कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 3 भूतकाले ‘क्तवतु’ तथा ‘क्त’ प्रत्ययों का प्रयोग के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
भूतकाल में कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य कैसे बनते हैं — पुस्तक का नियम क्या है?
उत्तर

भूतकाल में पुस्तक क्रिया के स्थान पर कृदन्त लाती है। कर्तृवाच्य में क्तवतु प्रत्यय (‑तवान्/‑तवती/‑तवन्तः) और कर्मवाच्य में क्त प्रत्यय (‑तः/‑ता/‑तम्)। दोनों विशेषण की तरह चलते हैं, इसलिए इनका लिङ्ग-वचन किसी-न-किसी पद से मिलाना पड़ता है — और यही सबसे महत्त्वपूर्ण नियम है।

पुस्तक का नियम (पृष्ठ 180) —
«तथैव कृदन्तेषु भूतकाले कर्तरि ‘क्तवतु’ प्रत्ययस्य कर्मणि ‘क्त’ प्रत्ययान्तस्य च प्रयोगः भवति।»
«विशेषतः भूतकाले कर्मणि क्त-प्रत्ययस्य प्रयोगे कर्मपदस्य लिङ्गं वचनं च स्पष्टं जानीयात्। यतः कर्मपदं यस्मिन् लिङ्गे, यस्मिन् वचने च भवति तस्मिन्नेव लिङ्गे, तस्मिन्नेव वचने च क्रियापदं भवति।»
बिन्दुकर्तरि — क्तवतुकर्मणि — क्त
प्रत्यय‑तवत् (तवान् · तवती · तवन्तः)‑त (तः · ता · तम् · ताः · तानि)
किससे लिङ्ग-वचन मिलेगाकर्ता सेकर्म से
कर्ता की विभक्तिप्रथमातृतीया
कर्म की विभक्तिद्वितीयाप्रथमा
उदाहरणसा कवितां लिखितवती।तया कविता लिखिता।
‘लिखितवती’ में ‘ती’ क्यों और ‘लिखिता’ में ‘ता’ क्यों: दोनों जगह अन्त स्त्रीलिङ्ग का है, पर कारण अलग है। कर्तरि ‘सा … लिखितवती’ में स्त्रीलिङ्ग इसलिए है कि कर्ता ‘सा’ स्त्रीलिङ्ग है। कर्मणि ‘तया कविता लिखिता’ में स्त्रीलिङ्ग इसलिए है कि कर्म ‘कविता’ स्त्रीलिङ्ग है — कर्ता ‘तया’ का यहाँ कोई असर नहीं। इसी अन्तर को पुस्तक ‘स्पष्टं जानीयात्’ कहकर रेखांकित करती है।
प्र२.
भूतकाल की वह दस-वाक्य तालिका पूरी दीजिए (पृष्ठ 180–181)।
उत्तर

यह ऊपर वाली वर्तमानकाल की तालिका के ठीक वही दस वाक्य हैं, भूतकाल में। पुस्तक ने इसे पृष्ठ 180 पर आरम्भ किया और पृष्ठ 181 पर पूरा किया, ताकि दोनों कालों की तुलना सीधे हो सके।

क्र.सं.कर्तरि प्रयोगः / कर्तृवाच्यम् (क्तवतु)कर्मणि प्रयोगः / कर्मवाच्यम् (क्त)
१.बालकः श्लोकं पठितवान्।बालकेन श्लोकः पठितः।
२.सा कवितां लिखितवती।तया कविता लिखिता।
३.सुनीता फलानि खादितवती।सुनीतया फलानि खादितानि।
४.शिक्षकः ग्रन्थालयं गतवान्।शिक्षकेण ग्रन्थालयः गतः।
५.सः दुर्गुणान् त्यक्तवान्।तेन दुर्गुणाः त्यक्ताः।
६.अहम् इक्षुरसं पीतवान् / पीतवती।मया इक्षुरसः पीतः।
७.सञ्जयः लेखनीः दत्तवान्।सञ्जयेन लेखन्यः दत्ताः।
८.आरक्षकाः चोरान् नीतवन्तः।आरक्षकैः चोराः नीताः।
९.राधा पूजां कृतवती।राधया पूजा कृता।
१०.मित्राणि चलच्चित्रं दृष्टवन्तः।मित्रैः चलच्चित्रं दृष्टम्।
पंक्ति ६ पर रुकिए — पुस्तक ने कर्तरि में दो रूप दिए हैं : पीतवान् / पीतवती। कारण यह है कि कर्ता ‘अहम्’ है, और ‘अहम्’ पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी। कर्तृवाच्य का कृदन्त कर्ता का लिङ्ग लेता है, इसलिए दोनों रूप सम्भव हैं। पर कर्मवाच्य में केवल एक ही रूप है — पीतः — क्योंकि वहाँ लिङ्ग कर्म ‘इक्षुरसः’ (पुंलिङ्ग) से तय होता है, बोलने वाले से नहीं।
कुछ रूप जो बनाने पड़ते हैं, याद नहीं होते: गम् → गतः (गमितः नहीं), त्यज् → त्यक्तः, दा → दत्तः, नी → नीतः, कृ → कृतः, दृश् → दृष्टः, पा → पीतः। इन्हीं से क्तवतु भी बनता है — केवल ‘वत्’ जोड़ दीजिए : गतवान्, त्यक्तवान्, दत्तवान्, नीतवान्, कृतवान्, दृष्टवान्, पीतवान्।
पुस्तक की छपाई में एक चूक: पंक्ति १० में कर्ता ‘मित्राणि’ नपुंसकलिङ्ग बहुवचन है, अतः कर्तृवाच्य का कृदन्त भी नपुंसक बहुवचन ‘दृष्टवन्ति’ होना चाहिए; पुस्तक में ‘दृष्टवन्तः’ (पुंलिङ्ग बहुवचन) छपा है। ऊपर पुस्तक जैसा है वैसा ही रखा गया है। ध्यान रहे — कर्मणि वाला रूप ‘दृष्टम्’ बिलकुल शुद्ध है, क्योंकि वहाँ लिङ्ग कर्म ‘चलच्चित्रम्’ (नपुंसक एकवचन) से आया है।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — भूतकाल में वाच्य-परिवर्तन
उत्तर
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. कर्मवाच्य बनाइए — ‘रमा पत्रं लिखितवती।’
    उत्तर — रमया पत्रं लिखितम्। (कर्म ‘पत्रम्’ नपुंसक एकवचन है, अतः क्त-रूप भी नपुंसक एकवचन ‘लिखितम्’।)
  2. कर्मवाच्य बनाइए — ‘बालकाः कथाः श्रुतवन्तः।’
    उत्तर — बालकैः कथाः श्रुताः। (‘कथाः’ स्त्रीलिङ्ग बहुवचन, अतः ‘श्रुताः’।)
  3. कर्तृवाच्य बनाइए — ‘तेन ग्रन्थः पठितः।’
    उत्तर — सः ग्रन्थं पठितवान्।
  4. भूल सुधारिए — ‘सीतया पुष्पाणि दृष्टः।’
    उत्तर — ‘पुष्पाणि’ नपुंसक बहुवचन है, अतः शुद्ध रूप — सीतया पुष्पाणि दृष्टानि।
  5. ‘पीतवान्’ और ‘पीतः’ में मूल अन्तर एक वाक्य में बताइए।
    उत्तर — ‘पीतवान्’ कर्तृवाच्य का कृदन्त है और कर्ता का लिङ्ग-वचन लेता है; ‘पीतः’ कर्मवाच्य का कृदन्त है और कर्म का लिङ्ग-वचन लेता है।
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