कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-08
इस अध्याय के बारे में
यह क्या है — ‘वाच्यम्’ शारदा का तीसरा परिशिष्ट है (पृष्ठ 177–183)। परिशिष्ट पाठ नहीं होता — उसमें न श्लोक होते हैं, न कथा, न प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल नियम और भरी हुई तालिकाएँ हैं, जिन्हें देखकर छात्र अपना बनाया हुआ वाक्य मिलाता है। पृष्ठ 183 के अन्त में पुस्तक स्वयं लाल रंग में लिखती है कि इन तीनों परिशिष्टों में विचार ‘सामान्यतया प्रदर्शिताः’ हैं। वाच्य का अर्थ — वाक्य में क्रिया किसके अनुसार चलती है — कर्ता के, कर्म के, या केवल भाव (क्रिया-मात्र) के — यही वाच्य या प्रयोग है। पुस्तक पहले ही पृष्ठ पर वृक्ष बनाकर तीन भेद दिखाती है : कर्तरि प्रयोगः · कर्मणि प्रयोगः · भावे प्रयोगः , और कहती है — ‘एतानि कर्तृवाच्यं, कर्मवाच्यं, भाववाच्यं च इत्यपि कथ्यन्ते।’ तीन नियम-जोड़े — पूरा परिशिष्ट वस्तुतः तीन जोड़ी नियमों पर टिका है। कर्तरि — कर्ता प्रथमा में, कर्म द्वितीया में, क्रिया कर्ता के अनुसार। कर
अभ्यास
- वाच्यम्
- कर्तृवाच्यम्
- कर्तरि प्रयोगे पुरुषव्यवस्था
- कर्मवाच्यम् / कर्मणि प्रयोगः
- वर्तमानकाले कर्तरि तथा कर्मणि
- भूतकाले ‘क्तवतु’ तथा ‘क्त’ प्रत्ययों का प्रयोग
- विधिलिङ्-लकारः तथा ‘तव्यत्’-‘अनीयर्’ प्रत्यय
- भाववाच्यम् / भावे प्रयोगः
- भूतकाल तथा विधिलिङ् में भावे प्रयोग
- पूरे परिशिष्ट का सार तथा पुस्तक की समापन-टिप्पणी