कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘विद्वस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 185)
उत्तर

अर्थ — विद्वान्, ज्ञानी; प्रातिपदिक विद्वस् (वस्तुतः विद् धातु से ‘क्वसु’ प्रत्यय द्वारा निष्पन्न — विद्वंस्)। इसी वर्ग में ससृवस्, तस्थिवस् आदि क्वसु-प्रत्ययान्त शब्द आते हैं। ‘विद्वान्’ शब्द विशेषण भी है, इसलिए यह वाक्य में संज्ञा के साथ भी लगता है — ‘विद्वान् जनः’।

बलवत् (strong) अङ्ग — विद्वांस् : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — विद्वद् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — विदुष् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — तीनों अङ्ग देखने में बहुत अलग हैं और यही इस शब्द की कठिनाई है — विद्वांस् (अनुस्वार सहित), विद्वद् (व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले), विदुष् (शेष सब जगह)। ‘विदुष्’ में ‘व’ का ‘उ’ हो जाता है (सम्प्रसारण) और स् का ष् (षत्व) — इसीलिए विदुषा, विदुषे, विदुषि।

‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘विद्वस्’ शब्दः — पृष्ठ 185
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाविद्वान्विद्वांसौविद्वांसः
द्वितीयाविद्वांसम्विद्वांसौविदुषः
तृतीयाविदुषाविद्वद्भ्याम्विद्वद्भिः
चतुर्थीविदुषेविद्वद्भ्याम्विद्वद्भ्यः
पञ्चमीविदुषःविद्वद्भ्याम्विद्वद्भ्यः
षष्ठीविदुषःविदुषोःविदुषाम्
सप्तमीविदुषिविदुषोःविद्वत्सु
सम्बोधनम्हे विद्वन्हे विद्वांसौहे विद्वांसः
तीन खाने जिन पर परीक्षा में प्रश्न बनता है: (क) प्रथमा एकवचन विद्वान् — अनुस्वार नहीं, अनुनासिक न् है; (ख) सम्बोधन एकवचन हे विद्वन् — यहाँ ‘आ’ ह्रस्व होकर ‘अ’ हो जाता है, इसलिए ‘हे विद्वान्’ लिखना अशुद्ध है; (ग) सप्तमी बहुवचन विद्वत्सु — ‘विद्वद्’ का द् ‘सु’ से पहले चर्त्व द्वारा त् हो जाता है।

प्रयोग —

  • विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। (प्रथमा एक. — प्रसिद्ध सुभाषित-पंक्ति)
  • विदुषः वचनं श्रोतव्यम्। (षष्ठी एक. — सम्बन्धे षष्ठी)
  • विदुषा सह विवादः न कार्यः। (तृतीया एक.)
  • विद्वद्भिः शास्त्रं रचितम्। (तृतीया बहु. — कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया)
  • हे विद्वन्! मार्गं दर्शय। (सम्बोधन एक.)
समासों में यही अङ्ग दिखता है: विद्वद्जन, विद्वत्सभा, विद्वत्ता — सब मध्यम अङ्ग ‘विद्वद्/विद्वत्’ से बने हैं; और ‘विदुषी’ (विद्वान् स्त्री) दुर्बल अङ्ग ‘विदुष्’ से।
प्र२.
‘चन्द्रमस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 186)
उत्तर

अर्थ — चन्द्रमा, चाँद; प्रातिपदिक चन्द्रमस् (पुंलिङ्ग, ‘अस्’-अन्त)। ध्यान रहे कि चन्द्र (अ-कारान्त) और चन्द्रमस् (स्-कारान्त) दो अलग शब्द हैं — रूप भी अलग चलते हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — चन्द्रमास् (प्र.एक. में दीर्घ) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — चन्द्रमो : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — चन्द्रमस् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — ‘अस्’-अन्त पुंलिङ्ग का साँचा तीन बातों से पहचाना जाता है : (क) प्रथमा एकवचन में ‘अ’ दीर्घ होकर स् विसर्ग बन जाता है — चन्द्रमाः; (ख) भ्याम्, भिस्, भ्यस् से पहले ‘अस्’ का हो जाता है — चन्द्रमोभ्याम्, चन्द्रमोभिः; (ग) शेष सर्वत्र ‘चन्द्रमस्’ ज्यों-का-त्यों — चन्द्रमसा, चन्द्रमसे, चन्द्रमसि।

‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘चन्द्रमस्’ शब्दः — पृष्ठ 186
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाचन्द्रमाःचन्द्रमसौचन्द्रमसः
द्वितीयाचन्द्रमसम्चन्द्रमसौचन्द्रमसः
तृतीयाचन्द्रमसाचन्द्रमोभ्याम्चन्द्रमोभिः
चतुर्थीचन्द्रमसेचन्द्रमोभ्याम्चन्द्रमोभ्यः
पञ्चमीचन्द्रमसःचन्द्रमोभ्याम्चन्द्रमोभ्यः
षष्ठीचन्द्रमसःचन्द्रमसोःचन्द्रमसाम्
सप्तमीचन्द्रमसिचन्द्रमसोःचन्द्रमस्सु
सम्बोधनम्हे चन्द्रमःहे चन्द्रमसौहे चन्द्रमसः
‘ओ’ कहाँ से आया — चन्द्रमस् + भिस् → स् का रुत्व (स् → र्) → चन्द्रमर् + भिस् → र् का उत्व (र् → उ) → चन्द्रम + उ + भिः → गुण (अ + उ = ओ) → चन्द्रमोभिः
यही प्रक्रिया मनस् → मनोभिः, तपस् → तपोभ्यः, यशस् → यशोभिः में चलती है।
सम्बोधन एकवचन ‘हे चन्द्रमः’ क्यों: सम्बोधन में अङ्ग ह्रस्व रह जाता है — दीर्घ ‘आ’ नहीं होता — और अन्तिम स् विसर्ग बन जाता है। इसलिए प्रथमा ‘चन्द्रमाः’ पर सम्बोधन ‘हे चन्द्रमः’। यही भेद वेधस् में भी है (वेधाः / हे वेधः)।

प्रयोग —

  • चन्द्रमाः रात्रौ प्रकाशते। (प्रथमा एक.)
  • कवयः चन्द्रमसम् वर्णयन्ति। (द्वितीया एक.)
  • चन्द्रमसा सह ताराः शोभन्ते। (तृतीया एक.)
  • चन्द्रमसः कान्तिः शीतला। (षष्ठी एक.)
पुस्तक के पाठ से मिलान: यहाँ सप्तमी बहुवचन में पुस्तक केवल चन्द्रमस्सु छापती है, जबकि वेधस्, मनस्, तपस्, पयस्, शिरस्, छन्दस् में वह विसर्ग वाला और स् वाला — दोनों रूप देती है (वेधःसु, वेधस्सु)। नियम की दृष्टि से चन्द्रमस् में भी दोनों रूप — चन्द्रमःसु तथा चन्द्रमस्सु — शुद्ध हैं; पुस्तक ने संक्षेप में एक ही छापा है। परीक्षा में पुस्तक का छपा रूप लिखना सुरक्षित है।
प्र३.
‘पुंस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 186)
उत्तर

अर्थ — पुरुष, नर; प्रातिपदिक पुंस् (पुंलिङ्ग)। यह भी अनियमित शब्द है और इसी से ‘पुंलिङ्ग’, ‘पुंस्त्व’, ‘पुंसवन’ शब्द बने हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — पुमांस् : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — पुं / पुम् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — पुंस् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — बलवत् अङ्ग में पुमांस् (म् आ जाता है), दुर्बल में पुंस्, और व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले दो विकल्प — पुंभ्याम् तथा पुम्भ्याम्, पुंभिः तथा पुम्भिः। अनुस्वार और म् — दोनों लिखे जा सकते हैं, इसीलिए पुस्तक हर ऐसे खाने में दो रूप छापती है।

‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘पुंस्’ शब्दः — पृष्ठ 186
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमापुमान्पुमांसौपुमांसः
द्वितीयापुमांसम्पुमांसौपुंसः
तृतीयापुंसापुंभ्याम्, पुम्भ्याम्पुंभिः, पुम्भिः
चतुर्थीपुंसेपुंभ्याम्, पुम्भ्याम्पुंभ्यः, पुम्भ्यः
पञ्चमीपुंसःपुंभ्याम्, पुम्भ्याम्पुंभ्यः, पुम्भ्यः
षष्ठीपुंसःपुंसोःपुंसाम्
सप्तमीपुंसिपुंसोःपुंसु
सम्बोधनम्हे पुमन्हे पुमांसौहे पुमांसः
प्रथमा ‘पुमान्’ और सम्बोधन ‘हे पुमन्’: जैसे विद्वान् / हे विद्वन् में, वैसे ही यहाँ भी सम्बोधन में दीर्घ ‘आ’ ह्रस्व हो जाता है। और द्वितीया बहुवचन ‘पुंसः’ — यहीं बल समाप्त होकर दुर्बल अङ्ग आरम्भ होता है, इसलिए द्वितीया एकवचन ‘पुमांसम्’ से यह बिलकुल अलग दिखता है।

प्रयोग —

  • पुमान् स्त्री च समानौ स्तः। (प्रथमा एक.)
  • राजा पुंसः रक्षति। (द्वितीया बहु.)
  • पुंसा कृतं कर्म फलति। (तृतीया एक.)
  • पुंसाम् मध्ये सः श्रेष्ठः। (षष्ठी बहु.)
व्याकरण-सम्बन्ध: ‘पुंलिङ्ग’ शब्द ही ‘पुंस् + लिङ्ग’ है — अर्थात् ‘पुरुष का चिह्न’। इसी तरह ‘पुंस्कोकिल’ (नर कोयल) में भी यही शब्द है।
प्र४.
‘वेधस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 187)
उत्तर

अर्थ — विधाता, सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा का पर्याय); प्रातिपदिक वेधस् (‘अस्’-अन्त पुंलिङ्ग)। यह ठीक वही साँचा है जो चन्द्रमस् का है — इसीलिए पुस्तक ने दोनों को पास-पास रखा है।

बलवत् (strong) अङ्ग — वेधास् (प्र.एक. में दीर्घ) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — वेधो : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — वेधस् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — प्रथमा एकवचन वेधाः (दीर्घ + विसर्ग), मध्यम अङ्ग में वेधो- (वेधोभ्याम्, वेधोभिः, वेधोभ्यः), शेष सर्वत्र वेधस्। सम्बोधन में ह्रस्व — हे वेधः

‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘वेधस्’ शब्दः — पृष्ठ 187
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमावेधाःवेधसौवेधसः
द्वितीयावेधसम्वेधसौवेधसः
तृतीयावेधसावेधोभ्याम्वेधोभिः
चतुर्थीवेधसेवेधोभ्याम्वेधोभ्यः
पञ्चमीवेधसःवेधोभ्याम्वेधोभ्यः
षष्ठीवेधसःवेधसोःवेधसाम्
सप्तमीवेधसिवेधसोःवेधःसु, वेधस्सु
सम्बोधनम्हे वेधःहे वेधसौहे वेधसः
सप्तमी बहुवचन में दो रूप क्यों: वेधस् + सु में स् के आगे स् आ जाता है। पहला स् या तो विसर्ग बन जाता है (वेधःसु) या ज्यों-का-त्यों रह जाता है (वेधस्सु) — दोनों शुद्ध हैं, इसीलिए पुस्तक दोनों छापती है। यही विकल्प मनस्, तपस्, पयस्, शिरस्, छन्दस् में भी दिखेगा।

प्रयोग —

  • वेधाः जगत् सृजति। (प्रथमा एक.)
  • वेधसा निर्मितम् इदं विश्वम्। (तृतीया एक.)
  • वेधसे नमः। (चतुर्थी एक. — नमः के योग में चतुर्थी)
  • हे वेधः! रक्ष माम्। (सम्बोधन एक.)
ध्यान दें: ‘नमः’, ‘स्वाहा’, ‘स्वस्ति’, ‘अलम्’ के योग में चतुर्थी आती है — इसलिए ‘वेधसे नमः’ शुद्ध है, ‘वेधसः नमः’ नहीं।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘विद्वस्’ का सम्बोधन एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — हे विद्वन्; विद्वत्सु।
  2. ‘चन्द्रमस्’ का तृतीया बहुवचन बनाकर उसकी प्रक्रिया एक पंक्ति में लिखिए।
    उत्तर — चन्द्रमोभिः — स् का रुत्व, र् का उत्व, फिर अ + उ = ओ (गुण)।
  3. ‘वेधस्’ की चतुर्थी बहुवचन लिखिए तथा बताइए कि प्रथमा और सम्बोधन एकवचन में क्या भेद है।
    उत्तर — वेधोभ्यः। प्रथमा में दीर्घ — वेधाः; सम्बोधन में ह्रस्व — हे वेधः।
  4. ‘पुंस्’ के तृतीया द्विवचन के दोनों शुद्ध रूप लिखिए।
    उत्तर — पुंभ्याम्, पुम्भ्याम्।
  5. रिक्तस्थान भरिए — ______ वचनं सर्वैः आदरणीयम्। (विद्वस्, षष्ठी एकवचन)
    उत्तर — विदुषः।
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