कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 तत्पुरुषसमासः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
तत्पुरुष समास की पहचान क्या है — प्रधान पद कौन-सा, और विग्रह कैसे बनता है?
उत्तर

पहचान — पुस्तक की परिभाषा है — प्रायेण उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषसमासः। अर्थात् जिसमें उत्तरपद (बाद वाला पद) प्रधान हो।

प्रश्नतत्पुरुष में उत्तर
प्रधान पद कौन ?उत्तरपद — रामदूतः में ‘दूत’
क्रिया का सम्बन्ध किससे ?उत्तरपद से — ‘दूतः गच्छति’
विग्रह में पूर्वपद का क्या होता है ?उस पर कोई-न-कोई विभक्ति प्रकट हो जाती है — रामस्य दूतः
समस्तपद का लिङ्ग-वचन ?उत्तरपद के अनुसार — वृक्षमूलम् नपुंसक, क्योंकि ‘मूलम्’ नपुंसक है

विग्रह की पद्धति — तत्पुरुष का विग्रह करते समय पूर्वपद पर वही विभक्ति लगाइए जो अर्थ के अनुसार बनती है, और उत्तरपद को प्रथमा में रखिए :

गृहगतः → गृहं (द्वितीया) गतः
नखभिन्नः → नखैः (तृतीया) भिन्नः
वृक्षमूलम् → वृक्षस्य (षष्ठी) मूलम्

पुस्तक तत्पुरुष के चार भेद देती है —

१. विभक्तितत्पुरुषः (षड्विधः)    २. कर्मधारयसमासः (नवधा)
३. द्विगुः समासः (त्रिविधः)    ४. नञ्-प्रभृतिः तत्पुरुषसमासः
‘तत्पुरुष’ नाम ही परिभाषा है: ‘तत्पुरुषः’ का विग्रह है ‘तस्य पुरुषः’ — उसका पुरुष। यहाँ प्रधान कौन है? ‘पुरुष’, अर्थात् उत्तरपद। ‘तस्य’ केवल इतना बताता है कि किसका। इसीलिए इस पूरे वर्ग का नाम ही उसका सबसे अच्छा उदाहरण बन गया।
प्र२.
विभक्तितत्पुरुष के छह भेद कौन-से हैं — पुस्तक की पूरी तालिका दीजिए।
उत्तर

पुस्तक पृष्ठ 171 पर लिखती है — १. विभक्तितत्पुरुषः षड्विधः — और नीचे यह तालिका देती है। पूरी तालिका ज्यों-की-त्यों —

क्र.संतत्पुरुषसमासःविग्रहवाक्यम्समासः (समस्तपदम्)
१.द्वितीयातत्पुरुषःगृहं गतःगृहगतः
२.तृतीयातत्पुरुषःनखैः भिन्नःनखभिन्नः
३.चतुर्थीतत्पुरुषःगवे हितम्गोहितम्
४.पञ्चमीतत्पुरुषःचोरात् भयम्चोरभयम्
५.षष्ठीतत्पुरुषःवृक्षस्य मूलम्वृक्षमूलम्
६.सप्तमीतत्पुरुषःकार्ये कुशलःकार्यकुशलः

विभक्ति का नियम — कौन-सा भेद कौन-सी विभक्ति लेता है — यही इस तालिका की असली सूचना है :

भेदपूर्वपद पर कौन-सी विभक्तिविभक्ति का चिह्नअर्थऔर उदाहरण
द्वितीयातत्पुरुषद्वितीयाअम् / औ / शस् (‘को’)कर्मग्रामं गतः = ग्रामगतः
तृतीयातत्पुरुषतृतीयाटा / भ्याम् / भिस् (‘से’, ‘के द्वारा’)करणहरिणा त्रातः = हरित्रातः
चतुर्थीतत्पुरुषचतुर्थीङे / भ्याम् / भ्यस् (‘के लिए’)सम्प्रदानयूपाय दारु = यूपदारु
पञ्चमीतत्पुरुषपञ्चमीङसि / भ्याम् / भ्यस् (‘से’ — अलग होना, डर)अपादानव्याघ्रात् भयम् = व्याघ्रभयम्
षष्ठीतत्पुरुषषष्ठीङस् / ओस् / आम् (‘का, की, के’)सम्बन्धराजपुरुषः, रामदूतः
सप्तमीतत्पुरुषसप्तमीङि / ओस् / सुप् (‘में’, ‘पर’)अधिकरणजले जातम् = जलजम्
प्रथमा-तत्पुरुष क्यों नहीं है: तालिका द्वितीया से आरम्भ होकर सप्तमी पर समाप्त होती है — छह भेद। प्रथमा इसलिए नहीं, क्योंकि जब दोनों पद प्रथमा में हों (नीलः मेघः) तो वह विभक्तितत्पुरुष नहीं, कर्मधारय कहलाता है — और कर्मधारय की अलग तालिका आगे है। सम्बोधन का समास होता ही नहीं। इसीलिए ‘षड्विधः’।
ध्यान दें — ‘गवे हितम् = गोहितम्’ में: ‘गो’ शब्द चतुर्थी एकवचन में ‘गवे’ बनता है, पर समास बनते ही वह प्रातिपदिक ‘गो’ के रूप में लौट आता है। यही ऊपर बताया गया नियम है — समास में दोनों पद प्रातिपदिक रूप में रहते हैं
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — विभक्तितत्पुरुष
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। पुस्तक की तालिका पहले से भरी हुई है। नीचे के अतिरिक्त उदाहरण केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं, उत्तर सहित।

(क) विग्रह कीजिए और भेद का नाम लिखिए —

समस्तपदम्विग्रहःभेदःक्यों
शरणागतःशरणम् आगतःद्वितीयातत्पुरुष‘शरण को’ आया — कर्म
धनहीनःधनेन हीनःतृतीयातत्पुरुष‘धन से’ रहित — करण
विद्यालयःविद्यायै आलयःचतुर्थीतत्पुरुष‘विद्या के लिए’ घर — सम्प्रदान
पापभीतःपापात् भीतःपञ्चमीतत्पुरुष‘पाप से’ डरा — अपादान
देवालयःदेवस्य आलयःषष्ठीतत्पुरुष‘देव का’ घर — सम्बन्ध
आत्मविश्वासःआत्मनि विश्वासःसप्तमीतत्पुरुष‘अपने में’ विश्वास — अधिकरण

(ख) विग्रह से समस्तपद बनाइए —

१. सूर्यस्य किरणः = सूर्यकिरणः (षष्ठी)    २. गृहे कार्यम् = गृहकार्यम् (सप्तमी)    ३. मृत्योः भयम् = मृत्युभयम् (पञ्चमी)    ४. रथेन गतः = रथगतः (तृतीया)    ५. यज्ञाय शाला = यज्ञशाला (चतुर्थी)    ६. सुखम् आप्तः = सुखाप्तः (द्वितीया)।

जाँच का तरीका: हर बार अपने आप से पूछिए — विग्रह में पूर्वपद पर कौन-सी विभक्ति आई? वही विभक्ति भेद का नाम है। ‘विद्यालयः’ को कोई-कोई षष्ठी (विद्यायाः आलयः) भी मानते हैं; पर ‘जिसके लिए’ अर्थ स्पष्ट होने से चतुर्थी अधिक उपयुक्त है — अर्थ ही निर्णायक है
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