अर्थ — विद्वान्, ज्ञानी; प्रातिपदिक विद्वस् (वस्तुतः विद् धातु से ‘क्वसु’ प्रत्यय द्वारा निष्पन्न — विद्वंस्)। इसी वर्ग में ससृवस्, तस्थिवस् आदि क्वसु-प्रत्ययान्त शब्द आते हैं। ‘विद्वान्’ शब्द विशेषण भी है, इसलिए यह वाक्य में संज्ञा के साथ भी लगता है — ‘विद्वान् जनः’।
मध्यम अङ्ग — विद्वद् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — विदुष् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — तीनों अङ्ग देखने में बहुत अलग हैं और यही इस शब्द की कठिनाई है — विद्वांस् (अनुस्वार सहित), विद्वद् (व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले), विदुष् (शेष सब जगह)। ‘विदुष्’ में ‘व’ का ‘उ’ हो जाता है (सम्प्रसारण) और स् का ष् (षत्व) — इसीलिए विदुषा, विदुषे, विदुषि।
| ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘विद्वस्’ शब्दः — पृष्ठ 185 | |||
|---|---|---|---|
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमा | विद्वान् | विद्वांसौ | विद्वांसः |
| द्वितीया | विद्वांसम् | विद्वांसौ | विदुषः |
| तृतीया | विदुषा | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भिः |
| चतुर्थी | विदुषे | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| पञ्चमी | विदुषः | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| षष्ठी | विदुषः | विदुषोः | विदुषाम् |
| सप्तमी | विदुषि | विदुषोः | विद्वत्सु |
| सम्बोधनम् | हे विद्वन् | हे विद्वांसौ | हे विद्वांसः |
प्रयोग —
- विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। (प्रथमा एक. — प्रसिद्ध सुभाषित-पंक्ति)
- विदुषः वचनं श्रोतव्यम्। (षष्ठी एक. — सम्बन्धे षष्ठी)
- विदुषा सह विवादः न कार्यः। (तृतीया एक.)
- विद्वद्भिः शास्त्रं रचितम्। (तृतीया बहु. — कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया)
- हे विद्वन्! मार्गं दर्शय। (सम्बोधन एक.)