कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 नपुंसकलिङ्गरूपाणि के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘मनस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 195)
उत्तर

अर्थ — मन, चित्त; प्रातिपदिक मनस् (नपुंसकलिङ्ग)। यह ‘अस्’-अन्त नपुंसक शब्दों का आदर्श साँचा है — तपस्, पयस्, शिरस्, छन्दस्, यशस्, वचस्, तेजस्, ओजस्, वयस्, नभस्, अम्बरस् — सब इसी पर चलते हैं। इसीलिए पुस्तक ने इसे नपुंसक ‘स्’ खण्ड में सबसे पहले रखा है।

बलवत् (strong) अङ्ग — मनास् (बहुवचन में मनांसि — दीर्घ + नुम्) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — मनो : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — मनस् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — तीन बातें ही याद रखनी हैं :

(१) प्रथमा-द्वितीया एकवचन में स् → विसर्ग : मनः
(२) भ्याम्, भिस्, भ्यस् से पहले ‘अस्’ → : मनोभ्याम्, मनोभिः, मनोभ्यः
(३) बहुवचन में नुम् + दीर्घ : मनांसि · शेष सर्वत्र ‘मनस्’ ज्यों-का-त्यों : मनसा, मनसे, मनसः, मनसि
‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘मनस्’ शब्दः — पृष्ठ 195
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमामनःमनसीमनांसि
द्वितीयामनःमनसीमनांसि
तृतीयामनसामनोभ्याम्मनोभिः
चतुर्थीमनसेमनोभ्याम्मनोभ्यः
पञ्चमीमनसःमनोभ्याम्मनोभ्यः
षष्ठीमनसःमनसोःमनसाम्
सप्तमीमनसिमनसोःमनःसु, मनस्सु
सम्बोधनम्हे मनःहे मनसीहे मनांसि
सप्तमी बहुवचन में दो रूप: मनस् + सु में दो स् आमने-सामने आ जाते हैं। पहला स् विसर्ग बन सकता है (मनःसु) या ज्यों-का-त्यों रह सकता है (मनस्सु) — दोनों शुद्ध हैं, और पुस्तक दोनों छापती है। तपस्, पयस्, शिरस्, छन्दस् में भी यही विकल्प मिलेगा।

प्रयोग —

  • मनः चञ्चलम् अस्ति। (प्रथमा एक. — गीता का प्रसिद्ध कथन)
  • मनसा ध्यायेत्। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
  • मनसः शान्तिः सुखस्य मूलम्। (षष्ठी एक.)
  • तेषां मनांसि प्रसन्नानि। (प्रथमा बहु.)
  • मनःसु सद्भावः वसतु। (सप्तमी बहु.)
‘ओ’ वाला अङ्ग समासों में: मनोरथ, मनोहर, मनोबल, मनोविज्ञान — सब ‘मनस् + …’ हैं, जहाँ स् का ओ हो गया। इसी तरह तपोवन, पयोधर, यशोगान, तेजोमय, शिरोमणि। समास पहचानते ही मूल शब्द ‘अस्’-अन्त है, यह अपने-आप पता चल जाता है।
प्र२.
‘तपस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 195)
उत्तर

अर्थ — तप, तपस्या, साधना; प्रातिपदिक तपस् (नपुंसकलिङ्ग), तप् धातु से। ‘तपस्वी’, ‘तपोवन’, ‘तपोबल’ इसी से बने हैं।

पहचान — मनस् का ठीक जुड़वाँ : तपः (प्र./द्वि. एक.), तपसी (द्वि.), तपांसि (बहु.), मध्यम अङ्ग तपो- (तपोभ्याम्, तपोभिः, तपोभ्यः), सप्तमी बहुवचन तपःसु, तपस्सु

‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘तपस्’ शब्दः — पृष्ठ 195
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमातपःतपसीतपांसि
द्वितीयातपःतपसीतपांसि
तृतीयातपसातपोभ्याम्तपोभिः
चतुर्थीतपसेतपोभ्याम्तपोभ्यः
पञ्चमीतपसःतपोभ्याम्तपोभ्यः
षष्ठीतपसःतपसोःतपसाम्
सप्तमीतपसितपसोःतपःसु, तपस्सु
सम्बोधनम्हे तपःहे तपसीहे तपांसि
‘तपः’ और ‘तपसी’ में स् कहाँ गया: प्रथमा एकवचन में ‘सु’ लुप्त होने पर पदान्त स् विसर्ग बन जाता है — तपस् → तपः। किन्तु द्विवचन में आगे ‘ई’ स्वर है, इसलिए स् पद के अन्त में नहीं पड़ता और बचा रह जाता है — तपसी। यही कारण है कि तपसा, तपसे, तपसि में भी स् दिखता है।

प्रयोग —

  • तपः सर्वसिद्धीनां मूलम्। (प्रथमा एक.)
  • ऋषिः तपसा सिद्धिम् अलभत। (तृतीया एक.)
  • तपसे वनं गतः। (चतुर्थी एक. — तादर्थ्ये चतुर्थी)
  • तेषां तपांसि महान्ति। (प्रथमा बहु.)
प्र३.
‘पयस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 196)
उत्तर

अर्थ — दूध; जल भी। प्रातिपदिक पयस् (नपुंसकलिङ्ग)। ‘पयोधर’ (बादल), ‘पयोधि’ (समुद्र), ‘क्षीर-नीर’ के स्थान पर ‘पयः’ — काव्य में बहुप्रयुक्त।

पहचान — वही ‘अस्’ साँचा : पयः, पयसी, पयांसि; मध्यम अङ्ग पयो-; सप्तमी बहुवचन पयःसु, पयस्सु

‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘पयस्’ शब्दः — पृष्ठ 196
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमापयःपयसीपयांसि
द्वितीयापयःपयसीपयांसि
तृतीयापयसापयोभ्याम्पयोभिः
चतुर्थीपयसेपयोभ्याम्पयोभ्यः
पञ्चमीपयसःपयोभ्याम्पयोभ्यः
षष्ठीपयसःपयसोःपयसाम्
सप्तमीपयसिपयसोःपयःसु, पयस्सु
सम्बोधनम्हे पयःहे पयसीहे पयांसि
अर्थ की दो धाराएँ: ‘पयः’ का अर्थ दूध भी है और जल भी — सन्दर्भ से तय होता है। ‘पयोधर’ = जल धारण करने वाला (बादल); ‘पयःपानम्’ = दुग्धपान। परीक्षा में अनुवाद करते समय वाक्य का सन्दर्भ देखकर अर्थ चुनिए।

प्रयोग —

  • धेनुः पयः ददाति। (द्वितीया एक. — कर्म)
  • शिशुः पयसा पुष्यति। (तृतीया एक.)
  • पयसः वर्णः श्वेतः। (षष्ठी एक.)
  • घटेषु पयांसि सन्ति। (प्रथमा बहु.)
प्र४.
‘शिरस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 196)
उत्तर

अर्थ — सिर, मस्तक; प्रातिपदिक शिरस् (नपुंसकलिङ्ग)। ‘शिरोमणि’, ‘शिरोधार्य’, ‘शिरोवेदना’ इसी से।

पहचान — शिरः, शिरसी, शिरांसि; मध्यम अङ्ग शिरो- (शिरोभ्याम्, शिरोभिः, शिरोभ्यः); सप्तमी बहुवचन शिरःसु, शिरस्सु

‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘शिरस्’ शब्दः — पृष्ठ 196
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाशिरःशिरसीशिरांसि
द्वितीयाशिरःशिरसीशिरांसि
तृतीयाशिरसाशिरोभ्याम्शिरोभिः
चतुर्थीशिरसेशिरोभ्याम्शिरोभ्यः
पञ्चमीशिरसःशिरोभ्याम्शिरोभ्यः
षष्ठीशिरसःशिरसोःशिरसाम्
सप्तमीशिरसिशिरसोःशिरःसु, शिरस्सु
सम्बोधनम्हे शिरःहे शिरसीहे शिरांसि
‘शिरसा’ का विशेष प्रयोग: तृतीया एकवचन ‘शिरसा’ ‘सिर से’ के अर्थ में आता है और आदर-सूचक वाक्यों में जमकर प्रयुक्त होता है — ‘शिरसा वहामि’ (सिर पर धारण करता हूँ), ‘शिरसा प्रणमामि’। यह करणे तृतीया का उत्तम उदाहरण है।

प्रयोग —

  • शिरः उन्नतं धारय। (द्वितीया एक.)
  • गुरुम् शिरसा प्रणमामि। (तृतीया एक.)
  • शिरसि मुकुटः शोभते। (सप्तमी एक.)
  • वीराणां शिरांसि उन्नतानि। (प्रथमा बहु.)
प्र५.
‘छन्दस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 197)
उत्तर

अर्थ — छन्द (पद्य का माप); वेद भी। प्रातिपदिक छन्दस् (नपुंसकलिङ्ग)। ‘छन्दःशास्त्र’ वेदाङ्गों में से एक है, और ‘छन्दोबद्ध’, ‘छन्दोमय’ शब्द इसी से बने हैं।

पहचान — छन्दः, छन्दसी, छन्दांसि; मध्यम अङ्ग छन्दो- (छन्दोभ्याम्, छन्दोभिः, छन्दोभ्यः); सप्तमी बहुवचन छन्दःसु, छन्दस्सु

‘स्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘छन्दस्’ शब्दः — पृष्ठ 197
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाछन्दःछन्दसीछन्दांसि
द्वितीयाछन्दःछन्दसीछन्दांसि
तृतीयाछन्दसाछन्दोभ्याम्छन्दोभिः
चतुर्थीछन्दसेछन्दोभ्याम्छन्दोभ्यः
पञ्चमीछन्दसःछन्दोभ्याम्छन्दोभ्यः
षष्ठीछन्दसःछन्दसोःछन्दसाम्
सप्तमीछन्दसिछन्दसोःछन्दःसु, छन्दस्सु
सम्बोधनम्हे छन्दःहे छन्दसीहे छन्दांसि
पाठ से जोड़िए: कक्षा ९ में ही आपने अनुष्टुप्, इन्द्रवज्रा, उपजाति आदि छन्दों के नाम सुने हैं। वे सब ‘छन्दांसि’ हैं। वेद के लिए भी ‘छन्दः’ शब्द आता है — ‘छन्दोभिः स्तुतः देवः’ अर्थात् वेदमन्त्रों से स्तुत।

प्रयोग —

  • अनुष्टुप् प्रसिद्धं छन्दः अस्ति। (प्रथमा एक.)
  • कविः छन्दसा काव्यं रचयति। (तृतीया एक.)
  • छन्दसः ज्ञानं काव्यार्थं आवश्यकम्। (षष्ठी एक.)
  • संस्कृतकाव्ये बहूनि छन्दांसि प्रयुक्तानि। (प्रथमा बहु.)
प्र६.
‘चक्षुष्’ शब्दः — ‘ष्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 197)
उत्तर

अर्थ — आँख, नेत्र; प्रातिपदिक पुस्तक में चक्षुष् लिखा है (मूल चक्षुस् — ‘उस्’-अन्त, जिसका स् उकार के बाद षत्व से ष् हो जाता है)। इसी साँचे पर धनुष् (धनुस्), हविष् (हविस्), आयुष् (आयुस्), ज्योतिष् (ज्योतिस्) चलते हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — चक्षूंष् (बहुवचन में चक्षूंषि — दीर्घ ऊ + नुम्) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — चक्षुर् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — चक्षुष् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — तीन विशेषताएँ जो इसे ‘मनस्’ से अलग करती हैं :

(१) प्रथमा एकवचन में विसर्ग तो बनता है, पर स्वर ‘उ’ है : चक्षुः (मनः के ‘अ’ के स्थान पर)
(२) मध्यम अङ्ग में ‘ओ’ नहीं, ‘उर्’ बनता है : चक्षुर्भ्याम्, चक्षुर्भिः, चक्षुर्भ्यः — क्योंकि उ के बाद रुत्व का र् गुण नहीं करता, वैसा ही रह जाता है
(३) बहुवचन में ‘उ’ दीर्घ होकर ऊ : चक्षूंषि (मनांसि के समान न्, पर स्वर ऊ)
‘ष्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘चक्षुष्’ शब्दः — पृष्ठ 197
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाचक्षुःचक्षुषीचक्षूंषि
द्वितीयाचक्षुःचक्षुषीचक्षूंषि
तृतीयाचक्षुषाचक्षुर्भ्याम्चक्षुर्भिः
चतुर्थीचक्षुषेचक्षुर्भ्याम्चक्षुर्भ्यः
पञ्चमीचक्षुषःचक्षुर्भ्याम्चक्षुर्भ्यः
षष्ठीचक्षुषःचक्षुषोःचक्षुषाम्
सप्तमीचक्षुषिचक्षुषोःचक्षुःषु, चक्षुष्षु
सम्बोधनम्हे चक्षुःहे चक्षुषीहे चक्षूंषि
स् का ष् क्यों: ‘इण्कोः’ नियम से — इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ तथा कवर्ग के बाद आने वाला स् प्रायः ष् हो जाता है। ‘चक्षुस्’ में उ के बाद स् है, इसलिए चक्षुष् — और इसी से चक्षुषा, चक्षुषी, चक्षुषः बनते हैं। पुस्तक ने तालिका का शीर्षक भी इसी बदले हुए रूप ‘चक्षुष्’ से दिया है; मूल प्रातिपदिक तो चक्षुस् ही है। सप्तमी बहुवचन में दोनों रूप छपे हैं — चक्षुःषु तथा चक्षुष्षु

प्रयोग —

  • चक्षुः ज्ञानस्य द्वारम्। (प्रथमा एक.)
  • चक्षुषा रूपं पश्यामः। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
  • तस्य चक्षुषी निर्मले स्तः। (प्रथमा द्वि. — दो आँखों के लिए द्विवचन)
  • सर्वेषां चक्षूंषि तत्र लग्नानि। (प्रथमा बहु.)
  • चक्षुर्भ्याम् जगत् पश्यामः। (तृतीया द्वि.)
यही साँचा, और शब्द: धनुष् → धनुः, धनुषी, धनूंषि; धनुषा, धनुर्भ्याम्, धनुर्भिः, धनुःषु/धनुष्षु। आयुष् → आयुः, आयुषी, आयूंषि। हविष् → हविः, हविषी, हवींषि (यहाँ इ के कारण ‘इर्’ — हविर्भिः)।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘मनस्’ का तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन (दोनों रूप) लिखिए।
    उत्तर — मनोभिः; मनःसु, मनस्सु।
  2. ‘तपस्’ का प्रथमा बहुवचन तथा चतुर्थी द्विवचन लिखिए।
    उत्तर — तपांसि; तपोभ्याम्।
  3. ‘चक्षुष्’ का तृतीया द्विवचन ‘मनस्’ के तृतीया द्विवचन से किस बात में भिन्न है?
    उत्तर — मनस् में ‘ओ’ बनता है — मनोभ्याम्; चक्षुष् में ‘उर्’ — चक्षुर्भ्याम्, क्योंकि उकार के बाद रुत्व का र् गुण नहीं करता।
  4. ‘शिरस्’ का सप्तमी एकवचन तथा ‘छन्दस्’ का प्रथमा बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — शिरसि; छन्दांसि।
  5. ‘धनुष्’ शब्द को चक्षुष् के साँचे पर चलाकर प्रथमा बहुवचन तथा तृतीया बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — धनूंषि; धनुर्भिः।
  6. बताइए — ‘मनोरथ’, ‘तपोवन’, ‘शिरोमणि’ में ‘ओ’ कहाँ से आया?
    उत्तर — अस्-अन्त शब्दों के स् का रुत्व (स् → र्), फिर उत्व (र् → उ), फिर अ + उ = ओ (गुण)।
  7. ‘पयस्’ का षष्ठी बहुवचन तथा ‘मनस्’ का पञ्चमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — पयसाम्; मनोभ्यः।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ