कर्मवाच्य कर्तृवाच्य का ठीक उलटा है — जो प्रथमा में था वह तृतीया में चला जाता है, जो द्वितीया में था वह प्रथमा में आ जाता है, और क्रिया अपना स्वामी बदल लेती है। पुस्तक पृष्ठ 178 के अन्त में तीन बुलेट-बिन्दुओं में यही कहती है।
| पुस्तक का नियम (संस्कृत) | हिन्दी अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्मणि प्रयोगे कर्तृपदं तृतीयाविभक्तौ भवति। | कर्मणि प्रयोग में कर्ता तृतीया विभक्ति में होता है। | बालकेन, तया, मित्रैः |
| कर्मपदं प्रथमाविभक्तौ भवति। | कर्म प्रथमा विभक्ति में होता है। | श्लोकः, कविता, चोराः |
| क्रियापदं कर्मपदम् अनुसरति। | क्रियापद कर्म के अनुसार चलता है। | श्लोकः पठ्यते / श्लोकाः पठ्यन्ते |
अत्र कर्तुः सम्बन्धः क्रियापदेन सह न भवति। कर्मपदस्य सम्बन्धः क्रियापदेन सह भवति।»
अर्थात् — यहाँ क्रिया का नाता कर्ता से टूटकर कर्म से जुड़ जाता है; इसीलिए कर्मणि प्रयोग में कर्म प्रधान है।