अर्थ — ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता; प्रातिपदिक ब्रह्मन् (न्-कारान्त, पुंलिङ्ग)। इसी साँचे पर आत्मन्, राजन्, अध्वन्, यजमान् जैसे ‘अन्’-अन्त पुंलिङ्ग शब्द चलते हैं।
मध्यम अङ्ग — ब्रह्म : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — ब्रह्मण् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — तीनों अङ्गों में भेद केवल इतना है : बलवत् में ‘आ’ दीर्घ रहता है (ब्रह्माण्), मध्यम में न् पूरा गिर जाता है (ब्रह्म + भ्याम्), दुर्बल में ‘अ’ लुप्त होकर ण् बचता है (ब्रह्मण् + आ = ब्रह्मणा)। न् का ण् णत्व से होता है, क्योंकि उससे पहले ‘र्’ है — रषाभ्यां नो णः।
| ‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘ब्रह्मन्’ शब्दः — पृष्ठ 184 | |||
|---|---|---|---|
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमा | ब्रह्मा | ब्रह्माणौ | ब्रह्माणः |
| द्वितीया | ब्रह्माणम् | ब्रह्माणौ | ब्रह्मणः |
| तृतीया | ब्रह्मणा | ब्रह्मभ्याम् | ब्रह्मभिः |
| चतुर्थी | ब्रह्मणे | ब्रह्मभ्याम् | ब्रह्मभ्यः |
| पञ्चमी | ब्रह्मणः | ब्रह्मभ्याम् | ब्रह्मभ्यः |
| षष्ठी | ब्रह्मणः | ब्रह्मणोः | ब्रह्मणाम् |
| सप्तमी | ब्रह्मणि | ब्रह्मणोः | ब्रह्मसु |
| सम्बोधनम् | हे ब्रह्मन् | हे ब्रह्माणौ | हे ब्रह्माणः |
प्रयोग —
- ब्रह्मा जगतः स्रष्टा अस्ति। (प्रथमा एक. — कर्तरि प्रथमा)
- जनाः ब्रह्माणम् नमन्ति। (द्वितीया एक. — कर्मणि द्वितीया)
- ब्रह्मणा सृष्टिः रचिता। (तृतीया एक. — कर्तरि तृतीया, कर्मवाच्य में)
- ब्रह्मणः वरदानम् अलभत। (षष्ठी एक. — सम्बन्धे षष्ठी)
- हे ब्रह्मन्! प्रसीद। (सम्बोधन एक.)