यह परिशिष्ट है, पाठ नहीं। शारदा के ग्यारह पाठों के बाद पाँच परिशिष्ट छपे हैं; यह उनमें तीसरा है — पृष्ठ 177 से 183 तक, कुल सात पृष्ठ। इसमें न श्लोक है, न गद्यांश, न अभ्यासाद् जायते सिद्धिः जैसा कोई प्रश्न-खण्ड। जो भी तालिका छपी है वह दोनों ओर पूरी भरी हुई है — बाईं ओर कर्तरि प्रयोग का वाक्य और दाईं ओर उसी का कर्मणि या भावे रूप। इसलिए यहाँ ‘प्रश्न’ और ‘उत्तर’ का सम्बन्ध ही नहीं बनता; यह पूरा खण्ड पढ़ने और मिलाने के लिए है।
पृष्ठ 177 — वाच्य का भेद-वृक्ष तथा कर्तृवाच्यम् के तीन नियम और उदाहरण
पृष्ठ 178 — कर्तरि प्रयोग की पुरुषव्यवस्था (मध्यम · उत्तम · प्रथम) तथा कर्मवाच्यम् के नियम
पृष्ठ 179 — ‘यक्’ प्रत्यय, आत्मनेपद, तथा कर्तरि↔कर्मणि क्रियारूपों की तीन बड़ी तालिकाएँ
पृष्ठ 180 — वर्तमानकाल की दस-वाक्य परिवर्तन-तालिका तथा भूतकाल का नियम
पृष्ठ 181 — भूतकाल (क्तवतु ↔ क्त) की शेष पंक्तियाँ, तव्यत्-अनीयर् तालिका, भाववाच्य का परिचय
पृष्ठ 182 — लट्-लकार में भावे प्रयोग की बारह-वाक्य तालिका तथा बीस अकर्मक धातु
पृष्ठ 183 — भूतकाल तथा विधिलिङ् की भावे तालिकाएँ, और अन्त में लाल रंग की समापन-टिप्पणी