अर्थ — वाणी, वचन, बोली; प्रातिपदिक वाच् (स्त्रीलिङ्ग)। यही शब्द ‘वाक्’ के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध है — वाक्शक्ति, वाग्देवी, वाक्पटु, वाग्मी। इसी से गायत्री की देवी ‘वाग्देवी’ (सरस्वती) का नाम है।
मध्यम अङ्ग — वाग् / वाक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — वाच् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — स्त्रीलिङ्ग हलन्त शब्दों में बलवत्-दुर्बल का भेद नहीं होता; अङ्ग सर्वत्र वाच् रहता है। बदलता केवल पदान्त च् है — अकेले में वाग्/वाक्, व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले वाग्-, तथा ‘सु’ से पहले वाक्षु।
| ‘च्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘वाच्’ शब्दः — पृष्ठ 189 | |||
|---|---|---|---|
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमा | वाग्, वाक् | वाचौ | वाचः |
| द्वितीया | वाचम् | वाचौ | वाचः |
| तृतीया | वाचा | वाग्भ्याम् | वाग्भिः |
| चतुर्थी | वाचे | वाग्भ्याम् | वाग्भ्यः |
| पञ्चमी | वाचः | वाग्भ्याम् | वाग्भ्यः |
| षष्ठी | वाचः | वाचोः | वाचाम् |
| सप्तमी | वाचि | वाचोः | वाक्षु |
| सम्बोधनम् | हे वाग्, हे वाक् | हे वाचौ | हे वाचः |
प्रयोग —
- सत्या वाक् सर्वदा शोभते। (प्रथमा एक.)
- मधुरां वाचम् वदेत्। (द्वितीया एक.)
- वाचा मनसा कर्मणा च शुद्धिः। (तृतीया एक. — प्रसिद्ध वाक्यांश)
- वाग्भिः जनाः प्रसन्नाः भवन्ति। (तृतीया बहु.)
- वाक्षु संयमः आवश्यकः। (सप्तमी बहु.)