प्र१.
भूतकाल में भावे प्रयोग की तालिका पूरी दीजिए (पृष्ठ 183)।
उत्तर
यहाँ कर्तृवाच्य में ‘क्तवतु’ है और भाववाच्य में ‘क्त’ — बिलकुल कर्मवाच्य की तरह; अन्तर केवल यह कि क्त-रूप अब कर्म से नहीं, किसी से भी मेल नहीं खाता — वह सदा नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन में जमा रहता है।
| क्र.सं. | कर्तरि प्रयोगः / कर्तृवाच्यम् (क्तवतु) | भावे प्रयोगः / भाववाच्यम् (क्त) |
|---|---|---|
| १. | ते हसितवन्तः। | तैः हसितम्। |
| २. | बालाः उद्याने क्रीडितवन्तः। | बालैः उद्याने क्रीडितम्। |
| ३. | फलानि भूमौ पतितवन्ति। | फलैः भूमौ पतितम्। |
| ४. | वाहनानि मार्गे स्थितवन्ति। | वाहनैः मार्गे स्थितम्। |
| ५. | सा उत्थितवती। | तया उत्थितम्। |
| ६. | शिशुः शयितवान्। | शिशुना शयितम्। |
बायाँ स्तम्भ बदलता है, दायाँ नहीं: कर्तृवाच्य में कृदन्त कर्ता के लिङ्ग-वचन पर चलता है, इसलिए वहाँ चार अलग-अलग अन्त दिखते हैं — हसितवन्तः (पुं. बहु.), पतितवन्ति (नपुं. बहु.), उत्थितवती (स्त्री. एक.), शयितवान् (पुं. एक.)। पर भाववाच्य में सब कुछ एक ही रूप में — ‑तम्। यही ‘सर्वदा नपुंसकलिङ्गे प्रथमाविभक्तेः एकवचने एव’ नियम है।
क्तवतु की चार शक्लें एक साथ: पुंलिङ्ग एकवचन ‑तवान् · पुंलिङ्ग बहुवचन ‑तवन्तः · स्त्रीलिङ्ग एकवचन ‑तवती · नपुंसकलिङ्ग बहुवचन ‑तवन्ति। पंक्ति ३ और ४ में ‘फलानि’ तथा ‘वाहनानि’ नपुंसक हैं, इसीलिए वहाँ ‘पतितवन्ति’ और ‘स्थितवन्ति’ छपा है — इसे पृष्ठ 180 की तालिका की पंक्ति १० से मिलाकर देखिए, वहाँ यही मेल छूट गया है।