प्र१.
कर्मधारय किसे कहते हैं, और वह तत्पुरुष के भीतर क्यों गिना जाता है?
उत्तर
पुस्तक का वाक्य है — कर्मधारयसमासः अपि तत्पुरुषसमासान्तर्गतः भवति। कर्मधारयसमासः नवधा।
पहचान — कर्मधारय वह तत्पुरुष है जिसमें दोनों पद एक ही विभक्ति में (प्रायः प्रथमा में) हों और उनमें विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का सम्बन्ध हो।
| प्रश्न | कर्मधारय में उत्तर |
|---|---|
| दोनों पदों की विभक्ति ? | एक ही (समानाधिकरण) — नीलः मेघः — दोनों प्रथमा |
| दोनों में सम्बन्ध ? | विशेषण–विशेष्य, या उपमान–उपमेय, या अवधारणा (एक ही वस्तु के दो नाम) |
| प्रधान पद ? | उत्तरपद — इसीलिए तत्पुरुष के भीतर है |
| विग्रह में क्या जुड़ता है ? | कुछ नहीं, या ‘इव’ / ‘एव’ / ‘इति’ — विभक्ति नहीं बदलती |
विभक्तितत्पुरुष और कर्मधारय में अन्तर —
| विभक्तितत्पुरुष | कर्मधारय | |
|---|---|---|
| विग्रह में विभक्ति | पूर्वपद पर अलग विभक्ति — वृक्षस्य मूलम् | दोनों पर एक ही विभक्ति — नीलः मेघः |
| सम्बन्ध | कारक-सम्बन्ध (का, से, के लिए…) | विशेषण-सम्बन्ध (कैसा?) |
| उदाहरण | राजपुरुषः (राजा का पुरुष) | महापुरुषः (महान् पुरुष) |
‘कर्मधारय’ नाम का अर्थ: इसमें एक ही वस्तु दो ‘कर्म’ (भूमिकाएँ) धारण करती है — मेघ ‘नीला’ भी है और ‘मेघ’ भी; नर ‘नर’ भी है और ‘व्याघ्र-सा’ भी। दोनों पद एक ही वस्तु की बात कर रहे हैं, इसीलिए दोनों की विभक्ति एक रहती है। यही ‘समानाधिकरण’ शब्द का अर्थ है — एक ही अधिकरण (आश्रय) वाले।