कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 ‘द्’ तथा ‘ज्’ कारान्तः पुंलिङ्गः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘सुहृद्’ शब्दः — ‘द्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 187)
उत्तर

अर्थ — मित्र, हितैषी; व्युत्पत्ति सु + हृद् = ‘जिसका हृदय अच्छा है’ (बहुव्रीहि समास)। प्रातिपदिक सुहृद्। इसी साँचे पर हृद्, विपद्, आपद्, सम्पद्, शरद् जैसे द्-अन्त शब्द चलते हैं (लिङ्ग भिन्न हो सकता है)।

बलवत् (strong) अङ्ग — सुहृद् (कोई विशेष वृद्धि नहीं) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — सुहृद् / सुहृत् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — सुहृद् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — इसका अङ्ग सर्वत्र सुहृद् ही रहता है — कोई बलवत्/दुर्बल भेद नहीं। बदलता केवल पदान्त द् है : वाक्य में अकेला पड़ने पर सुहृद् (जश्त्व) या सुहृत् (चर्त्व), और ‘सु’ से पहले कठोर होकर सुहृत्सु

‘द्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘सुहृद्’ शब्दः — पृष्ठ 187
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमासुहृद्, सुहृत्सुहृदौसुहृदः
द्वितीयासुहृदम्सुहृदौसुहृदः
तृतीयासुहृदासुहृद्भ्याम्सुहृद्भिः
चतुर्थीसुहृदेसुहृद्भ्याम्सुहृद्भ्यः
पञ्चमीसुहृदःसुहृद्भ्याम्सुहृद्भ्यः
षष्ठीसुहृदःसुहृदोःसुहृदाम्
सप्तमीसुहृदिसुहृदोःसुहृत्सु
सम्बोधनम्हे सुहृद्, हे सुहृत्हे सुहृदौहे सुहृदः
प्रथमा एकवचन में दो रूप क्यों छपे हैं: ‘सु’ प्रत्यय लुप्त होने पर द् पद के अन्त में आ जाता है। पदान्त में झलां जशोऽन्ते से वह मृदु द् रहता है (सुहृद्), और खरि च के अनुसार अगले कठोर वर्ण या विराम के आगे त् हो जाता है (सुहृत्)। दोनों शुद्ध हैं; इसीलिए तालिका में प्रथमा तथा सम्बोधन एकवचन में दो-दो रूप हैं।

प्रयोग —

  • सुहृद् आपत्काले परीक्ष्यते। (प्रथमा एक.)
  • अहं सुहृदम् स्मरामि। (द्वितीया एक.)
  • सुहृदा सह वार्तालापः सुखदः। (तृतीया एक.)
  • सुहृद्भ्यः पत्राणि प्रेषितानि। (चतुर्थी बहु.)
  • सुहृत्सु विश्वासः स्थापनीयः। (सप्तमी बहु.)
यही साँचा, दूसरा शब्द: शरद् (स्त्री.) → शरद्/शरत्, शरदौ, शरदः; शरद्भ्याम्, शरद्भिः, शरत्सु। सम्पद् (स्त्री.) → सम्पद्/सम्पत्, सम्पदौ, सम्पदः।
प्र२.
‘वणिज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 188)
उत्तर

अर्थ — व्यापारी, बनिया; प्रातिपदिक वणिज् (पुंलिङ्ग)। हिन्दी का ‘बनिया’ तथा ‘वाणिज्य’ शब्द इसी से हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — वणिज् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — वणिग् / वणिक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — वणिज् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — अङ्ग सर्वत्र वणिज्; केवल पदान्त ज् बदलता है — अकेले में वणिग् (जश्त्व) या वणिक् (चर्त्व), भ्याम्/भिस्/भ्यस् से पहले वणिग्-, और ‘सु’ से पहले वणिक्षु

‘ज्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘वणिज्’ शब्दः — पृष्ठ 188
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमावणिग्, वणिक्वणिजौवणिजः
द्वितीयावणिजम्वणिजौवणिजः
तृतीयावणिजावणिग्भ्याम्वणिग्भिः
चतुर्थीवणिजेवणिग्भ्याम्वणिग्भ्यः
पञ्चमीवणिजःवणिग्भ्याम्वणिग्भ्यः
षष्ठीवणिजःवणिजोःवणिजाम्
सप्तमीवणिजिवणिजोःवणिक्षु
सम्बोधनम्हे वणिग्, हे वणिक्हे वणिजौहे वणिजः
‘वणिक्षु’ कैसे बना — वणिज् + सु → ज् का पदान्त में क् (चर्त्व) → वणिक् + सु → क् (कवर्ग) के बाद स् का ष् (षत्व) → वणिक्षु
यही प्रक्रिया भिषज् → भिषक्षु, वाच् → वाक्षु, दिश् → दिक्षु, स्रज् → स्रक्षु में चलती है।

प्रयोग —

  • वणिक् आपणे वस्तूनि विक्रीणाति। (प्रथमा एक.)
  • ग्रामीणाः वणिजम् पश्यन्ति। (द्वितीया एक.)
  • वणिग्भिः सह व्यापारः वर्धते। (तृतीया बहु.)
  • वणिक्षु सत्यनिष्ठा आवश्यकी। (सप्तमी बहु.)
ध्यान दें: ‘वणिक्’ और ‘वणिग्’ दोनों प्रथमा एकवचन हैं। वाक्य में अगला वर्ण मृदु हो तो प्रायः ‘वणिग्’ लिखा जाता है (वणिग् गच्छति), कठोर हो या विराम हो तो ‘वणिक्’ (वणिक् चलति। वणिक्।)।
प्र३.
‘भिषज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 188)
उत्तर

अर्थ — वैद्य, चिकित्सक; प्रातिपदिक भिषज् (पुंलिङ्ग)। आयुर्वेद में ‘भिषक्’ शब्द चिकित्सक के लिए प्रसिद्ध है — ‘भिषक् चिकित्सां करोति’।

बलवत् (strong) अङ्ग — भिषज् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — भिषग् / भिषक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — भिषज् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — बिलकुल वणिज् जैसा — अङ्ग स्थिर भिषज्, पदान्त में भिषग्/भिषक्, व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले भिषग्-, सप्तमी बहुवचन भिषक्षु। दो शब्द साथ रखने का पुस्तक का उद्देश्य यही दिखाना है कि एक साँचा कई शब्दों पर चलता है।

‘ज्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘भिषज्’ शब्दः — पृष्ठ 188
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाभिषग्, भिषक्भिषजौभिषजः
द्वितीयाभिषजम्भिषजौभिषजः
तृतीयाभिषजाभिषग्भ्याम्भिषग्भिः
चतुर्थीभिषजेभिषग्भ्याम्भिषग्भ्यः
पञ्चमीभिषजःभिषग्भ्याम्भिषग्भ्यः
षष्ठीभिषजःभिषजोःभिषजाम्
सप्तमीभिषजिभिषजोःभिषक्षु
सम्बोधनम्हे भिषग्, हे भिषक्हे भिषजौहे भिषजः
वणिज् और भिषज् में कोई भेद क्यों नहीं: क्योंकि रूप शब्द के अर्थ से नहीं, उसके अन्तिम वर्ण तथा लिङ्ग से बनते हैं। दोनों ‘ज्’-कारान्त पुंलिङ्ग हैं, इसलिए चौबीसों खाने एक ही ढाँचे पर बनते हैं — केवल आरम्भ का अंश (वणि-/भिष-) बदलता है। यही बात स्रज् और रुज् (स्त्रीलिङ्ग) की जोड़ी पर भी लागू है।

प्रयोग —

  • भिषक् रोगिणं चिकित्सति। (प्रथमा एक.)
  • भिषजा औषधं दत्तम्। (तृतीया एक.)
  • भिषजे धनं दीयते। (चतुर्थी एक.)
  • ग्रामे भिषजः अल्पाः सन्ति। (प्रथमा बहु.)
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘सुहृद्’ का प्रथमा एकवचन दोनों रूपों में तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — सुहृद्, सुहृत्; सुहृत्सु।
  2. ‘वणिज्’ का सप्तमी बहुवचन बनाकर दो-चरणों में उसकी सिद्धि लिखिए।
    उत्तर — वणिक्षु — (१) पदान्त ज् → क् (चर्त्व), (२) क् के बाद स् → ष् (षत्व)।
  3. ‘भिषज्’ का तृतीया द्विवचन तथा षष्ठी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — भिषग्भ्याम्; भिषजाम्।
  4. ‘शरद्’ शब्द को सुहृद् के साँचे पर चलाकर तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — शरद्भिः; शरत्सु।
  5. बताइए — ‘वणिग्भ्याम्’ में ज् का ग् क्यों हुआ?
    उत्तर — भ् मृदु व्यञ्जन है, इसलिए उससे पहले पदान्त ज् का जश्त्व होकर ग् हो गया।
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