अर्थ — आँख, नेत्र; प्रातिपदिक पुस्तक में चक्षुष् लिखा है (मूल चक्षुस् — ‘उस्’-अन्त, जिसका स् उकार के बाद षत्व से ष् हो जाता है)। इसी साँचे पर धनुष् (धनुस्), हविष् (हविस्), आयुष् (आयुस्), ज्योतिष् (ज्योतिस्) चलते हैं।
बलवत् (strong) अङ्ग — चक्षूंष् (बहुवचन में चक्षूंषि — दीर्घ ऊ + नुम्) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — चक्षुर् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — चक्षुष् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — तीन विशेषताएँ जो इसे ‘मनस्’ से अलग करती हैं :
(१) प्रथमा एकवचन में विसर्ग तो बनता है, पर स्वर ‘उ’ है : चक्षुः (मनः के ‘अ’ के स्थान पर)
(२) मध्यम अङ्ग में ‘ओ’ नहीं, ‘उर्’ बनता है : चक्षुर्भ्याम्, चक्षुर्भिः, चक्षुर्भ्यः — क्योंकि उ के बाद रुत्व का र् गुण नहीं करता, वैसा ही रह जाता है
(३) बहुवचन में ‘उ’ दीर्घ होकर ऊ : चक्षूंषि (मनांसि के समान न्, पर स्वर ऊ)
स् का ष् क्यों: ‘इण्कोः’ नियम से — इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ तथा कवर्ग के बाद आने वाला स् प्रायः ष् हो जाता है। ‘चक्षुस्’ में उ के बाद स् है, इसलिए चक्षुष् — और इसी से चक्षुषा, चक्षुषी, चक्षुषः बनते हैं। पुस्तक ने तालिका का शीर्षक भी इसी बदले हुए रूप ‘चक्षुष्’ से दिया है; मूल प्रातिपदिक तो चक्षुस् ही है। सप्तमी बहुवचन में दोनों रूप छपे हैं — चक्षुःषु तथा चक्षुष्षु।
प्रयोग —
- चक्षुः ज्ञानस्य द्वारम्। (प्रथमा एक.)
- चक्षुषा रूपं पश्यामः। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
- तस्य चक्षुषी निर्मले स्तः। (प्रथमा द्वि. — दो आँखों के लिए द्विवचन)
- सर्वेषां चक्षूंषि तत्र लग्नानि। (प्रथमा बहु.)
- चक्षुर्भ्याम् जगत् पश्यामः। (तृतीया द्वि.)
यही साँचा, और शब्द: धनुष् → धनुः, धनुषी, धनूंषि; धनुषा, धनुर्भ्याम्, धनुर्भिः, धनुःषु/धनुष्षु। आयुष् → आयुः, आयुषी, आयूंषि। हविष् → हविः, हविषी, हवींषि (यहाँ इ के कारण ‘इर्’ — हविर्भिः)।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर
शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
- ‘मनस्’ का तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन (दोनों रूप) लिखिए।
उत्तर — मनोभिः; मनःसु, मनस्सु।
- ‘तपस्’ का प्रथमा बहुवचन तथा चतुर्थी द्विवचन लिखिए।
उत्तर — तपांसि; तपोभ्याम्।
- ‘चक्षुष्’ का तृतीया द्विवचन ‘मनस्’ के तृतीया द्विवचन से किस बात में भिन्न है?
उत्तर — मनस् में ‘ओ’ बनता है — मनोभ्याम्; चक्षुष् में ‘उर्’ — चक्षुर्भ्याम्, क्योंकि उकार के बाद रुत्व का र् गुण नहीं करता।
- ‘शिरस्’ का सप्तमी एकवचन तथा ‘छन्दस्’ का प्रथमा बहुवचन लिखिए।
उत्तर — शिरसि; छन्दांसि।
- ‘धनुष्’ शब्द को चक्षुष् के साँचे पर चलाकर प्रथमा बहुवचन तथा तृतीया बहुवचन लिखिए।
उत्तर — धनूंषि; धनुर्भिः।
- बताइए — ‘मनोरथ’, ‘तपोवन’, ‘शिरोमणि’ में ‘ओ’ कहाँ से आया?
उत्तर — अस्-अन्त शब्दों के स् का रुत्व (स् → र्), फिर उत्व (र् → उ), फिर अ + उ = ओ (गुण)।
- ‘पयस्’ का षष्ठी बहुवचन तथा ‘मनस्’ का पञ्चमी बहुवचन लिखिए।
उत्तर — पयसाम्; मनोभ्यः।