कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 द्वन्द्वसमासः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
द्वन्द्व समास की पहचान क्या है, और पुस्तक का भेद-वृक्ष क्या दिखाता है?
उत्तर

पहचान — प्रायः उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्वसमासः। जिसमें दोनों (या सब) पदों का अर्थ बराबर प्रधान हो। विग्रह में हर पद के बाद ‘च’ आता है।

पुस्तक का भेद-वृक्ष (पृष्ठ 173) —

द्वन्द्वसमासः

१. इतरेतरद्वन्द्वसमासः        २. समाहारद्वन्द्वसमासः
क. द्विपदद्वन्द्वसमासः             क. समाहारद्वन्द्वसमासः
ख. बहुपदद्वन्द्वसमासः             ख. नित्यसमाहारद्वन्द्वसमासः
इतरेतरद्वन्द्वसमाहारद्वन्द्व
अर्थपद अलग-अलग गिने जाते हैंसब मिलकर एक समूह बन जाते हैं
वचनपदों की गिनती के अनुसार — द्विवचन (दो) या बहुवचन (दो से अधिक)सदा एकवचन
लिङ्गअन्तिम पद के अनुसारसदा नपुंसकलिङ्ग
उदाहरणरामकृष्णौ, रामकृष्णसुरेशगिरीशाःसंज्ञापरिभाषम्, पाणिपादम्
वचन ही सबसे पक्की पहचान है: ‘रामकृष्ण’ द्विवचन है — दो व्यक्ति अलग-अलग हैं। पर ‘पाणिपादम्’ एकवचन नपुंसक है — हाथ और पैर अलग-अलग नहीं गिने जा रहे, ‘हाथ-पैर’ एक समूह के रूप में लिए गए हैं। इसीलिए जहाँ ‘शरीर के अङ्ग’, ‘वाद्य’, ‘सेना’ जैसे समूह-बोधक अर्थ हों, वहाँ समाहार होता है।
प्र२.
इतरेतरद्वन्द्व तथा समाहारद्वन्द्व की पुस्तक की दोनों तालिकाएँ पूरी दीजिए।
उत्तर

१. इतरेतरद्वन्द्वसमासः — पुस्तक की तालिका ज्यों-की-त्यों —

क्र.सं.समासस्य नामविग्रहःसमासः (समस्तपदम्)
क.द्विपदद्वन्द्वसमासःरामश्च कृष्णश्चरामकृष्णौ
ख.बहुपदद्वन्द्वसमासःरामश्च कृष्णश्च सुरेशश्च गिरीशश्चरामकृष्णसुरेशगिरीशाः

२. समाहारद्वन्द्वसमासः — पुस्तक की तालिका ज्यों-की-त्यों —

क्र.सं.समासस्य नामविग्रहःसमासः (समस्तपदम्)
क.समाहारद्वन्द्वसमासःसंज्ञा च परिभाषा चसंज्ञापरिभाषम्
ख.नित्यसमाहारद्वन्द्वसमासःपाणी च पादौ चपाणिपादम्

चारों उदाहरण खोलकर —

समस्तपदम्कितने पदवचनक्यों
रामकृष्णौदोद्विवचन (औ)दो व्यक्ति अलग-अलग — इसलिए द्विपदद्वन्द्व
रामकृष्णसुरेशगिरीशाःचारबहुवचन (आः)दो से अधिक — इसलिए बहुपदद्वन्द्व
संज्ञापरिभाषम्दोएकवचन, नपुंसकसंज्ञा और परिभाषा — दोनों मिलकर ‘व्याकरण का एक विषय-समूह’
पाणिपादम्दोएकवचन, नपुंसकहाथ-पैर — शरीर के अङ्ग, समूह के रूप में; नित्य समाहार, अर्थात् यहाँ इतरेतर हो ही नहीं सकता
‘नित्यसमाहार’ का अर्थ: कुछ शब्द-जोड़ों में समाहार के अतिरिक्त कोई विकल्प है ही नहीं — शरीर के अङ्गों, सेना के अङ्गों, वाद्यों आदि का द्वन्द्व सदा समाहार ही होगा। ‘पाणिपादम्’ को ‘पाणिपादौ’ नहीं कहा जाता। ऐसे ही ‘मार्दङ्गिकवैणविकम्’, ‘हस्त्यश्वम्’। इसीलिए इसे अलग भेद बनाया गया।
सन्धि की एक बात: विग्रह ‘रामः च कृष्णः च’ लिखने पर विसर्ग-सन्धि से ‘रामश्च कृष्णश्च’ बनता है (विसर्ग + च् → श्च्)। पुस्तक ने सन्धि-युक्त रूप ही छापा है। उत्तर लिखते समय दोनों में से कोई भी रूप मान्य है, पर सन्धि करें तो ठीक करें।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — द्वन्द्व
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। केवल स्वयं जाँच के लिए, उत्तर सहित।
विग्रहःसमस्तपदम्भेदः तथा कारण
माता च पिता चमातापितरौइतरेतर (द्विपद) — द्विवचन
सूर्यः च चन्द्रः चसूर्याचन्द्रमसौइतरेतर (द्विपद) — यह एक विशेष रूप है, ‘सूर्या’ में दीर्घ हो जाता है
धर्मः च अर्थः च कामः च मोक्षः चधर्मार्थकाममोक्षाःइतरेतर (बहुपद) — चार पद, अतः बहुवचन
अहिः च नकुलः चअहिनकुलम्समाहार — शत्रुता का जोड़ा, एकवचन नपुंसक
मुखं च नासिका चमुखनासिकम्नित्यसमाहार — शरीर के अङ्ग
रात्रिः च दिवा चरात्रिन्दिवम्समाहार — समय का समूह, एकवचन

स्वयं सोचिए — ‘हरिहरगुरवः’ (पृष्ठ 167 का उदाहरण) कौन-सा द्वन्द्व है और उसका विग्रह क्या है ?
उत्तर — विग्रह : हरिश्च हरश्च गुरुश्च। तीन पद हैं, अतः इतरेतर बहुपदद्वन्द्व, और समस्तपद बहुवचन ‘गुरवः’ में समाप्त होता है।

समाहार कब मानें: तीन संकेत देखिए — (१) पद ऐसे हों जो स्वभाव से एक समूह बनाते हों (अङ्ग, वाद्य, सेना, दिशाएँ, विरोधी युगल); (२) समस्तपद नपुंसक एकवचन हो; (३) अर्थ ‘इन दोनों का समूह’ हो, ‘ये दोनों’ नहीं। तीनों मिलें तो समाहार, नहीं तो इतरेतर।
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