कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 3 भूतकाल तथा विधिलिङ् में भावे प्रयोग के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
भूतकाल में भावे प्रयोग की तालिका पूरी दीजिए (पृष्ठ 183)।
उत्तर

यहाँ कर्तृवाच्य में ‘क्तवतु’ है और भाववाच्य में ‘क्त’ — बिलकुल कर्मवाच्य की तरह; अन्तर केवल यह कि क्त-रूप अब कर्म से नहीं, किसी से भी मेल नहीं खाता — वह सदा नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन में जमा रहता है।

क्र.सं.कर्तरि प्रयोगः / कर्तृवाच्यम् (क्तवतु)भावे प्रयोगः / भाववाच्यम् (क्त)
१.ते हसितवन्तः।तैः हसितम्।
२.बालाः उद्याने क्रीडितवन्तः।बालैः उद्याने क्रीडितम्।
३.फलानि भूमौ पतितवन्ति।फलैः भूमौ पतितम्।
४.वाहनानि मार्गे स्थितवन्ति।वाहनैः मार्गे स्थितम्।
५.सा उत्थितवती।तया उत्थितम्।
६.शिशुः शयितवान्।शिशुना शयितम्।
बायाँ स्तम्भ बदलता है, दायाँ नहीं: कर्तृवाच्य में कृदन्त कर्ता के लिङ्ग-वचन पर चलता है, इसलिए वहाँ चार अलग-अलग अन्त दिखते हैं — हसितवन्तः (पुं. बहु.), पतितवन्ति (नपुं. बहु.), उत्थितवती (स्त्री. एक.), शयितवान् (पुं. एक.)। पर भाववाच्य में सब कुछ एक ही रूप में — ‑तम्। यही ‘सर्वदा नपुंसकलिङ्गे प्रथमाविभक्तेः एकवचने एव’ नियम है।
क्तवतु की चार शक्लें एक साथ: पुंलिङ्ग एकवचन ‑तवान् · पुंलिङ्ग बहुवचन ‑तवन्तः · स्त्रीलिङ्ग एकवचन ‑तवती · नपुंसकलिङ्ग बहुवचन ‑तवन्ति। पंक्ति ३ और ४ में ‘फलानि’ तथा ‘वाहनानि’ नपुंसक हैं, इसीलिए वहाँ ‘पतितवन्ति’ और ‘स्थितवन्ति’ छपा है — इसे पृष्ठ 180 की तालिका की पंक्ति १० से मिलाकर देखिए, वहाँ यही मेल छूट गया है।
प्र२.
विधिलिङ् में भावे प्रयोग की तालिका पूरी दीजिए (पृष्ठ 183)।
उत्तर

परिशिष्ट की अन्तिम तालिका। कर्तृवाच्य में विधिलिङ् का क्रियापद, और भाववाच्य में ‘तव्यत्’ तथा ‘अनीयर्’ — दोनों नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन में।

क्र.सं.कर्तरि प्रयोगः / कर्तृवाच्यम्भावे प्रयोगः / भाववाच्यम्
१.नर्तकाः नृत्येयुः।नर्तकैः नर्तितव्यम् / नर्तनीयम्
२.बालिकाः प्रयतेयुः।बालिकाभिः प्रयतितव्यम् / प्रयतनीयम्।
३.शुनकः धावेत्।शुनकेन धावितव्यम् / धावनीयम्।
४.वृक्षः वर्धेत।वृक्षेण वर्धितव्यम् / वर्धनीयम्।
५.वृद्धः आसने उपविशेत्।वृद्धेन आसने उपवेष्टव्यम् / उपवेशनीयम्।
६.रुग्णः कासेत।रुग्णेन कासितव्यम् / कासनीयम्।
दायाँ स्तम्भ एक ही साँचे का है —
हर रूप का अन्त ‑तव्यम् या ‑अनीयम् है — अर्थात् नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा, एकवचन।
तुलना कीजिए कर्मवाच्य से (पृष्ठ 181) : वहाँ ‘आपणः गन्तव्यः’, ‘वृक्षाः द्रष्टव्याः’, ‘भगवद्गीता पठितव्या’ — रूप कर्म के अनुसार बदलते थे।
यहाँ बदलने के लिए कर्म ही नहीं, इसलिए सब कुछ ‑म् पर आकर रुक जाता है।
पंक्ति ४ और ६ में कर्तृवाच्य की क्रिया ‘त्’ पर क्यों नहीं है: ‘वर्धेत’ तथा ‘कासेत’ — इनमें अन्तिम ‘त्’ नहीं है, क्योंकि वृध् और कास् आत्मनेपदी धातुएँ हैं और आत्मनेपद में विधिलिङ् का प्रथमपुरुष एकवचन ‘‑एत’ होता है (‑एत् नहीं)। तुलना कीजिए परस्मैपदी ‘धावेत्’, ‘उपविशेत्’, ‘गच्छेत्’ से, जिनमें ‘त्’ है।
‘उपवेष्टव्यम्’ कैसे बना: उप + विश् + तव्यत् → विश् का ‘श्’ ‘ष्’ में और ‘त्’ ‘ट्’ में बदलकर = उपवेष्टव्यम्। अनीयर् में यह परिवर्तन नहीं होता, वहाँ गुण होकर = उपवेशनीयम्। यही जोड़ा पृष्ठ 182 की पंक्ति ६ के ‘उपविश्यते’ के साथ मिलाकर याद कीजिए।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — कृदन्त में भावे प्रयोग
उत्तर
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. भावे प्रयोग बनाइए — ‘छात्राः हसितवन्तः।’
    उत्तर — छात्रैः हसितम्।
  2. भावे प्रयोग बनाइए — ‘बालिका उपविष्टवती।’
    उत्तर — बालिकया उपविष्टम्।
  3. ‘तया गतम्’ का कर्तृवाच्य लिखिए।
    उत्तर — सा गतवती।
  4. भूल सुधारिए — ‘बालकैः क्रीडिताः।’
    उत्तर — भावे प्रयोग में क्त-रूप सदा नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन में रहता है, अतः — बालकैः क्रीडितम्।
  5. तव्यत् तथा अनीयर् से भावे रूप बनाइए — हस् · शी · नृत्।
    उत्तर — हसितव्यम् / हसनीयम्; शयितव्यम् / शयनीयम्; नर्तितव्यम् / नर्तनीयम्।
  6. ‘मया स्थातव्यम्’ और ‘मया ग्रामः गन्तव्यः’ — दोनों में प्रत्यय का अन्त अलग क्यों है?
    उत्तर — पहला भावे प्रयोग है (स्था अकर्मक, कर्म नहीं), इसलिए ‘‑तव्यम्’ नपुंसक एकवचन में जमा है। दूसरा कर्मणि प्रयोग है, जिसमें कर्म ‘ग्रामः’ पुंलिङ्ग एकवचन है, इसलिए प्रत्यय भी ‘गन्तव्यः’ हो गया।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ