कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 स्त्रीलिङ्गरूपाणि के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘वाच्’ शब्दः — ‘च्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 189)
उत्तर

अर्थ — वाणी, वचन, बोली; प्रातिपदिक वाच् (स्त्रीलिङ्ग)। यही शब्द ‘वाक्’ के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध है — वाक्शक्ति, वाग्देवी, वाक्पटु, वाग्मी। इसी से गायत्री की देवी ‘वाग्देवी’ (सरस्वती) का नाम है।

बलवत् (strong) अङ्ग — वाच् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — वाग् / वाक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — वाच् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — स्त्रीलिङ्ग हलन्त शब्दों में बलवत्-दुर्बल का भेद नहीं होता; अङ्ग सर्वत्र वाच् रहता है। बदलता केवल पदान्त च् है — अकेले में वाग्/वाक्, व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले वाग्-, तथा ‘सु’ से पहले वाक्षु

‘च्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘वाच्’ शब्दः — पृष्ठ 189
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमावाग्, वाक्वाचौवाचः
द्वितीयावाचम्वाचौवाचः
तृतीयावाचावाग्भ्याम्वाग्भिः
चतुर्थीवाचेवाग्भ्याम्वाग्भ्यः
पञ्चमीवाचःवाग्भ्याम्वाग्भ्यः
षष्ठीवाचःवाचोःवाचाम्
सप्तमीवाचिवाचोःवाक्षु
सम्बोधनम्हे वाग्, हे वाक्हे वाचौहे वाचः
च् का ग्/क् क्यों हो जाता है: संस्कृत में च्, छ्, ज्, झ् पद के अन्त में टिक नहीं सकते — चोः कुः से वे कवर्ग (क्, ग्) में बदल जाते हैं। फिर मृदु परिवेश में जश्त्व से ग् और कठोर परिवेश या विराम में चर्त्व से क्। इसीलिए ‘वाचौ’ (स्वर से पहले च् बचा) पर ‘वाग्भिः’ और ‘वाक्षु’।

प्रयोग —

  • सत्या वाक् सर्वदा शोभते। (प्रथमा एक.)
  • मधुरां वाचम् वदेत्। (द्वितीया एक.)
  • वाचा मनसा कर्मणा च शुद्धिः। (तृतीया एक. — प्रसिद्ध वाक्यांश)
  • वाग्भिः जनाः प्रसन्नाः भवन्ति। (तृतीया बहु.)
  • वाक्षु संयमः आवश्यकः। (सप्तमी बहु.)
समासों में पहचानिए: वाग्देवी, वाग्दान, वाग्युद्ध (मृदु के आगे ग्); वाक्पटु, वाक्चातुर्य, वाक्शक्ति (कठोर के आगे क्)। एक ही शब्द, दो रूप — केवल अगले वर्ण के कारण।
प्र२.
‘त्वच्’ शब्दः — ‘च्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 189)
उत्तर

अर्थ — त्वचा, चमड़ी, छाल; प्रातिपदिक त्वच् (स्त्रीलिङ्ग)। हिन्दी का ‘त्वचा’ इसी से है।

बलवत् (strong) अङ्ग — त्वच् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — त्वग् / त्वक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — त्वच् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — पूरा साँचा वाच् जैसा — अङ्ग त्वच्, पदान्त में त्वग्/त्वक्, मध्यम अङ्ग त्वग्-, सप्तमी बहुवचन त्वक्षु। पुस्तक वाच् और त्वच् को एक ही पृष्ठ पर रखकर यही जोड़ी दिखाती है।

‘च्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘त्वच्’ शब्दः — पृष्ठ 189
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमात्वग्, त्वक्त्वचौत्वचः
द्वितीयात्वचम्त्वचौत्वचः
तृतीयात्वचात्वग्भ्याम्त्वग्भिः
चतुर्थीत्वचेत्वग्भ्याम्त्वग्भ्यः
पञ्चमीत्वचःत्वग्भ्याम्त्वग्भ्यः
षष्ठीत्वचःत्वचोःत्वचाम्
सप्तमीत्वचित्वचोःत्वक्षु
सम्बोधनम्हे त्वग्, हे त्वक्हे त्वचौहे त्वचः
तृतीया एकवचन ‘त्वचा’ का धोखा: देखने में यह हिन्दी के ‘त्वचा’ जैसा लगता है, पर संस्कृत में यह तृतीया एकवचन है (‘त्वचा’ = त्वचा से)। प्रथमा एकवचन तो त्वग्/त्वक् है। हिन्दी में जो नामवाचक रूप ‘त्वचा’ चल पड़ा है, वह वास्तव में इसी तृतीया-रूप या ‘त्वचा’ नामक अकारान्त-स्त्रीलिङ्ग परवर्ती रूप से आया है — संस्कृत-वाक्य में उसे प्रथमा मानकर लिखना अशुद्ध होगा।

प्रयोग —

  • वृक्षस्य त्वक् कठिना भवति। (प्रथमा एक.)
  • सूर्यरश्मयः त्वचम् तापयन्ति। (द्वितीया एक.)
  • त्वचा स्पर्शं जानीमः। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
  • त्वग्भ्याम् रक्षा भवति। (तृतीया द्वि.)
प्र३.
‘स्रज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 190)
उत्तर

अर्थ — माला, पुष्पमाला; प्रातिपदिक स्रज् (स्त्रीलिङ्ग)। काव्य में ‘स्रग्धरा’ छन्द का नाम इसी से है — ‘जो माला धारण करे’।

बलवत् (strong) अङ्ग — स्रज् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — स्रग् / स्रक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — स्रज् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — ज्-कारान्त स्त्रीलिङ्ग का वही साँचा जो पुंलिङ्ग में वणिज्/भिषज् का था — अङ्ग स्रज्, पदान्त में स्रग्/स्रक्, मध्यम अङ्ग स्रग्-, सप्तमी बहुवचन स्रक्षु। लिङ्ग बदलने पर भी हलन्त शब्दों के रूप नहीं बदलते — यह इस परिशिष्ट का महत्त्वपूर्ण पाठ है।

‘ज्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘स्रज्’ शब्दः — पृष्ठ 190
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमास्रग्, स्रक्स्रजौस्रजः
द्वितीयास्रजम्स्रजौस्रजः
तृतीयास्रजास्रग्भ्याम्स्रग्भिः
चतुर्थीस्रजेस्रग्भ्याम्स्रग्भ्यः
पञ्चमीस्रजःस्रग्भ्याम्स्रग्भ्यः
षष्ठीस्रजःस्रजोःस्रजाम्
सप्तमीस्रजिस्रजोःस्रक्षु
सम्बोधनम्हे स्रग्, हे स्रक्हे स्रजौहे स्रजः
पुंलिङ्ग वणिज् और स्त्रीलिङ्ग स्रज् — रूप एक-से क्यों: हलन्त (व्यञ्जनान्त) शब्दों में सुप्-प्रत्यय तीनों लिङ्गों में एक ही लगते हैं और अङ्ग-परिवर्तन भी अन्तिम व्यञ्जन से तय होता है, लिङ्ग से नहीं। इसलिए ‘वणिजः’ और ‘स्रजः’ का ढाँचा समान है। लिङ्ग का भेद केवल विशेषण तथा सर्वनाम में दिखता है — ‘सा स्रक् सुन्दरी’ पर ‘सः वणिक् चतुरः’।

प्रयोग —

  • स्रक् देवस्य कण्ठे शोभते। (प्रथमा एक.)
  • बालिका स्रजम् रचयति। (द्वितीया एक.)
  • स्रजा अलङ्कृतः विग्रहः। (तृतीया एक.)
  • स्रग्भिः मण्डपः शोभितः। (तृतीया बहु.)
प्र४.
‘रुज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 190)
उत्तर

अर्थ — रोग, पीड़ा, व्याधि; प्रातिपदिक रुज् (स्त्रीलिङ्ग), ‘रुज्’ धातु (तोड़ना, पीड़ा देना) से। ‘रुजा’, ‘विरुज’ शब्द इसी परिवार के हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — रुज् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — रुग् / रुक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — रुज् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — स्रज् का जुड़वाँ साँचा — रुग्/रुक्, रुग्भ्याम्, रुक्षु। पुस्तक ने दोनों को एक ही पृष्ठ पर रखकर यह अभ्यास कराया है कि साँचा पहचानकर रूप स्वयं बनाया जा सके।

‘ज्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘रुज्’ शब्दः — पृष्ठ 190
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमारुग्, रुक्रुजौरुजः
द्वितीयारुजम्रुजौरुजः
तृतीयारुजारुग्भ्याम्रुग्भिः
चतुर्थीरुजेरुग्भ्याम्रुग्भ्यः
पञ्चमीरुजःरुग्भ्याम्रुग्भ्यः
षष्ठीरुजःरुजोःरुजाम्
सप्तमीरुजिरुजोःरुक्षु
सम्बोधनम्हे रुग्, हे रुक्हे रुजौहे रुजः
अर्थ की सावधानी: ‘रुज्’ स्त्रीलिङ्ग है, इसलिए विशेषण भी स्त्रीलिङ्ग में आएगा — ‘तीव्रा रुक्’ (तीव्र रोग), ‘तीव्रः रुक्’ नहीं। परीक्षा में लिङ्ग-सम्बन्धी यही चूक सबसे अधिक होती है।

प्रयोग —

  • तीव्रा रुक् तं बाधते। (प्रथमा एक.)
  • औषधं रुजम् नाशयति। (द्वितीया एक.)
  • रुजा पीडितः बालकः रोदिति। (तृतीया एक.)
  • रुग्भ्यः रक्षतु भिषक्। (पञ्चमी बहु. — अपादाने पञ्चमी)
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘वाच्’ का तृतीया एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — वाचा; वाक्षु।
  2. ‘त्वच्’ का प्रथमा एकवचन दोनों रूपों में लिखिए।
    उत्तर — त्वग्, त्वक्।
  3. ‘स्रज्’ तथा ‘रुज्’ के चतुर्थी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — स्रग्भ्यः; रुग्भ्यः।
  4. बताइए — ‘वाचौ’ में च् क्यों बचा रह गया, जबकि ‘वाग्भिः’ में वह ग् हो गया?
    उत्तर — ‘औ’ स्वर है और अङ्ग-प्रत्यय के बीच पद-सन्धि नहीं होती, इसलिए च् बना रहा; ‘भिस्’ व्यञ्जनादि है, वहाँ पदान्त च् → ग् (चोः कुः + जश्त्व)।
  5. रिक्तस्थान भरिए — कविः मधुरया ______ काव्यं पठति। (वाच्, तृतीया एकवचन)
    उत्तर — वाचा।
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