प्रथमपुरुष की परिभाषा पुस्तक ‘शेष सब’ के रूप में देती है — जो कर्ता न मध्यमपुरुष का हो, न उत्तमपुरुष का, वह प्रथमपुरुष का है। «कर्तृपदं यदि ‘त्वं/युवा/यूयम् अथवा अहम्/आवां/वयम् एतेभ्यः भिन्नं भवति तर्हि क्रियापदं सर्वदा प्रथमपुरुषस्य एकवचने/द्विवचने/बहुवचने भवति।»
इसका अर्थ है — सः, सा, तौ, ते, ताः जैसे सर्वनाम और युवकः, बालिका, रामः, नद्यः जैसी सब संज्ञाएँ प्रथमपुरुष में ही आती हैं। पुस्तक ने इसी को दिखाने के लिए चार पंक्तियों × तीन वचनों की यह तालिका छापी है, जिसमें पुंलिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग सर्वनाम और पुंलिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग संज्ञा — चारों प्रकार आ जाते हैं।
तालिका यह भी सिखाती है: चारों पंक्तियों में क्रियापद एक ही हैं — पठति · पठतः · पठन्ति। कर्ता पुंलिङ्ग हो या स्त्रीलिङ्ग, सर्वनाम हो या संज्ञा — क्रिया पर लिङ्ग का कोई असर नहीं पड़ता, केवल वचन का पड़ता है। संस्कृत की क्रिया लिङ्ग नहीं देखती; यही हिन्दी से बड़ा भेद है (हिन्दी में ‘पढ़ता है / पढ़ती है’ में लिङ्ग दिखता है)।
नाम का भ्रम मिटाइए: संस्कृत का प्रथमपुरुष वही है जिसे अंग्रेज़ी व्याकरण third person कहता है, और संस्कृत का उत्तमपुरुष अंग्रेज़ी का first person। क्रम उलटा है। परीक्षा में ‘क्रियापदस्य पुरुषं लिखत’ पूछे जाने पर यही उलटफेर सबसे अधिक अंक कटवाता है।
पुस्तक की छपाई में एक चूक: प्रथमपुरुष के नियम-वाक्य में पुस्तक ‘त्वं/युवा/यूयम्’ छापती है, जबकि ऊपर मध्यमपुरुष के नियम में उसी सर्वनाम का शुद्ध रूप ‘युवां’ (युवाम्) दिया है। ‘युवा’ का अर्थ तो ‘जवान’ होता है; यहाँ अभिप्रेत युवाम् (तुम दोनों) ही है। साथ ही यहाँ खुला उद्धरण-चिह्न (‘) बन्द नहीं किया गया है। हमने पुस्तक जैसा है वैसा ही उद्धृत किया है — पढ़ते समय ‘युवाम्’ समझिए।