जहाँ न कर्ता प्रधान हो, न कर्म — केवल क्रिया का भाव बचे — वह भावे प्रयोग है। पुस्तक पृष्ठ 181 पर लाल शीर्षक ‘भावे प्रयोगः / भाववाच्यम्’ के नीचे इसकी पूरी परिभाषा एक ही अनुच्छेद में देती है।
«भावप्रधानः प्रयोगः भावे प्रयोगः। ये अकर्मकधातवः सन्ति तेषां कर्तरि प्रयोगाः भावे प्रयोगाश्च भवन्ति।
अकर्मकधातवः नाम येषां धातूनां प्रयोगे कर्मपदस्य प्रसक्तिः न भवति ते धातवः अकर्मकधातवः भवन्ति।
अत एव अकर्मकधातूनां प्रयोगे कर्मपदस्य अभावात् कर्तरि प्रयोगः भावे प्रयोगश्च भवतः। कर्मणि प्रयोगः तु न भवति।»
| धातु का प्रकार | अर्थ | उदाहरण | कौन-कौन से प्रयोग |
|---|---|---|---|
| सकर्मकः धातुः | जिसके साथ ‘क्या?’ पूछा जा सके, अर्थात् कर्म सम्भव हो | पठति (क्या पढ़ता है? — श्लोकम्) | कर्तरि + कर्मणि |
| अकर्मकः धातुः | जिसके साथ ‘क्या?’ पूछा ही न जा सके | हसति (क्या हँसता है? — कोई उत्तर नहीं) | कर्तरि + भावे |