प्र१.
विधिलिङ् में कर्मवाच्य कैसे बनता है — ‘तव्यत्’ और ‘अनीयर्’ का नियम क्या है?
उत्तर
विधिलिङ् वह लकार है जो ‘चाहिए’ का अर्थ देता है — ‘महेशः आपणं गच्छेत्’ = महेश को दुकान जाना चाहिए। इसका कर्मवाच्य दो तरह से बन सकता है : या तो विधिलिङ् का ही कर्मणि रूप (गम्येत), या — जो अधिक प्रचलित है — कृदन्त प्रत्यय तव्यत् और अनीयर्।
पुस्तक का नियम (पृष्ठ 181) —
«विधिलिङ्-लकारस्य कर्तरि कर्मणि च प्रयोगाः भवन्ति। विधिलिङ्-लकारस्य अर्थेषु एव कृदन्तेषु कर्मणि ‘तव्यत्’ ‘अनीयर्’ इत्येतयोः प्रयोगः भवति। अत्रापि ‘तव्यत्’ ‘अनीयर्’ प्रत्ययौ कर्मपदस्य लिङ्गं वचनं च अनुसृत्य भवतः।»
गम् + तव्यत् = गन्तव्यः · गम् + अनीयर् = गमनीयः
(‘त्’ तथा ‘र्’ इत्संज्ञक हैं — जुड़ता केवल तव्य और अनीय है।)
«विधिलिङ्-लकारस्य कर्तरि कर्मणि च प्रयोगाः भवन्ति। विधिलिङ्-लकारस्य अर्थेषु एव कृदन्तेषु कर्मणि ‘तव्यत्’ ‘अनीयर्’ इत्येतयोः प्रयोगः भवति। अत्रापि ‘तव्यत्’ ‘अनीयर्’ प्रत्ययौ कर्मपदस्य लिङ्गं वचनं च अनुसृत्य भवतः।»
गम् + तव्यत् = गन्तव्यः · गम् + अनीयर् = गमनीयः
(‘त्’ तथा ‘र्’ इत्संज्ञक हैं — जुड़ता केवल तव्य और अनीय है।)
दोनों प्रत्यय एक ही अर्थ देते हैं: ‘गन्तव्यः’ और ‘गमनीयः’ — दोनों का अर्थ ‘जाना चाहिए / जाने योग्य’ है। इसीलिए पुस्तक हर पंक्ति में दोनों रूप तिरछी रेखा से अलग करके देती है। परीक्षा में किसी एक को लिख देना पर्याप्त है, पर दोनों जानना अच्छा रहता है, क्योंकि प्रश्न कभी-कभी ‘अनीयर्-प्रत्ययान्तं पदं लिखत’ के रूप में आता है।
लिङ्ग-वचन का नियम वही है: ये कृदन्त भी विशेषण हैं और कर्म के लिङ्ग-वचन पर चलते हैं — आपणः गन्तव्यः (पुं. एक.), मधुरं खादितव्यम् (नपुं. एक.), वृक्षाः द्रष्टव्याः (पुं. बहु.), भगवद्गीता पठितव्या (स्त्री. एक.)। कर्ता तृतीया में ही रहता है और उसका कोई असर नहीं पड़ता।