प्र१.
द्वन्द्व समास की पहचान क्या है, और पुस्तक का भेद-वृक्ष क्या दिखाता है?
उत्तर
पहचान — प्रायः उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्वसमासः। जिसमें दोनों (या सब) पदों का अर्थ बराबर प्रधान हो। विग्रह में हर पद के बाद ‘च’ आता है।
पुस्तक का भेद-वृक्ष (पृष्ठ 173) —
द्वन्द्वसमासः
१. इतरेतरद्वन्द्वसमासः २. समाहारद्वन्द्वसमासः
क. द्विपदद्वन्द्वसमासः क. समाहारद्वन्द्वसमासः
ख. बहुपदद्वन्द्वसमासः ख. नित्यसमाहारद्वन्द्वसमासः
१. इतरेतरद्वन्द्वसमासः २. समाहारद्वन्द्वसमासः
क. द्विपदद्वन्द्वसमासः क. समाहारद्वन्द्वसमासः
ख. बहुपदद्वन्द्वसमासः ख. नित्यसमाहारद्वन्द्वसमासः
| इतरेतरद्वन्द्व | समाहारद्वन्द्व | |
|---|---|---|
| अर्थ | पद अलग-अलग गिने जाते हैं | सब मिलकर एक समूह बन जाते हैं |
| वचन | पदों की गिनती के अनुसार — द्विवचन (दो) या बहुवचन (दो से अधिक) | सदा एकवचन |
| लिङ्ग | अन्तिम पद के अनुसार | सदा नपुंसकलिङ्ग |
| उदाहरण | रामकृष्णौ, रामकृष्णसुरेशगिरीशाः | संज्ञापरिभाषम्, पाणिपादम् |
वचन ही सबसे पक्की पहचान है: ‘रामकृष्णौ’ द्विवचन है — दो व्यक्ति अलग-अलग हैं। पर ‘पाणिपादम्’ एकवचन नपुंसक है — हाथ और पैर अलग-अलग नहीं गिने जा रहे, ‘हाथ-पैर’ एक समूह के रूप में लिए गए हैं। इसीलिए जहाँ ‘शरीर के अङ्ग’, ‘वाद्य’, ‘सेना’ जैसे समूह-बोधक अर्थ हों, वहाँ समाहार होता है।