कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 नपुंसकलिङ्गरूपाणि के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
नपुंसकलिङ्ग की तीन पहचानें — तालिका देखने से पहले
उत्तर

नपुंसकलिङ्ग की तालिकाएँ पुंलिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग से तीन ही बातों में भिन्न होती हैं। ये तीन बातें जान लेने पर आगे की दसों तालिकाएँ बहुत सरल हो जाती हैं।

पहचाननियमउदाहरण
१. प्रथमा = द्वितीयातीनों वचनों में प्रथमा और द्वितीया के रूप सर्वथा समान रहते हैंजगत् / जगत्, कर्म / कर्म, मनः / मनः
२. द्विवचन में ‘ई’द्विवचन में ‘औ’ के स्थान पर ‘ई’ (शी आदेश) आता हैजगती, कर्मणी, मनसी, चक्षुषी
३. बहुवचन में नुम् + दीर्घबहुवचन में ‘नुम्’ आगम जुड़ता है और उससे पहले का स्वर दीर्घ हो जाता हैजगन्ति, नामानि, कर्माणि, मनांसि, चक्षूंषि
‘मनांसि’ और ‘जगन्ति’ में एक ही नियम कैसे: दोनों में नुम् जुड़ा है। ‘जगत्’ में वह पूरा न् बनकर दिखता है (जग + न् + ति), और ‘मनस्’ में अनुस्वार बनकर (मन + ां + सि), क्योंकि उसके आगे स् है — अनुस्वार-सन्धि से न् → ं हो गया। ‘कर्माणि’ में न् का णत्व होकर ण् हो गया, क्योंकि उससे पहले र् है।
वाक्य में उपयोग: चूँकि प्रथमा और द्वितीया एक जैसी हैं, वाक्य में कर्ता-कर्म का निर्णय क्रिया तथा अर्थ से करना पड़ता है — ‘कर्म फलति’ (कर्म फलता है — प्रथमा) पर ‘कर्म करोति’ (कर्म करता है — द्वितीया)।
प्र२.
‘जगत्’ शब्दः — ‘त्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 193)
उत्तर

अर्थ — संसार, विश्व; व्युत्पत्ति गम् धातु से — ‘जो चलता रहे’। प्रातिपदिक जगत् (नपुंसकलिङ्ग)। ‘जगन्नाथ’, ‘जगदीश’, ‘जगद्गुरु’ शब्द इसी से बने हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — जगन्त् (बहुवचन में नुम् — जगन्ति) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — जगद् / जगत् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — जगत् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — प्रथमा-द्वितीया एकवचन में दो रूप — जगद्, जगत् (जश्त्व/चर्त्व); द्विवचन जगती; बहुवचन जगन्ति (नुम्)। मध्यम अङ्ग जगद्- (जगद्भ्याम्, जगद्भिः, जगद्भ्यः), किन्तु ‘सु’ से पहले जगत्सु

‘त्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘जगत्’ शब्दः — पृष्ठ 193
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाजगद्, जगत्जगतीजगन्ति
द्वितीयाजगद्, जगत्जगतीजगन्ति
तृतीयाजगताजगद्भ्याम्जगद्भिः
चतुर्थीजगतेजगद्भ्याम्जगद्भ्यः
पञ्चमीजगतःजगद्भ्याम्जगद्भ्यः
षष्ठीजगतःजगतोःजगताम्
सप्तमीजगतिजगतोःजगत्सु
सम्बोधनम्हे जगद्, हे जगत्हे जगतीहे जगन्ति
‘जगन्ति’ में न् कहाँ से आया: नपुंसक बहुवचन में ‘जस्/शस्’ के स्थान पर ‘शि’ आदेश होता है और अङ्ग को नुम् आगम मिलता है — जगत् + नुम् + इ → जग + न् + ति → जगन्ति। ‘त्’ के पहले न् आने से ‘न्ति’ बना। यही नुम् नामन् → नामानि, कर्मन् → कर्माणि में भी दिखता है।

प्रयोग —

  • जगत् परिवर्तनशीलम् अस्ति। (प्रथमा एक.)
  • ईश्वरः जगत् रक्षति। (द्वितीया एक. — रूप वही, अर्थ कर्म का)
  • जगता सह वयं सम्बद्धाः। (तृतीया एक.)
  • जगतः कल्याणं भवतु। (षष्ठी एक.)
  • जगत्सु शान्तिः प्रसरतु। (सप्तमी बहु.)
समासों में दोनों रूप: जगद्गुरु, जगदीश, जगद्बन्धु (मृदु के आगे द्); जगत्पिता, जगत्कर्ता, जगत्त्रय (कठोर के आगे त्)।
प्र३.
‘नामन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 193)
उत्तर

अर्थ — नाम, संज्ञा; प्रातिपदिक नामन् (नपुंसकलिङ्ग)। हिन्दी का ‘नाम’ तथा अंग्रेज़ी का name — दोनों इसी भारोपीय मूल के हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — नामन् (बहुवचन में दीर्घ + नुम् — नामानि) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — नाम : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — नाम्न् / नामन् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — प्रथमा-द्वितीया एकवचन में न् गिरकर केवल नाम बचता है। दुर्बल अङ्ग में ‘अ’ लुप्त होकर नाम्न् बनता है — नाम्ना, नाम्ने, नाम्नः, नाम्नाम्। व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले नाम- (नामभ्याम्, नामभिः, नामसु)।

‘न्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘नामन्’ शब्दः — पृष्ठ 193
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमानामनाम्नी, नामनीनामानि
द्वितीयानामनाम्नी, नामनीनामानि
तृतीयानाम्नानामभ्याम्नामभिः
चतुर्थीनाम्नेनामभ्याम्नामभ्यः
पञ्चमीनाम्नःनामभ्याम्नामभ्यः
षष्ठीनाम्नःनाम्नोःनाम्नाम्
सप्तमीनाम्नि, नामनिनाम्नोःनामसु
सम्बोधनम्हे नामन्, हे नामहे नाम्नी, हे नामनीहे नामानि
दो-दो रूप क्यों छपे हैं: द्विवचन में नाम्नी तथा नामनी — दोनों शुद्ध हैं; अन्तिम ‘अ’ का लोप ऐच्छिक है। इसी प्रकार सप्तमी एकवचन में नाम्नि और नामनि दोनों चलते हैं। ध्यान दीजिए कि कर्मन्/चर्मन् में पुस्तक ऐसा विकल्प नहीं देती — वहाँ केवल कर्मणी, कर्मणि छपा है, क्योंकि उनमें र् के कारण णत्व हो जाता है और परम्परा में वही रूप प्रचलित है।

प्रयोग —

  • तस्य नाम रामः अस्ति। (प्रथमा एक.)
  • नाम्ना सः प्रसिद्धः। (तृतीया एक. — ‘नाम से’)
  • ग्रामस्य नाम्नः इतिहासः रोचकः। (षष्ठी एक.)
  • पुस्तके बहूनि नामानि लिखितानि। (द्वितीया बहु.)
  • हे नामन्! (सम्बोधन एक. — काव्य में)
प्र४.
‘कर्मन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 194)
उत्तर

अर्थ — कर्म, कार्य, कृत्य; प्रातिपदिक कर्मन् (नपुंसकलिङ्ग), कृ धातु से ‘मनिन्’ प्रत्यय द्वारा निष्पन्न। गीता का प्रसिद्ध वाक्य ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इसी शब्द का सप्तमी एकवचन (कर्मणि) है।

बलवत् (strong) अङ्ग — कर्मन् (बहुवचन में दीर्घ + नुम् — कर्माणि) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — कर्म : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — कर्मण् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — प्रथमा-द्वितीया एकवचन कर्म; द्विवचन कर्मणी; बहुवचन कर्माणि। दुर्बल अङ्ग में न् का ण् हो जाता है — कर्मणा, कर्मणे, कर्मणः, कर्मणि, कर्मणोः, कर्मणाम्। यह णत्व र् के कारण है (रषाभ्यां नो णः)।

‘न्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘कर्मन्’ शब्दः — पृष्ठ 194
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाकर्मकर्मणीकर्माणि
द्वितीयाकर्मकर्मणीकर्माणि
तृतीयाकर्मणाकर्मभ्याम्कर्मभिः
चतुर्थीकर्मणेकर्मभ्याम्कर्मभ्यः
पञ्चमीकर्मणःकर्मभ्याम्कर्मभ्यः
षष्ठीकर्मणःकर्मणोःकर्मणाम्
सप्तमीकर्मणिकर्मणोःकर्मसु
सम्बोधनम्हे कर्मन्, हे कर्महे कर्मणीहे कर्माणि
सप्तमी एकवचन ‘कर्मणि’ का महत्त्व: यही वह रूप है जो व्याकरण में सर्वत्र दिखता है — ‘कर्मणि द्वितीया’ (कर्म में द्वितीया विभक्ति), ‘कर्मणि वाच्य’ (passive voice), ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’। ध्यान दीजिए कि यह प्रथमा बहुवचन ‘कर्माणि’ से भिन्न है — एक में ‘णि’ ह्रस्व है, दूसरे में ‘माणि’ में दीर्घ आ। दोनों को मिलाना सबसे सामान्य भूल है।

प्रयोग —

  • कर्म फलं ददाति। (प्रथमा एक.)
  • कर्मणा जायते महान्। (तृतीया एक. — प्रसिद्ध सूक्ति)
  • कर्मणे समर्पितः जीवनम्। (चतुर्थी एक.)
  • शुभानि कर्माणि कुरुत। (द्वितीया बहु.)
  • कर्मसु कौशलं योगः। (सप्तमी बहु. — ‘योगः कर्मसु कौशलम्’, गीता)
प्र५.
‘चर्मन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् (पृष्ठ 194)
उत्तर

अर्थ — चमड़ा, खाल; प्रातिपदिक चर्मन् (नपुंसकलिङ्ग)। हिन्दी का ‘चमड़ा’, ‘चर्मकार’ इसी से हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — चर्मन् (बहुवचन में दीर्घ + नुम् — चर्माणि) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — चर्म : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — चर्मण् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — कर्मन् का ठीक जुड़वाँ — चर्म, चर्मणी, चर्माणि; दुर्बल अङ्ग चर्मण्; मध्यम चर्म- (चर्मभ्याम्, चर्मभिः, चर्मसु)। पुस्तक ने कर्मन् और चर्मन् को एक ही पृष्ठ पर रखकर यह जँचवाया है कि साँचा पहचान में आ गया या नहीं।

‘न्’ कारान्तः नपुंसकलिङ्गम् ‘चर्मन्’ शब्दः — पृष्ठ 194
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाचर्मचर्मणीचर्माणि
द्वितीयाचर्मचर्मणीचर्माणि
तृतीयाचर्मणाचर्मभ्याम्चर्मभिः
चतुर्थीचर्मणेचर्मभ्याम्चर्मभ्यः
पञ्चमीचर्मणःचर्मभ्याम्चर्मभ्यः
षष्ठीचर्मणःचर्मणोःचर्मणाम्
सप्तमीचर्मणिचर्मणोःचर्मसु
सम्बोधनम्हे चर्मन्, हे चर्महे चर्मणीहे चर्माणि
यही साँचा, और शब्द: वर्मन् (कवच) → वर्म, वर्मणी, वर्माणि; जन्मन् → जन्म, जन्मनी, जन्मानि; वेश्मन् (घर) → वेश्म, वेश्मनी, वेश्मानि। जिनमें र् या ष् पहले हो उन्हीं में न् का ण् होता है (वर्मणा, चर्मणा), शेष में न् ही रहता है (जन्मना)।

प्रयोग —

  • गजस्य चर्म स्थूलम् अस्ति। (प्रथमा एक.)
  • चर्मणा पादत्राणानि निर्मीयन्ते। (तृतीया एक.)
  • चर्मणः मूल्यम् अधिकम्। (षष्ठी एक.)
  • शिल्पी चर्माणि संस्करोति। (द्वितीया बहु.)
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘जगत्’ का प्रथमा बहुवचन तथा तृतीया बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — जगन्ति; जगद्भिः।
  2. ‘कर्मन्’ के सप्तमी एकवचन तथा प्रथमा बहुवचन में क्या अन्तर है?
    उत्तर — सप्तमी एकवचन कर्मणि (ह्रस्व), प्रथमा बहुवचन कर्माणि (दीर्घ आ तथा नुम्)।
  3. ‘नामन्’ के प्रथमा द्विवचन के दोनों शुद्ध रूप लिखिए।
    उत्तर — नाम्नी, नामनी।
  4. ‘चर्मन्’ का चतुर्थी एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — चर्मणे; चर्मसु।
  5. ‘वर्मन्’ शब्द को चर्मन् के साँचे पर चलाकर तृतीया एकवचन तथा प्रथमा बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — वर्मणा; वर्माणि।
  6. नपुंसकलिङ्ग की तीन पहचानें एक-एक वाक्य में लिखिए।
    उत्तर — (१) प्रथमा तथा द्वितीया के रूप समान; (२) द्विवचन में ‘ई’; (३) बहुवचन में नुम् आगम तथा पूर्व स्वर का दीर्घ।
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