अर्थ — मित्र, हितैषी; व्युत्पत्ति सु + हृद् = ‘जिसका हृदय अच्छा है’ (बहुव्रीहि समास)। प्रातिपदिक सुहृद्। इसी साँचे पर हृद्, विपद्, आपद्, सम्पद्, शरद् जैसे द्-अन्त शब्द चलते हैं (लिङ्ग भिन्न हो सकता है)।
मध्यम अङ्ग — सुहृद् / सुहृत् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — सुहृद् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — इसका अङ्ग सर्वत्र सुहृद् ही रहता है — कोई बलवत्/दुर्बल भेद नहीं। बदलता केवल पदान्त द् है : वाक्य में अकेला पड़ने पर सुहृद् (जश्त्व) या सुहृत् (चर्त्व), और ‘सु’ से पहले कठोर होकर सुहृत्सु।
| ‘द्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘सुहृद्’ शब्दः — पृष्ठ 187 | |||
|---|---|---|---|
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमा | सुहृद्, सुहृत् | सुहृदौ | सुहृदः |
| द्वितीया | सुहृदम् | सुहृदौ | सुहृदः |
| तृतीया | सुहृदा | सुहृद्भ्याम् | सुहृद्भिः |
| चतुर्थी | सुहृदे | सुहृद्भ्याम् | सुहृद्भ्यः |
| पञ्चमी | सुहृदः | सुहृद्भ्याम् | सुहृद्भ्यः |
| षष्ठी | सुहृदः | सुहृदोः | सुहृदाम् |
| सप्तमी | सुहृदि | सुहृदोः | सुहृत्सु |
| सम्बोधनम् | हे सुहृद्, हे सुहृत् | हे सुहृदौ | हे सुहृदः |
प्रयोग —
- सुहृद् आपत्काले परीक्ष्यते। (प्रथमा एक.)
- अहं सुहृदम् स्मरामि। (द्वितीया एक.)
- सुहृदा सह वार्तालापः सुखदः। (तृतीया एक.)
- सुहृद्भ्यः पत्राणि प्रेषितानि। (चतुर्थी बहु.)
- सुहृत्सु विश्वासः स्थापनीयः। (सप्तमी बहु.)