प्र१.
‘सुप्’ किसे कहते हैं और पुस्तक की यह अन्तिम तालिका क्या बताती है?
उत्तर
सीधा उत्तर — प्रातिपदिक (मूल शब्द) के आगे लगकर उसे वाक्य-योग्य पद बनाने वाले इक्कीस प्रत्ययों के समूह को सुप् कहते हैं। नाम इसी से बना है — पहला प्रत्यय सु, अन्तिम सुप्; ‘सु’ से ‘प्’ तक = सुप्। जिस शब्द में ये लगते हैं वह सुबन्त कहलाता है। सात विभक्तियाँ × तीन वचन = इक्कीस प्रत्यय।
| सुप्-प्रत्ययाः (पुंलिङ्गे स्त्रीलिङ्गे नपुंसकलिङ्गे च) — पृष्ठ 198 | |||
|---|---|---|---|
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमा | सु | औ | जस् |
| द्वितीया | अम् | औट् | शस् |
| तृतीया | टा | भ्याम् | भिस् |
| चतुर्थी | ङे | भ्याम् | भ्यस् |
| पञ्चमी | ङसि | भ्याम् | भ्यस् |
| षष्ठी | ङस् | ओस् | आम् |
| सप्तमी | ङि | ओस् | सुप् |
ये अक्षर वैसे-के-वैसे क्यों नहीं दिखते: इनमें कुछ वर्ण केवल संकेत (इत्) हैं और लगते ही लुप्त हो जाते हैं — जस् का स् इत् है, ङे का ङ्, ङसि/ङस् का ङ्, टा का ट्, औट् का ट्। इसीलिए तालिका में ‘जस्’ लिखा है पर बालक में दिखता है ‘बालकाः’, और ‘ङे’ लिखा है पर दिखता है ‘बालकाय’। संस्कृत-व्याकरण में यह संकेत-विधि इसलिए है कि एक ही चिह्न से यह भी पता चल जाए कि प्रत्यय किस प्रकार का व्यवहार करेगा।
दो व्यावहारिक बातें —
- सम्बोधन की अलग पंक्ति नहीं है। तालिका में सात ही पंक्तियाँ हैं, क्योंकि सम्बोधन की अपनी विभक्ति नहीं होती — वह प्रथमा के ‘सु, औ, जस्’ से ही बनता है, केवल एकवचन में विशेष रूप हो जाता है (हे ब्रह्मन्, हे विद्वन्, हे वेधः)। शब्दरूप-तालिकाओं में पुस्तक ने उसे आठवीं पंक्ति में सुविधा के लिए जोड़ा है।
- प्रत्यय तीनों लिङ्गों में एक ही हैं। तालिका का शीर्षक ही यह कहता है — ‘पुंलिङ्गे स्त्रीलिङ्गे नपुंसकलिङ्गे च’। रूप में जो भेद दिखता है (बालकाः / लताः / फलानि) वह प्रत्यय के भेद से नहीं, अङ्ग पर होने वाले आदेशों से आता है।
बनने की प्रक्रिया एक उदाहरण से —
वाच् + भिस् (तृतीया बहुवचन) → वाच् का पदान्त च् → ग् (जश्त्व) → वाग्भिः
मनस् + भ्यस् (चतुर्थी बहुवचन) → स् → र् (रुत्व) → उ (उत्व) → अ + उ = ओ (गुण) → मनोभ्यः
जगत् + जस् (प्रथमा बहुवचन, नपुंसक) → नुम् आगम + दीर्घ → जगन्ति
वाच् + भिस् (तृतीया बहुवचन) → वाच् का पदान्त च् → ग् (जश्त्व) → वाग्भिः
मनस् + भ्यस् (चतुर्थी बहुवचन) → स् → र् (रुत्व) → उ (उत्व) → अ + उ = ओ (गुण) → मनोभ्यः
जगत् + जस् (प्रथमा बहुवचन, नपुंसक) → नुम् आगम + दीर्घ → जगन्ति
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
- तृतीया द्विवचन तथा षष्ठी बहुवचन के सुप्-प्रत्यय लिखिए।
उत्तर — भ्याम्; आम्। - ‘सुप्’ नाम कैसे बना?
उत्तर — आदि प्रत्यय सु तथा अन्तिम प्रत्यय सुप् — इन दोनों को जोड़कर पूरे समूह का नाम ‘सुप्’ पड़ा। - ‘ङे’ प्रत्यय में इत् संज्ञक वर्ण कौन-सा है और शेष क्या बचता है?
उत्तर — ङ् इत् है, शेष ‘ए’ बचता है — बालक + ङे → बालकाय (यहाँ ‘आय’ आदेश), ब्रह्मन् + ङे → ब्रह्मणे। - सुप् की तालिका में सम्बोधन की पंक्ति क्यों नहीं है?
उत्तर — सम्बोधन की स्वतन्त्र विभक्ति नहीं होती; वह प्रथमा के प्रत्ययों से ही बनता है, केवल एकवचन में विशेष रूप होता है।