कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 द्विगुः समासः तथा नञ्-प्रभृतिः तत्पुरुषसमासः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
द्विगु समास किसे कहते हैं — उसके तीन भेद और पुस्तक की तालिका दीजिए।
उत्तर

पुस्तक का वाक्य — द्विगुसमासः अपि तत्पुरुषस्यैव भेदः। एषः त्रिविधः।

पहचान — द्विगु वह कर्मधारय है जिसमें पूर्वपद संख्यावाचक हो — द्वि, त्रि, चतुर्, पञ्च, सप्त, नव… और समास किसी समूह या संख्या-सम्बद्ध अर्थ का बोध कराए।

पुस्तक की तालिका, ज्यों-की-त्यों —

क्र.संसमासःविग्रहवाक्यम्समस्तपदम्
१.समाहारद्विगुःत्रयाणां लोकानां समाहारःत्रिलोकी
२.तद्धितार्थद्विगुःषण्णां मातॄणाम् अपत्यम्षाण्मातुरः
३.उत्तरपदद्विगुःपञ्च गावः धनं यस्य सःपञ्चगवधनः
भेदक्या होता हैपहचान का शब्द
समाहारद्विगुःसंख्या + समूह का बोध; समस्तपद प्रायः स्त्रीलिङ्ग (ङीप्) या नपुंसक एकवचनविग्रह में समाहारः
तद्धितार्थद्विगुःसंख्यावाची पूर्वपद पर तद्धित प्रत्यय का अर्थ (अपत्य, भाव आदि) लगता हैविग्रह में अपत्यम् जैसा तद्धित-अर्थ
उत्तरपदद्विगुःद्विगु स्वयं किसी बड़े समास का पूर्वपद बन जाता हैविग्रह में यस्य सः भी आ जाता है

तीनों को खोलकर देखिए —

त्रिलोकी — त्रयाणां लोकानां समाहारः = तीन लोकों का समूह (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल)।
षाण्मातुरः — षण्णां मातॄणाम् अपत्यम् = छह माताओं का पुत्र (कार्तिकेय — कृत्तिकाओं ने पाला था)।
पञ्चगवधनः — पञ्च गावः धनं यस्य सः = जिसका धन पाँच गायें हैं, वह।
तीसरा भेद ‘उत्तरपदद्विगु’ भ्रम पैदा करता है: ‘पञ्चगवधनः’ का विग्रह ‘यस्य सः’ से समाप्त होता है — तो क्या यह बहुव्रीहि नहीं? है, पर उसका पूर्वपद ‘पञ्चगव’ स्वयं एक द्विगु है, और चूँकि द्विगु यहाँ बड़े समास के उत्तरपद के साथ जुड़ा है, इसे ‘उत्तरपदद्विगु’ कहा गया। ऐसे मिश्रित समासों को चरणों में खोलिए — पहले भीतर का समास, फिर बाहर का।
प्र२.
नञ्-प्रभृति तत्पुरुष समास क्या है — पुस्तक की पूरी तालिका दीजिए।
उत्तर

पुस्तक का वाक्य — नञ्-समासः अपि तत्पुरुषस्यैव भेदः। एषः पञ्चविधः।

‘नञ्-प्रभृति’ का अर्थ है — ‘नञ् आदि’, अर्थात् वे तत्पुरुष जिनका पूर्वपद कोई अव्यय या उपसर्ग-जैसा अंश है : नञ् (न/अ/अन्), कु, गति, प्रादि (प्र, अति, निर् आदि उपसर्ग), उपपद, एकदेशी।

पुस्तक की तालिका, ज्यों-की-त्यों —

क्र.संसमासःविग्रहवाक्यम्समस्तपदम्
१.नञ्-तत्पुरुषःन धर्मःअधर्मः
२.कुतत्पुरुषःकुत्सितः पुत्रःकुपुत्रः
३.गतितत्पुरुषःअशुक्लं शुक्लं कृत्वाशुक्लीकृत्य
४.प्रादितत्पुरुषः१. प्रगतः आचार्यः
२. अतिक्रान्तः देवम्
३. निष्कान्तः वाराणस्याः
प्राचार्यः
अतिदेवः
निर्वाराणसिः
५.उपपदतत्पुरुषःकुम्भं करोति इतिकुम्भकारः
६.एकदेशीतत्पुरुषः१. अर्धं ग्रामस्य
२. अह्नः पूर्वम्
अर्धग्रामः
पूर्वाह्णः
पुस्तक की गणना पर टिप्पणी: शीर्षक-वाक्य में लिखा है ‘एषः पञ्चविधः’ (यह पाँच प्रकार का है), किन्तु उसके नीचे की तालिका में छह भेद छपे हैं (नञ्, कु, गति, प्रादि, उपपद, एकदेशी)। यह पुस्तक की गणना में विसंगति है। ऊपर तालिका जैसी छपी है वैसी ही दी गई है — कुल छह भेद। परीक्षा में पूछे जाने पर तालिका के छह भेद ही लिखिए और सङ्ख्या का उल्लेख न कीजिए।

हर भेद का आशय —

भेदपूर्वपदअर्थ
नञ्-तत्पुरुषन (व्यञ्जन से पहले , स्वर से पहले अन्)निषेध — अधर्मः, अनन्तः, असत्यम्
कुतत्पुरुषकु (= कुत्सित, बुरा)निन्दा — कुपुत्रः, कुपथः
गतितत्पुरुषगति-संज्ञक पद (ऊरी, शुक्ली, उरस् आदि — च्वि-प्रत्ययान्त सहित)अवस्था-परिवर्तन — शुक्लीकृत्य (सफेद बनाकर)
प्रादितत्पुरुषप्र, अति, निर्, वि, उप जैसे उपसर्गप्राचार्यः (आगे बढ़ा हुआ आचार्य), अतिदेवः (देव से बढ़ा हुआ), निर्वाराणसिः (वाराणसी से निकला हुआ)
उपपदतत्पुरुषकर्म-पद, और उत्तरपद कृदन्तकुम्भकारः (घड़ा बनाने वाला), ग्रन्थकारः, जलदः
एकदेशीतत्पुरुषअर्ध, पूर्व, अपर, उत्तर — किसी वस्तु का एक भाग बताने वालेअर्धग्रामः (गाँव का आधा), पूर्वाह्णः (दिन का पूर्व भाग)
छपाई की एक और बात: प्रादितत्पुरुष के तीसरे उदाहरण में पुस्तक ने ‘निष्कान्तः वाराणस्याः’ छापा है। मानक रूप ‘निष्क्रान्तः वाराणस्याः’ है (निर् + क्रम् → निष्क्रान्त = निकला हुआ)। ऊपर मुद्रित पाठ ही रखा गया है; लिखते समय ‘निष्क्रान्तः’ लिखिए।
‘पूर्वाह्णः’ का ण कहाँ से आया: विग्रह है ‘अह्नः पूर्वम्’ — यहाँ ‘अहन्’ शब्द है। समास में अन्त्य ‘न्’ के पहले ‘र्’ या ‘ष्’ आदि होने पर तथा समासान्त-नियम से ‘अहन्’ का रूप ‘अह्न’ हो जाता है और ण-त्व हो जाता है — पूर्व + अह्न = पूर्वाह्णः। इसी तरह अपराह्णः, मध्याह्नः।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — द्विगु तथा नञ्-प्रभृति
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। केवल स्वयं जाँच के लिए, उत्तर सहित।

(क) द्विगु —

समस्तपदम्विग्रहःटिप्पणी
त्रिभुवनम्त्रयाणां भुवनानां समाहारःसमाहारद्विगु — नपुंसक एकवचन
पञ्चवटीपञ्चानां वटानां समाहारःसमाहारद्विगु — ङीप् से स्त्रीलिङ्ग
सप्ताहःसप्तानाम् अह्नां समाहारःसमाहारद्विगु
चतुर्युगम्चतुर्णां युगानां समाहारःसमाहारद्विगु

(ख) नञ्-प्रभृति —

समस्तपदम्विग्रहःभेदः
असत्यम्न सत्यम्नञ्-तत्पुरुषः
अनादिःन आदिःनञ्-तत्पुरुषः (स्वर से पूर्व ‘अन्’)
कुमार्गःकुत्सितः मार्गःकुतत्पुरुषः
प्रधानम्प्रकृष्टं धानम्प्रादितत्पुरुषः
ग्रन्थकारःग्रन्थं करोति इतिउपपदतत्पुरुषः
अपराह्णःअह्नः अपरम्एकदेशीतत्पुरुषः
पहचान का सूत्र: यदि पूर्वपद अ / अन् / कु / प्र / अति / निर् / वि / उप जैसा कोई अव्यय-अंश है, तो वह नञ्-प्रभृति तत्पुरुष है। यदि पूर्वपद संख्यावाचक है, तो द्विगु। यदि पूर्वपद विशेषण है, तो कर्मधारय। और यदि पूर्वपद पर विग्रह में विभक्ति प्रकट होती है, तो विभक्तितत्पुरुष। — चारों तत्पुरुष यहीं छँट जाते हैं।
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