प्र१.
द्विगु समास किसे कहते हैं — उसके तीन भेद और पुस्तक की तालिका दीजिए।
उत्तर
पुस्तक का वाक्य — द्विगुसमासः अपि तत्पुरुषस्यैव भेदः। एषः त्रिविधः।
पहचान — द्विगु वह कर्मधारय है जिसमें पूर्वपद संख्यावाचक हो — द्वि, त्रि, चतुर्, पञ्च, सप्त, नव… और समास किसी समूह या संख्या-सम्बद्ध अर्थ का बोध कराए।
पुस्तक की तालिका, ज्यों-की-त्यों —
| क्र.सं | समासः | विग्रहवाक्यम् | समस्तपदम् |
|---|---|---|---|
| १. | समाहारद्विगुः | त्रयाणां लोकानां समाहारः | त्रिलोकी |
| २. | तद्धितार्थद्विगुः | षण्णां मातॄणाम् अपत्यम् | षाण्मातुरः |
| ३. | उत्तरपदद्विगुः | पञ्च गावः धनं यस्य सः | पञ्चगवधनः |
| भेद | क्या होता है | पहचान का शब्द |
|---|---|---|
| समाहारद्विगुः | संख्या + समूह का बोध; समस्तपद प्रायः स्त्रीलिङ्ग (ङीप्) या नपुंसक एकवचन | विग्रह में समाहारः |
| तद्धितार्थद्विगुः | संख्यावाची पूर्वपद पर तद्धित प्रत्यय का अर्थ (अपत्य, भाव आदि) लगता है | विग्रह में अपत्यम् जैसा तद्धित-अर्थ |
| उत्तरपदद्विगुः | द्विगु स्वयं किसी बड़े समास का पूर्वपद बन जाता है | विग्रह में यस्य सः भी आ जाता है |
तीनों को खोलकर देखिए —
त्रिलोकी — त्रयाणां लोकानां समाहारः = तीन लोकों का समूह (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल)।
षाण्मातुरः — षण्णां मातॄणाम् अपत्यम् = छह माताओं का पुत्र (कार्तिकेय — कृत्तिकाओं ने पाला था)।
पञ्चगवधनः — पञ्च गावः धनं यस्य सः = जिसका धन पाँच गायें हैं, वह।
षाण्मातुरः — षण्णां मातॄणाम् अपत्यम् = छह माताओं का पुत्र (कार्तिकेय — कृत्तिकाओं ने पाला था)।
पञ्चगवधनः — पञ्च गावः धनं यस्य सः = जिसका धन पाँच गायें हैं, वह।
तीसरा भेद ‘उत्तरपदद्विगु’ भ्रम पैदा करता है: ‘पञ्चगवधनः’ का विग्रह ‘यस्य सः’ से समाप्त होता है — तो क्या यह बहुव्रीहि नहीं? है, पर उसका पूर्वपद ‘पञ्चगव’ स्वयं एक द्विगु है, और चूँकि द्विगु यहाँ बड़े समास के उत्तरपद के साथ जुड़ा है, इसे ‘उत्तरपदद्विगु’ कहा गया। ऐसे मिश्रित समासों को चरणों में खोलिए — पहले भीतर का समास, फिर बाहर का।