कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 3 पूरे परिशिष्ट का सार तथा पुस्तक की समापन-टिप्पणी के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
तीनों वाच्य एक दृष्टि में — सब कालों और कृदन्तों की तुलनात्मक तालिका दीजिए।
उत्तर

एक ही विचार को तीनों वाच्यों में देखिए — पहले सकर्मक धातु (पठ्) से कर्तरि और कर्मणि, फिर अकर्मक धातु (हस्) से कर्तरि और भावे। यह तालिका पूरे परिशिष्ट का निचोड़ है।

रूप-प्रकारकर्तरि (सकर्मक)कर्मणिकर्तरि (अकर्मक)भावे
वर्तमान (लट्)बालकः श्लोकं पठति।बालकेन श्लोकः पठ्यते।बालकः हसति।बालकेन हस्यते।
भूत (कृदन्त)बालकः श्लोकं पठितवान्।बालकेन श्लोकः पठितः।बालकः हसितवान्।बालकेन हसितम्।
विधि (लिङ्)बालकः श्लोकं पठेत्।बालकेन श्लोकः पठितव्यः / पठनीयःबालकः हसेत्।बालकेन हसितव्यम् / हसनीयम्
कर्ता की विभक्तिप्रथमातृतीयाप्रथमातृतीया
कर्म की विभक्तिद्वितीयाप्रथमाकर्म है ही नहीं
क्रिया किसके अनुसारकर्ता केकर्म केकर्ता केकिसी के नहीं — सदा प्र.पु. एकवचन
कृदन्त का लिङ्ग-वचनकर्ता जैसाकर्म जैसाकर्ता जैसासदा नपुंसक, प्रथमा, एकवचन
पूरे परिशिष्ट का एक-पंक्ति सार: «जिसका पद प्रथमा में है, क्रिया उसी का अनुसरण करती है — और यदि प्रथमा में कोई है ही नहीं, तो क्रिया एकवचन में जम जाती है।» इस एक वाक्य से तीनों वाच्यों की क्रिया का रूप निकाला जा सकता है।
प्र२.
वाच्य पहचानने और बदलने में छात्र कौन-सी भूलें सबसे अधिक करते हैं?
उत्तर

ये छह भूलें अधिकांश अंक कटवाती हैं। हर एक के साथ सही रूप और उसका कारण दिया गया है।

अशुद्धशुद्धकारण
बालकेन श्लोकाः पठ्यते।बालकेन श्लोकाः पठ्यन्ते।कर्म बहुवचन है, अतः क्रिया भी बहुवचन — «क्रियापदं कर्मपदम् अनुसरति।»
बालकैः हस्यन्ते।बालकैः हस्यते।भावे प्रयोग में क्रिया सदा एकवचन।
बालकेन ग्रन्थः गच्छ्यते।बालकेन ग्रन्थालयः गम्यते।कर्मणि में गण-विकरण ‘गच्छ्’ हट जाता है, मूल धातु ‘गम्’ लौटती है।
तया कविता लिखितः।तया कविता लिखिता।क्त-प्रत्यय कर्म ‘कविता’ (स्त्रीलिङ्ग) का लिङ्ग लेता है, कर्ता का नहीं।
बालकः श्लोकः पठ्यते।बालकेन श्लोकः पठ्यते।कर्मणि में कर्ता तृतीया में जाता है, प्रथमा में नहीं रहता।
छात्रैः पाठाः पठितव्यम्।छात्रैः पाठाः पठितव्याः।तव्यत् भी कर्म के लिङ्ग-वचन पर चलता है।
Check it yourself — तीन सेकंड की जाँच: वाक्य में देखिए कि (क) कोई पद तृतीया में है क्या, (ख) क्रिया ‘ते/एते/अन्ते’ पर समाप्त हो रही है क्या, (ग) प्रथमा में कोई कर्म है क्या। तीनों का उत्तर हाँ → कर्मणि। (क) और (ख) हाँ पर (ग) नहीं → भावे। तृतीया नहीं, कर्ता प्रथमा में → कर्तरि
प्र३.
पृष्ठ 183 के अन्त में लाल रंग में छपी टिप्पणी क्या कहती है, और वह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर

यह पूरे परिशिष्ट-खण्ड की समापन-टिप्पणी है — यह केवल ‘वाच्यम्’ पर नहीं, तीनों परिशिष्टों (परिशिष्टम् १ अन्वयः, परिशिष्टम् २ समासः, परिशिष्टम् ३ वाच्यम्) पर एक साथ लागू होती है। पुस्तक इसे कोष्ठक में, लाल रंग में, पृष्ठ 183 के अन्त में छापती है।

पुस्तक का मूल पाठ —
«(अस्मिन् परिशिष्टत्रये श्लोकानाम् अन्वयक्रमाः समासाः प्रयोगाश्च इत्येते विचाराः सामान्यतया प्रदर्शिताः सन्ति। छात्राः विस्तृताध्ययनार्थम् अन्यान् ग्रन्थान् परिशीलयेयुः।)»
पदअर्थ
अस्मिन् परिशिष्टत्रयेइन तीन परिशिष्टों में
श्लोकानाम् अन्वयक्रमाःश्लोकों के अन्वय-क्रम (परिशिष्ट १)
समासाःसमास (परिशिष्ट २)
प्रयोगाः चतथा प्रयोग अर्थात् वाच्य (परिशिष्ट ३)
इत्येते विचाराः सामान्यतया प्रदर्शिताः सन्ति— ये विषय सामान्य रूप से (संक्षेप में) दिखाए भर गए हैं
छात्राः विस्तृताध्ययनार्थम् अन्यान् ग्रन्थान् परिशीलयेयुःछात्र विस्तृत अध्ययन के लिए अन्य ग्रन्थों का परिशीलन करें

हिन्दी अनुवाद — «इन तीनों परिशिष्टों में श्लोकों के अन्वय-क्रम, समास तथा प्रयोग (वाच्य) — ये विषय सामान्य रूप से ही दिखाए गए हैं। छात्र विस्तृत अध्ययन के लिए अन्य ग्रन्थों का परिशीलन करें।»

यह टिप्पणी क्या तय कर देती है: तीन बातें। एक — ये परिशिष्ट पाठ नहीं, सन्दर्भ-सामग्री हैं; इसीलिए इनमें कोई अभ्यास नहीं दिया गया। दो — यहाँ जो दिया है वह सम्पूर्ण नहीं है; ‘सामान्यतया प्रदर्शिताः’ का सीधा अर्थ है ‘केवल नमूने के तौर पर’। जैसे वाच्य में लोट्, लृट् और लङ् लकार के कर्मणि रूप यहाँ नहीं दिए गए। तीन — पुस्तक स्वयं आगे पढ़ने को कहती है; ‘परिशीलयेयुः’ विधिलिङ् का रूप है, अर्थात् यह सलाह है, आदेश नहीं।
व्याकरण-दृष्टि से टिप्पणी: ‘परिशिष्टत्रये’ द्विगु समास (परिशिष्टानां त्रयम्) का सप्तमी एकवचन है। ‘विस्तृताध्ययनार्थम्’ में ‘अर्थम्’ के कारण चतुर्थी का भाव है — विस्तृत अध्ययन के लिए। और ‘परिशीलयेयुः’ परि + शील् धातु का विधिलिङ् प्रथमपुरुष बहुवचन है — ठीक वही लकार जिसका वाच्य-परिवर्तन इसी परिशिष्ट में सिखाया गया है।
प्र४.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — मिश्रित पुनरावृत्ति
उत्तर
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. प्रयोग का नाम बताइए — (क) ‘मया पत्रं लिख्यते।’ (ख) ‘तैः हस्यते।’ (ग) ‘सः पत्रं लिखति।’
    उत्तर — (क) कर्मणि प्रयोग (कर्म ‘पत्रम्’ प्रथमा में है)। (ख) भावे प्रयोग (कोई कर्म नहीं, हस् अकर्मक)। (ग) कर्तरि प्रयोग (कर्ता प्रथमा में, कर्म द्वितीया में)।
  2. ‘अध्यापकः छात्रान् पाठयति।’ के कर्मवाच्य तथा भूतकाल के कर्तृवाच्य — दोनों रूप लिखिए।
    उत्तर — कर्मवाच्य — अध्यापकेन छात्राः पाठ्यन्ते। भूतकाल कर्तृवाच्य — अध्यापकः छात्रान् पाठितवान्।
  3. एक ही वाक्य को तीनों कालों के कर्मवाच्य में लिखिए — ‘सा कथां लिखति।’
    उत्तर — वर्तमान — तया कथा लिख्यते। भूत (क्त) — तया कथा लिखिता। विधि (तव्यत्/अनीयर्) — तया कथा लेखितव्या / लेखनीया।
  4. बताइए कि इनमें से किन धातुओं का कर्मणि प्रयोग नहीं हो सकता — पठ् · हस् · लिख् · शी · दृश् · कास्।
    उत्तर — हस्, शी तथा कास् — ये तीनों अकर्मक हैं, अतः इनका कर्मणि प्रयोग नहीं होता, केवल कर्तरि और भावे। पठ्, लिख् तथा दृश् सकर्मक हैं।
  5. ‘वृद्धेन आसने उपविश्यते’ तथा ‘वृद्धेन आसने उपवेष्टव्यम्’ — दोनों में काल/अर्थ का क्या भेद है?
    उत्तर — पहला लट्-लकार का भावे प्रयोग है — ‘वृद्ध आसन पर बैठता है’। दूसरा विधिलिङ् के अर्थ में तव्यत्-प्रत्ययान्त भावे प्रयोग है — ‘वृद्ध को आसन पर बैठना चाहिए’।
  6. निम्नलिखित में भूल खोजकर सुधारिए — ‘मित्रैः चलच्चित्रं दृश्यन्ते।’
    उत्तर — कर्म ‘चलच्चित्रम्’ नपुंसक एकवचन है, अतः क्रिया भी एकवचन होगी — मित्रैः चलच्चित्रं दृश्यते। (यही पुस्तक ने पृष्ठ 180 की पंक्ति १० में छापा है।)
  7. ‘शिशुः शेते’ का भावे प्रयोग तीनों रूपों में लिखिए — वर्तमान, भूत तथा विधि।
    उत्तर — वर्तमान — शिशुना शय्यते। भूत — शिशुना शयितम्। विधि — शिशुना शयितव्यम् / शयनीयम्।
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