अर्थ — चमड़ा, खाल; प्रातिपदिक चर्मन् (नपुंसकलिङ्ग)। हिन्दी का ‘चमड़ा’, ‘चर्मकार’ इसी से हैं।
बलवत् (strong) अङ्ग — चर्मन् (बहुवचन में दीर्घ + नुम् — चर्माणि) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — चर्म : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — चर्मण् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — कर्मन् का ठीक जुड़वाँ — चर्म, चर्मणी, चर्माणि; दुर्बल अङ्ग चर्मण्; मध्यम चर्म- (चर्मभ्याम्, चर्मभिः, चर्मसु)। पुस्तक ने कर्मन् और चर्मन् को एक ही पृष्ठ पर रखकर यह जँचवाया है कि साँचा पहचान में आ गया या नहीं।
यही साँचा, और शब्द: वर्मन् (कवच) → वर्म, वर्मणी, वर्माणि; जन्मन् → जन्म, जन्मनी, जन्मानि; वेश्मन् (घर) → वेश्म, वेश्मनी, वेश्मानि। जिनमें र् या ष् पहले हो उन्हीं में न् का ण् होता है (वर्मणा, चर्मणा), शेष में न् ही रहता है (जन्मना)।
प्रयोग —
- गजस्य चर्म स्थूलम् अस्ति। (प्रथमा एक.)
- चर्मणा पादत्राणानि निर्मीयन्ते। (तृतीया एक.)
- चर्मणः मूल्यम् अधिकम्। (षष्ठी एक.)
- शिल्पी चर्माणि संस्करोति। (द्वितीया बहु.)
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर
शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
- ‘जगत्’ का प्रथमा बहुवचन तथा तृतीया बहुवचन लिखिए।
उत्तर — जगन्ति; जगद्भिः।
- ‘कर्मन्’ के सप्तमी एकवचन तथा प्रथमा बहुवचन में क्या अन्तर है?
उत्तर — सप्तमी एकवचन कर्मणि (ह्रस्व), प्रथमा बहुवचन कर्माणि (दीर्घ आ तथा नुम्)।
- ‘नामन्’ के प्रथमा द्विवचन के दोनों शुद्ध रूप लिखिए।
उत्तर — नाम्नी, नामनी।
- ‘चर्मन्’ का चतुर्थी एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
उत्तर — चर्मणे; चर्मसु।
- ‘वर्मन्’ शब्द को चर्मन् के साँचे पर चलाकर तृतीया एकवचन तथा प्रथमा बहुवचन लिखिए।
उत्तर — वर्मणा; वर्माणि।
- नपुंसकलिङ्ग की तीन पहचानें एक-एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर — (१) प्रथमा तथा द्वितीया के रूप समान; (२) द्विवचन में ‘ई’; (३) बहुवचन में नुम् आगम तथा पूर्व स्वर का दीर्घ।