कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 ‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘ब्रह्मन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 184)
उत्तर

अर्थ — ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता; प्रातिपदिक ब्रह्मन् (न्-कारान्त, पुंलिङ्ग)। इसी साँचे पर आत्मन्, राजन्, अध्वन्, यजमान् जैसे ‘अन्’-अन्त पुंलिङ्ग शब्द चलते हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — ब्रह्माण् : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — ब्रह्म : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — ब्रह्मण् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — तीनों अङ्गों में भेद केवल इतना है : बलवत् में ‘आ’ दीर्घ रहता है (ब्रह्माण्), मध्यम में न् पूरा गिर जाता है (ब्रह्म + भ्याम्), दुर्बल में ‘अ’ लुप्त होकर ण् बचता है (ब्रह्मण् + आ = ब्रह्मणा)। न् का ण् णत्व से होता है, क्योंकि उससे पहले ‘र्’ है — रषाभ्यां नो णः

‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘ब्रह्मन्’ शब्दः — पृष्ठ 184
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाब्रह्माब्रह्माणौब्रह्माणः
द्वितीयाब्रह्माणम्ब्रह्माणौब्रह्मणः
तृतीयाब्रह्मणाब्रह्मभ्याम्ब्रह्मभिः
चतुर्थीब्रह्मणेब्रह्मभ्याम्ब्रह्मभ्यः
पञ्चमीब्रह्मणःब्रह्मभ्याम्ब्रह्मभ्यः
षष्ठीब्रह्मणःब्रह्मणोःब्रह्मणाम्
सप्तमीब्रह्मणिब्रह्मणोःब्रह्मसु
सम्बोधनम्हे ब्रह्मन्हे ब्रह्माणौहे ब्रह्माणः
तीन खाने विशेष ध्यान माँगते हैं: (क) प्रथमा एकवचन ब्रह्मा — सु प्रत्यय लुप्त, अन्तिम न् का लोप, और उससे पहले का ‘अ’ दीर्घ हो जाता है। (ख) द्वितीया बहुवचन ब्रह्मणः — यहीं से दुर्बल अङ्ग शुरू होता है, इसलिए यह द्वितीया एकवचन ‘ब्रह्माणम्’ से बिलकुल अलग दिखता है। (ग) सम्बोधन एकवचन हे ब्रह्मन् — यहाँ न् बना रहता है और ‘आ’ नहीं होता; यही प्रथमा ‘ब्रह्मा’ से इसका भेद है।

प्रयोग —

  • ब्रह्मा जगतः स्रष्टा अस्ति। (प्रथमा एक. — कर्तरि प्रथमा)
  • जनाः ब्रह्माणम् नमन्ति। (द्वितीया एक. — कर्मणि द्वितीया)
  • ब्रह्मणा सृष्टिः रचिता। (तृतीया एक. — कर्तरि तृतीया, कर्मवाच्य में)
  • ब्रह्मणः वरदानम् अलभत। (षष्ठी एक. — सम्बन्धे षष्ठी)
  • हे ब्रह्मन्! प्रसीद। (सम्बोधन एक.)
यही साँचा, दूसरा शब्द: आत्मन् → आत्मा, आत्मानौ, आत्मानः; आत्मना, आत्मभ्याम्, आत्मभिः; आत्मनि, आत्मसु। राजन् → राजा, राजानौ, राजानः; पर दुर्बल अङ्ग ‘राज्ञ्’ है — राज्ञा, राज्ञः, राज्ञि, राजसु। भेद केवल दुर्बल अङ्ग का है, ढाँचा वही।
प्र२.
‘गुणिन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 184)
उत्तर

अर्थ — गुणवान्, गुणी पुरुष; प्रातिपदिक गुणिन् = गुण + इन् (मतुबर्थीय ‘इन्’ प्रत्यय)। इसी साँचे पर धनिन्, बलिन्, मनस्विन्, तपस्विन्, ज्ञानिन्, दण्डिन् — सारे ‘इन्’-प्रत्ययान्त पुंलिङ्ग शब्द चलते हैं। हिन्दी के ‘गुणी, धनी, ज्ञानी’ यहीं से आए हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — गुणिन् (दीर्घ ई सहित प्र.एक. गुणी) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — गुणि : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — गुणिन् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — यह ब्रह्मन् से सरल है, क्योंकि इसमें बलवत् और दुर्बल अङ्ग एक ही हैं — गुणिन्। केवल दो बातें याद रखनी हैं : (क) प्रथमा एकवचन में न् गिरकर ‘इ’ दीर्घ हो जाता है — गुणी; (ख) व्यञ्जनादि प्रत्यय (भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु) से पहले न् गिर जाता है — गुणिभ्याम्, गुणिभिः, गुणिषु

‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘गुणिन्’ शब्दः — पृष्ठ 184
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमागुणीगुणिनौगुणिनः
द्वितीयागुणिनम्गुणिनौगुणिनः
तृतीयागुणिनागुणिभ्याम्गुणिभिः
चतुर्थीगुणिनेगुणिभ्याम्गुणिभ्यः
पञ्चमीगुणिनःगुणिभ्याम्गुणिभ्यः
षष्ठीगुणिनःगुणिनोःगुणिनाम्
सप्तमीगुणिनिगुणिनोःगुणिषु
सम्बोधनम्हे गुणिन्हे गुणिनौहे गुणिनः
प्रथमा और द्वितीया बहुवचन एक जैसे क्यों: दोनों में ‘गुणिनः’ है। इसमें कोई भूल नहीं — ‘इन्’-अन्त शब्दों में जस् (प्र.बहु.) और शस् (द्वि.बहु.) दोनों के बाद अङ्ग दुर्बल ही रहता है, इसलिए रूप समान हो जाता है। वाक्य में कौन-सी विभक्ति है, यह क्रिया से तय होता है : ‘गुणिनः पूज्यन्ते’ (प्रथमा) पर ‘गुणिनः पूजयामः’ (द्वितीया)।

प्रयोग —

  • गुणी जनः सर्वत्र पूज्यते। (प्रथमा एक.)
  • वयं गुणिनम् सत्करिष्यामः। (द्वितीया एक.)
  • गुणिना सह मैत्री शुभा। (तृतीया एक. — सहयोगे तृतीया)
  • गुणिषु ईर्ष्या न कर्तव्या। (सप्तमी बहु. — न् का लोप देखिए)
  • हे गुणिन्! त्वं धन्यः। (सम्बोधन एक.)
ध्यान दें: सप्तमी बहुवचन गुणिषु है, ‘गुणिनसु’ नहीं। ‘सु’ भी व्यञ्जनादि प्रत्यय है, इसलिए उससे पहले न् गिरता है; फिर ‘इ’ के कारण षत्व होकर सु → षु हो जाता है।
प्र३.
‘पथिन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः (पृष्ठ 185)
उत्तर

अर्थ — मार्ग, रास्ता; प्रातिपदिक पथिन् (पुंलिङ्ग)। यह परिशिष्ट के सबसे अनियमित (irregular) शब्दों में है, इसलिए इसे साँचे से नहीं, रूपों से याद करना पड़ता है। इसी वर्ग में मथिन् तथा ऋभुक्षिन् आते हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — पन्थान् (प्र.एक. में पन्थाः) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — पथि : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — पथ् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — तीनों अङ्ग तीन भिन्न दिखते हैं — पन्थान् (बलवत्), पथि (मध्यम, व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले), पथ् (दुर्बल)। इसलिए एक ही तालिका में ‘पन्थाः’, ‘पथिभ्याम्’ और ‘पथा’ — तीनों दिखते हैं। प्रथमा एकवचन में पन्थाः विसर्गान्त है, यह विशेष रूप है।

‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः ‘पथिन्’ शब्दः — पृष्ठ 185
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमापन्थाःपन्थानौपन्थानः
द्वितीयापन्थानम्पन्थानौपथः
तृतीयापथापथिभ्याम्पथिभिः
चतुर्थीपथेपथिभ्याम्पथिभ्यः
पञ्चमीपथःपथिभ्याम्पथिभ्यः
षष्ठीपथःपथोःपथाम्
सप्तमीपथिपथोःपथिषु
सम्बोधनम्हे पन्थाःहे पन्थानौहे पन्थानः
द्वितीया एकवचन और बहुवचन का बड़ा अन्तर: द्वितीया एकवचन पन्थानम् (बलवत् अङ्ग) है, पर द्वितीया बहुवचन पथः (दुर्बल अङ्ग) — दोनों देखने में बिलकुल असम्बद्ध लगते हैं। यही इस शब्द की परीक्षा-दृष्टि से सबसे भूल-योग्य जोड़ी है। इसे इस तरह याद कीजिए : जहाँ तक ‘बल’ चलता है (प्रथमा तीनों + द्वितीया एक./द्वि.) वहाँ पन्थान्, उसके बाद सर्वत्र पथ्, और व्यञ्जनादि प्रत्यय से पहले पथि

प्रयोग —

  • अयं पन्थाः ग्रामं नयति। (प्रथमा एक.)
  • सः दीर्घं पन्थानम् अगच्छत्। (द्वितीया एक.)
  • पथा गच्छन् बालकः गीतम् अगायत्। (तृतीया एक. — मार्ग के अर्थ में तृतीया)
  • पथि वृक्षाः सन्ति। (सप्तमी एक. — अधिकरणे सप्तमी)
  • ग्रामस्य पथिषु दीपाः ज्वलन्ति। (सप्तमी बहु.)
शब्द-सम्बन्ध: ‘पथि’ रूप से ही सुभाषितों का प्रसिद्ध ‘सत्पथि’ (सत् + पथि = सन्मार्ग में) बना है, और ‘पथिक’ (यात्री) शब्द भी इसी मूल से है। ‘पन्थाः’ से हिन्दी का ‘पन्थ’ बना।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘ब्रह्मन्’ का द्वितीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — ब्रह्मणः; ब्रह्मसु।
  2. ‘गुणिन्’ का चतुर्थी एकवचन तथा षष्ठी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — गुणिने; गुणिनाम्।
  3. ‘पथिन्’ का द्वितीया एकवचन और द्वितीया बहुवचन दोनों लिखकर बताइए कि वे इतने भिन्न क्यों हैं।
    उत्तर — पन्थानम्; पथः। एकवचन में बलवत् अङ्ग ‘पन्थान्’ चलता है, बहुवचन में दुर्बल अङ्ग ‘पथ्’।
  4. रिक्तस्थान भरिए — हे ______ ! त्वं मे मार्गदर्शकः असि। (गुणिन्, सम्बोधन एकवचन)
    उत्तर — हे गुणिन्।
  5. ‘आत्मन्’ शब्द को ब्रह्मन् के साँचे पर चलाकर तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी एकवचन लिखिए।
    उत्तर — आत्मभिः; आत्मनि।
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