितीया–सप्तमी)लिङ्ग-वचन उत्तरपद के अनुसाररामदूतः, वृक्षमूलम्, कार्यकुशलः
  • कर्मधारयःउत्तरपददोनों पद एक ही विभक्ति में; इव / एव / इतिवहीनीलमेघः, मेघश्यामः, आम्रवृक्षः
  • द्विगुःउत्तरपदपूर्वपद संख्यावाची; ‘समाहारः’प्रायः स्त्रीलिङ्ग या नपुंसक एकवचनत्रिलोकी, पञ्चवटी
  • नञ्-प्रभृतिःउत्तरपदपूर्वपद अ / कु / प्र / अति / निर् आदिवहीअधर्मः, कुपुत्रः, कुम्भकारः
द्वन्द्वःदोनों (सब) पदप्रत्येक पद के बाद ‘च’इतरेतर — द्वि/बहुवचन · समाहार — नपुंसक एकवचनरामकृष्णौ, धर्मार्थकाममोक्षाः, पाणिपादम्
बहुव्रीहिःअन्यपद (बाहर का)अन्त में यस्य / येन / यस्मै / यस्मात् / यस्मिन् / यं … सःपूरा समास विशेषण बन जाता हैपीताम्बरः, चक्रपाणिः, दशाननः
एक पंक्ति में चारों —
पूर्वपद प्रधान → अव्ययीभाव  ·  उत्तरपद प्रधान → तत्पुरुष
दोनों प्रधान → द्वन्द्व  ·  अन्यपद प्रधान → बहुव्रीहि
यह तालिका ही पूरा परिशिष्ट है: पृष्ठ 171 से 176 तक की सारी तालिकाएँ इन्हीं चार पंक्तियों के उपभेद हैं। परीक्षा से पहले यदि केवल यही एक तालिका याद रह जाए, तो अधिकांश प्रश्न हल हो जाएँगे — शेष केवल अभ्यास की बात है।
प्र२.
समास का प्रश्न हल करने की चरणबद्ध विधि क्या है, और छात्र कौन-सी भूलें सबसे अधिक करते हैं?
उत्तर

चरणबद्ध विधि —

चरणक्या कीजिएउदाहरण — ‘चन्द्रशेखरः’
पद को पूर्वपद + उत्तरपद में तोड़िएचन्द्र + शेखर
सम्भव हो तो पद के साथ एक क्रियापद जोड़कर वाक्य बना लीजिएचन्द्रशेखरः प्रसीदतु।
पूछिए — क्रिया का सीधा सम्बन्ध किससे?न चन्द्र से, न शेखर से — शिव से
उसी के अनुसार विग्रह लिखिएचन्द्रः शेखरे यस्य सः
विग्रह में आए शब्द या विभक्ति से भेद का नाम निकालिए‘यस्य सः’ आया → बहुव्रीहि; दोनों पदों की विभक्ति अलग → व्यधिकरण
बहुव्रीहि हो तो अन्यपद कोष्ठक में अवश्य लिखिए(शिवः)

सबसे अधिक होने वाली भूलें —

भूलक्यों होती हैबचाव
कर्मधारय को बहुव्रीहि लिख देना (या उलटा)पद एक जैसा दिखता है — पीताम्बरम् / पीताम्बरःविग्रह में ‘यस्य सः’ आया या नहीं — बस यही देखिए
विग्रह में विभक्ति गलत लगानाअर्थ सोचे बिना अनुमान सेपहले हिन्दी अर्थ बोलिए — ‘का / से / के लिए / में’ — वही विभक्ति है
द्वन्द्व में वचन गलतइतरेतर और समाहार का अन्तर नहीं जानाअलग-अलग गिने जाएँ → द्वि/बहुवचन; समूह हो → नपुंसक एकवचन
अव्ययीभाव को प्रादितत्पुरुष लिख देनादोनों में पूर्वपद उपसर्ग हैसमस्तपद के रूप चलते हैं या जमा हुआ है — यह देखिए
बहुव्रीहि में अन्यपद न लिखनाविग्रह ‘यस्य सः’ पर छोड़ देना‘सः’ कौन है — (विष्णुः), (शिवः), (रावणः) — अवश्य लिखिए
समास और सन्धि में भ्रमदोनों में पद जुड़ते दिखते हैंविभक्ति लुप्त हुई तो समास; केवल वर्ण मिले तो सन्धि
उत्तर लिखने का ढाँचा (परीक्षा में): «समस्तपदम् — विग्रहः — समासस्य नाम — (अन्यपदार्थः, यदि बहुव्रीहि हो)»। जैसे — ‘लम्बोदरः — लम्बम् उदरं यस्य सः — षष्ठ्यर्थबहुव्रीहिः — (गणेशः)।’ तीनों-चारों अंश लिखने पर पूरे अंक मिलते हैं।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — मिश्रित
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। शारदा का परिशिष्टम् २ केवल नियम और तालिकाएँ देता है, कोई अभ्यास नहीं देता। नीचे के पद और उत्तर केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले उत्तर ढँककर स्वयं लिखिए, फिर मिलाइए।

(क) विग्रह कीजिए तथा समास का नाम लिखिए —

समस्तपदम्विग्रहःसमासस्य नाम
राजपुरुषःराज्ञः पुरुषःषष्ठीतत्पुरुषः
नीलोत्पलम्नीलम् उत्पलम्कर्मधारयः (विशेषणपूर्वपदः)
त्रिफलात्रयाणां फलानां समाहारःसमाहारद्विगुः
अनश्वःन अश्वःनञ्-तत्पुरुषः
शीतोष्णम्शीतम् उष्णम्कर्मधारयः (विशेषणोभयपदः) — पुस्तक की तालिका के अनुसार (यदि विग्रह ‘शीतं च उष्णं च’ किया जाए तो वही पद समाहारद्वन्द्व भी बनता है; पुस्तक ने इसे कर्मधारय में रखा है)
विद्याधनम्विद्या एव धनम्कर्मधारयः (अवधारणापूर्वपदः)
गजाननःगजस्य आननम् इव आननं यस्य सःउपमानपूर्वपदः बहुव्रीहिः — (गणेशः)
यथाशक्तिशक्तिम् अनतिक्रम्यअव्ययीभावः (पदार्थ-अनतिवृत्त्यर्थे)
कुम्भकारःकुम्भं करोति इतिउपपदतत्पुरुषः
देशान्तरम्अन्यः देशःकर्मधारयः (मयूरव्यंसकादिः)

(ख) विग्रह से समस्तपद बनाइए —

१. नखैः भिन्नः = नखभिन्नः  ·  २. संज्ञा च परिभाषा च = संज्ञापरिभाषम्  ·  ३. दश आननानि यस्य सः = दशाननः  ·  ४. दिने दिने = प्रतिदिनम्  ·  ५. षण्णां मातॄणाम् अपत्यम् = षाण्मातुरः  ·  ६. द्वौ वा त्रयो वा = द्वित्राः  ·  ७. मशकानाम् अभावः = निर्मशकम्  ·  ८. कार्ये कुशलः = कार्यकुशलः

(ग) सोचिए और उत्तर दीजिए —

१. ‘भूतपूर्वः’ को किस समास में रखेंगे और क्यों ?
उत्तर — केवलसमास में। विग्रह है ‘पूर्वं भूतः’, पर समास में क्रम उलट गया — इसीलिए इसे तत्पुरुषादि कोई विशेष नाम नहीं मिलता, केवल ‘समास’ संज्ञा मिलती है। पुस्तक ने पृष्ठ 169 पर यही उदाहरण दिया है।

२. समास और सन्धि में तीन अन्तर बताइए।
उत्तर — (क) सन्धि में वर्ण मिलते हैं, समास में पद। (ख) सन्धि में विभक्ति नहीं जाती, समास में भीतर की विभक्तियाँ लुप्त हो जाती हैं। (ग) सन्धि खोलने को विच्छेद कहते हैं, समास खोलने को विग्रह

३. ‘नित्यसमास’ में स्वपदविग्रह क्यों नहीं हो सकता ?
उत्तर — क्योंकि उसका पूर्वपद अव्यय होता है, जिसका अपना कोई विभक्ति-रूप नहीं बनता। उसका अर्थ खोलने के लिए बाहर से पद लाना ही पड़ता है — ‘यथाशक्ति’ का विग्रह ‘शक्तिम् अनतिक्रम्य’ है, और ‘अनतिक्रम्य’ समास में है ही नहीं। इसीलिए पुस्तक कहती है — ‘नित्यसमासे अस्वपदविग्रहः भवति’।

आगे क्या: अब शारदा के पाठों में लौटिए और वहाँ आने वाले समस्तपदों पर यही विधि लगाइए — पाठ २, ३, ६, ७ और ९ के सुभाषितों में समास बहुतायत से हैं। जब किसी नए पद को देखकर आप पहले विग्रह लिखने लगें और उसके बाद ही नाम सोचें, तब समझिए कि यह परिशिष्ट काम कर गया।
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