प्र१.
कर्तरि प्रयोग के वे तीन नियम कौन-से हैं जो पुस्तक पृष्ठ 177 पर देती है?
उत्तर
पुस्तक तीन बुलेट-बिन्दुओं में पूरा कर्तृवाच्य कह देती है। ये तीनों वाक्य ज्यों-के-त्यों नीचे हैं, साथ में हिन्दी अर्थ और यह भी कि हर नियम व्यवहार में क्या करता है।
| पुस्तक का नियम (संस्कृत) | हिन्दी अर्थ | व्यवहार में इसका मतलब |
|---|---|---|
| कर्तरि प्रयोगे कर्तृवाचकं पदं ‘प्रथमाविभक्तौ’ भवति। | कर्तरि प्रयोग में कर्ता का बोध कराने वाला पद प्रथमा विभक्ति में होता है। | बालकः, सुनीता, आरक्षकाः — कर्ता पर कोई ‘द्वारा’ नहीं, सीधा प्रथमा। |
| कर्मवाचकं पदं ‘द्वितीयाविभक्तौ’ भवति। | कर्म का बोध कराने वाला पद द्वितीया विभक्ति में होता है। | श्लोकम्, कविताम्, चोरान् — ‘कर्मणि द्वितीया’ का सीधा प्रयोग। |
| क्रियापदं कर्तृपदानुगुणं भवति। | क्रियापद कर्ता के अनुरूप होता है। | कर्ता का पुरुष तथा वचन जो हो, क्रिया भी उसी पुरुष-वचन में — पठति / पठतः / पठन्ति। |
पुस्तक का विवेचन — «तन्नाम कर्तृपदं यद्वचनयुक्तं भवति क्रियापदमपि तद्वचनयुक्तमेव भवति।»
अर्थात् — कर्ता जिस वचन में हो, क्रिया भी उसी वचन में होती है।
कर्ता एकवचन → क्रिया एकवचन · कर्ता द्विवचन → क्रिया द्विवचन · कर्ता बहुवचन → क्रिया बहुवचन
«कर्मपदेन सह तस्य कोऽपि सम्बन्धः न भवति।» — कर्म से क्रिया का कोई सम्बन्ध नहीं।
अर्थात् — कर्ता जिस वचन में हो, क्रिया भी उसी वचन में होती है।
कर्ता एकवचन → क्रिया एकवचन · कर्ता द्विवचन → क्रिया द्विवचन · कर्ता बहुवचन → क्रिया बहुवचन
«कर्मपदेन सह तस्य कोऽपि सम्बन्धः न भवति।» — कर्म से क्रिया का कोई सम्बन्ध नहीं।
‘कर्ता प्रधान है’ का यही अर्थ है: जिस पद के बदलने पर क्रिया बदल जाए, वही प्रधान है। कर्तरि प्रयोग में क्रिया केवल कर्ता के साथ बदलती है, कर्म के साथ नहीं — इसीलिए पुस्तक पृष्ठ 178 के आरम्भ में निष्कर्ष देती है : «अतः अत्र कर्ता प्रधानः भवति। क्रियापदं कर्तृपदम् अनुसरति।»