कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 समासस्य निर्णयः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
पुस्तक समास पहचानने की कौन-सी विधि देती है — पूरा नियम क्रम से लिखिए।
उत्तर

यह इस पूरे परिशिष्ट का सबसे उपयोगी अंश है। पुस्तक के अपने शब्दों में (पृष्ठ 169) —

पदेषु कः समासः अस्ति इति ज्ञातुं पूर्वपदस्य उत्तरपदस्य च ज्ञानं सम्यक् भवेत्। तदनन्तरं कस्य पदस्य प्राधान्यमस्ति इति ज्ञातव्यम्। तदर्थं समासघटितपदस्य श्रवणानन्तरं तेन सह किञ्चन क्रियापदं योजयेत्। ततः क्रियापदेन सह पूर्वपदस्य सम्बन्धः अस्ति वा उत्तरपदस्य वा इति द्रष्टव्यम्। यस्य पदस्य सम्बन्धः क्रियापदेन सह भवति तत् पदं प्रधानं भवति। अग्रे विद्यमानानि उदाहरणानि परिशीलयामः।

हिन्दी में यही विधि, चरणों में —

चरणक्या कीजिए
समस्तपद के पूर्वपद और उत्तरपद ठीक-ठीक पहचानिए
उस पद के साथ कोई क्रियापद जोड़कर एक वाक्य बना लीजिए (रामदूतः गच्छति)
विग्रह कीजिए और पूछिए — ‘कः गच्छति?’ — क्रिया का सीधा सम्बन्ध किससे है?
जिस पद से क्रिया का सीधा सम्बन्ध बने, वही प्रधान — और प्रधान पद से समास का नाम निकल आता है
निर्णय-सारणी —
क्रिया का सम्बन्ध उत्तरपद से → तत्पुरुष
क्रिया का सम्बन्ध दोनों पदों से → द्वन्द्व
क्रिया का सम्बन्ध किसी से नहीं, किसी बाहरी पद से → बहुव्रीहि
क्रिया का सम्बन्ध पूर्वपद से → अव्ययीभाव
यह विधि काम क्यों करती है: वाक्य में क्रिया सदा प्रधान पद को खींचती है — कर्ता या कर्म वही बनता है जो अर्थ का केन्द्र है। समास ने भीतर की विभक्तियाँ छिपा दी हैं, पर क्रिया जोड़ते ही यह छिपाव खुल जाता है, क्योंकि क्रिया गौण पद से सीधा सम्बन्ध बना ही नहीं सकती। इसीलिए पुस्तक कहती है — ‘तेन सह किञ्चन क्रियापदं योजयेत्’।
प्र२.
उदाहरणम् (१) रामदूतः तथा (२) राजेशसुरेशौ — पुस्तक का पूरा विवेचन क्या है?
उत्तर

उदाहरणम् — (१) रामदूतः (पृष्ठ 169)

रामदूतः गच्छति। अत्र ‘रामस्य दूतः गच्छति’ इति विग्रहवाक्ये कः गच्छति ?
रामस्य दूतः गच्छति। अतः अत्र रामः न गच्छति अपितु दूतः गच्छति इति स्पष्टम्।
तर्हि ‘राम’ इति पूर्वपदेन सह क्रियापदस्य साक्षात् सम्बन्धः नास्ति। परं ‘दूत’ इति उत्तरपदेन सह क्रियापदस्य साक्षात् सम्बन्धः अस्ति। अतः अत्र उत्तरपदार्थः प्रधानः इति निश्चेतुं शक्यते।
प्रश्नउत्तरनिष्कर्ष
कः गच्छति ?दूतः गच्छति — राम नहीं जा रहाउत्तरपद ‘दूत’ प्रधान
तो कौन-सा समास ?उत्तरपदार्थप्रधानतत्पुरुषसमास (यहाँ षष्ठीतत्पुरुष)

उदाहरणम् — (२) राजेशसुरेशौ (पृष्ठ 169–170)

राजेशसुरेशौ फलं खादतः। राजेशश्च सुरेशश्च फलं खादतः। इति वाक्ये कस्य पदस्य प्राधान्यम् अस्ति ? क्रियापदेन सह कस्य सम्बन्धः अस्ति ?
राजेशः खादति, सुरेशः अपि खादति। तर्हि अस्मिन् विग्रहवाक्ये पूर्वपदम् उत्तरपदं चेति द्वयोः अपि साक्षात् सम्बन्धः क्रियापदेन सह अस्ति। अतः उभयपदार्थः प्रधानः इति निश्चयः।
प्रश्नउत्तरनिष्कर्ष
कौ खादतः ?राजेशः खादति, सुरेशः अपि खादति — दोनोंदोनों पद प्रधान
तो कौन-सा समास ?उभयपदार्थप्रधानद्वन्द्वसमास
दोनों उदाहरणों में अन्तर: पहले में क्रिया ‘गच्छति’ एकवचन है और केवल ‘दूतः’ से जुड़ती है — ‘रामः’ केवल यह बताता है कि दूत किसका है। दूसरे में क्रिया ‘खादतः’ द्विवचन है — और यही सूचना दे रही है कि कर्ता दो हैं, दोनों बराबर के। द्वन्द्व की सबसे बड़ी पहचान यही वचन है : दो पद हों तो द्विवचन (रामकृष्णौ), दो से अधिक हों तो बहुवचन (रामकृष्णसुरेशगिरीशाः)।
प्र३.
उदाहरणम् (३) पीताम्बरः तथा (४) उपनगरम् — पुस्तक का पूरा विवेचन क्या है?
उत्तर

उदाहरणम् — (३) पीताम्बरः (पृष्ठ 170)

पीताम्बरः पश्यति। पीतम् अम्बरं यस्य सः पीताम्बरः (विष्णुः) इति वाक्ये कस्य प्राधान्यम् ?
यः पीतम् अम्बरं (वस्त्रं) धरति सः इति अर्थः। तर्हि क्रियापदेन सह कस्य पदस्य अन्वयः अत्र ?
पीतम् अम्बरं यस्य सः (विष्णुः) तिष्ठति। तर्हि पूर्वपदं पीतं न तिष्ठति। उत्तरपदम् अम्बरं अपि न तिष्ठति। एवं तर्हि अस्मिन् वाक्ये पूर्वपदस्यापि प्राधान्यं नास्ति उत्तरपदस्यापि प्राधान्यं नास्ति। समासवाक्यात् अन्यपदस्य ‘विष्णुः’ इति पदस्य प्राधान्यम् अस्ति। यः पीतम् अम्बरं धरति सः (विष्णुः) इत्यर्थः।
प्रश्नउत्तरनिष्कर्ष
कः पश्यति / तिष्ठति ?न ‘पीतम्’ देखता है, न ‘अम्बरम्’ — देखता है विष्णुदोनों पद अप्रधान
तो प्रधान कौन ?समास से बाहर का पद — विष्णुःबहुव्रीहिसमास (अन्यपदार्थप्रधान)

उदाहरणम् — (४) उपनगरम् (पृष्ठ 170)

उपनगरं नदी प्रवहति। अत्र विग्रहवाक्यं भवति ‘नगरस्य समीपे’ इति। ‘नदी नगरस्य प्रवहति’ इति साक्षात् अन्वयः न भवति। ‘नदी समीपे प्रवहति’ इति अन्वयः भवति। एवं तर्हि सामीप्यार्थसूचकम् ‘उप’ इति पदं पूर्वपदम् अस्ति। तथा च पूर्वपदेन सह अत्र क्रियापदस्य अन्वयः अपि भवति। एवं समासे पूर्व-पदस्य प्राधान्यमिति ज्ञातव्यम्।
प्रश्नउत्तरनिष्कर्ष
कुत्र प्रवहति ?‘समीपे’ प्रवहति — अर्थात् ‘उप’ के अर्थ मेंपूर्वपद ‘उप’ प्रधान
‘नदी नगरस्य प्रवहति’ — क्या यह अन्वय बनता है ?नहीं — उत्तरपद ‘नगर’ से क्रिया का सीधा सम्बन्ध नहींअव्ययीभावसमास (पूर्वपदार्थप्रधान)
चारों उदाहरण एक साथ देखिए: पुस्तक ने जान-बूझकर चारों समासों का एक-एक उदाहरण एक ही विधि से हल किया है — रामदूतः (तत्पुरुष) · राजेशसुरेशौ (द्वन्द्व) · पीताम्बरः (बहुव्रीहि) · उपनगरम् (अव्ययीभाव)। प्रश्न हर बार एक ही था — ‘क्रिया का सीधा सम्बन्ध किससे?’ — और चार अलग उत्तरों से चार अलग समास निकल आए। यही इस परिशिष्ट की मुख्य शिक्षा है।
प्र४.
चारों समासों की पुस्तक-प्रदत्त परिभाषा तथा उदाहरण एक साथ दीजिए।
उत्तर

पृष्ठ 170 और 171 पर पुस्तक चारों की एक-एक पंक्ति की परिभाषा उदाहरण सहित देती है। ज्यों-की-त्यों —

समासःपुस्तक की परिभाषाउदाहरणम्
तत्पुरुषसमासःप्रायः उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषसमासः। (पृष्ठ 171 पर पुनः — प्रायेण उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषसमासः।)रामस्य दूतः = रामदूतः। रामदूतः गच्छति।
द्वन्द्वसमासःप्रायः उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्वसमासः।राजेशश्च सुरेशश्च = राजेशसुरेशौ (राजेशसुरेशौ ग्रामं गच्छतः)
बहुव्रीहिसमासःप्रायः अन्यपदार्थप्रधानः बहुव्रीहिसमासः।पुस्तकं हस्ते यस्य सः = पुस्तकहस्तः (बालकः)। कः सः पुस्तकहस्तः ?
अव्ययीभावसमासःप्रायः पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावसमासः।नगरस्य समीपम् = उपनगरम् (उपनगरं नदी प्रवहति)

हिन्दी में एक-एक पंक्ति —

  • तत्पुरुष — जिसमें बाद वाले पद का अर्थ मुख्य हो। ‘रामदूत’ में मुख्य बात दूत है, राम नहीं।
  • द्वन्द्व — जिसमें दोनों (या सब) पदों का अर्थ बराबर मुख्य हो। विग्रह में ‘च’ आता है।
  • बहुव्रीहि — जिसमें दोनों में से किसी का नहीं, किसी तीसरे का अर्थ मुख्य हो। विग्रह में यस्य/येन/यस्मै/यस्मात्/यस्मिन् … सः आता है।
  • अव्ययीभाव — जिसमें पहले वाले (अव्यय) पद का अर्थ मुख्य हो। समस्तपद प्रायः नपुंसकलिङ्ग, एकवचन, अव्यय बन जाता है — उपनगरम्, प्रतिदिनम्, यथाशक्ति।
नाम का अर्थ भी याद रखिए — ‘तत्पुरुष’ (तस्य पुरुषः) स्वयं षष्ठीतत्पुरुष का उदाहरण है; ‘द्वन्द्व’ का अर्थ है जोड़ा; ‘बहुव्रीहि’ (बहुः व्रीहिः यस्य सः = जिसके पास बहुत चावल हों) स्वयं बहुव्रीहि है; और ‘अव्ययीभाव’ का अर्थ ही है ‘अनव्ययम् अव्ययं भवति’ — जो अव्यय नहीं था वह अव्यय बन जाता है। हर समास का नाम ही उसका उदाहरण है।
प्र५.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — निर्णय-विधि से समास पहचानिए
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। शारदा का परिशिष्टम् २ केवल नियम और तालिकाएँ देता है, कोई अभ्यास नहीं। नीचे के पद और उनके उत्तर केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले उत्तर ढँककर, प्रत्येक पद के साथ एक क्रियापद जोड़िए और पूछिए ‘क्रिया का सीधा सम्बन्ध किससे?’

१. ग्रामगतःग्रामगतः बालकः अस्ति। कः गतः ? — जो गया वह ‘गत’ है, ग्राम नहीं गया। उत्तरपद प्रधान → तत्पुरुष (विग्रह : ग्रामं गतः — द्वितीयातत्पुरुष)।

२. मातापितरौमातापितरौ वदतः। कौ वदतः ? — माता भी, पिता भी। उभयपद प्रधान → द्वन्द्व (विग्रह : माता च पिता च)। ध्यान दीजिए — क्रिया द्विवचन है।

३. चक्रपाणिःचक्रपाणिः रक्षति। कः रक्षति ? — न चक्र रक्षा करता है, न हाथ; रक्षा करता है विष्णुअन्यपद प्रधान → बहुव्रीहि (विग्रह : चक्रं पाणौ यस्य सः)।

४. यथाशक्तिसः यथाशक्ति कार्यं करोति। कथं करोति ? — शक्ति का उल्लंघन किए बिना, अर्थात् ‘यथा’ के अर्थ में। पूर्वपद प्रधान → अव्ययीभाव (विग्रह : शक्तिम् अनतिक्रम्य — अस्वपदविग्रह)।

५. नीलकण्ठः — दो उत्तर सम्भव हैं, और यहीं विधि की परीक्षा है :
• यदि अर्थ है ‘नीला कण्ठ’ (जैसे — नीलकण्ठः शोभते, कण्ठ की बात हो रही है) → कर्मधारय (विशेषणपूर्वपद), विग्रह ‘नीलः कण्ठः’।
• यदि अर्थ है ‘जिसका कण्ठ नीला है, वह — शिव’ (नीलकण्ठः प्रसीदतु) → बहुव्रीहि, विग्रह ‘नीलः कण्ठः यस्य सः (शिवः)’।
निर्णय वाक्य से होगा, पद से नहीं — यही पुस्तक की विधि सिखाती है।

६. पञ्चवटीरामः पञ्चवटीं गच्छति। विग्रह : पञ्चानां वटानां समाहारः। संख्या पूर्वपद में और समाहार का बोध → समाहारद्विगु (जो तत्पुरुष का ही भेद है)।

सबसे आम भूल: छात्र समस्तपद देखकर सीधे नाम लिख देते हैं। पर ‘नीलकण्ठः’ जैसे पद बिना वाक्य के अनिर्णीत रहते हैं। पहले वाक्य, फिर विग्रह, तब नाम — पुस्तक का क्रम यही है।
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