प्र१.
‘मुख्यतया समासः द्विविधः’ — केवलसमास किसे कहते हैं?
उत्तर
पुस्तक पृष्ठ 169 पर पहला बड़ा विभाजन देती है —
मुख्यतया समासः द्विविधः —
१. केवलसमासः
२. विशेषसमासः
१. केवलसमासः
२. विशेषसमासः
१. केवलसमासः — पुस्तक के शब्दों में —
तत्पुरुषादिसंज्ञाभिः विनिर्मुक्तः समाससंज्ञामात्रयुक्तः केवलसमासः।
यथा — पूर्वं भूतः = भूतपूर्वः
यथा — पूर्वं भूतः = भूतपूर्वः
हिन्दी अर्थ — जो समास तत्पुरुष आदि किसी विशेष संज्ञा से मुक्त हो — अर्थात् जिसे केवल ‘समास’ ही कहा जा सके, कोई विशेष नाम न दिया जा सके — वह केवलसमास है।
| पद | अर्थ |
|---|---|
| तत्पुरुषादिसंज्ञाभिः विनिर्मुक्तः | तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव — इनमें से किसी नाम से रहित |
| समाससंज्ञामात्रयुक्तः | जिसे केवल ‘समास’ इतनी ही संज्ञा मिलती है |
| भूतपूर्वः | विग्रह — पूर्वं भूतः (जो पहले हुआ था) — यहाँ क्रम उलटा है, इसलिए किसी नियमित तत्पुरुष में नहीं बैठता |
‘भूतपूर्वः’ में उलटी बात क्या है: विग्रह है ‘पूर्वं भूतः’ — यानी विशेषण ‘पूर्वम्’ पहले और ‘भूतः’ बाद में। पर समास बना ‘भूतपूर्वः’ — क्रम बदल गया। ऐसे समासों को पाणिनि की परिभाषा में कोई नियमित तत्पुरुषादि नाम नहीं मिलता, इसलिए इन्हें केवलसमास कहा जाता है। परीक्षा में इनकी संख्या बहुत कम है — असली काम विशेषसमास से पड़ता है।