कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 स्त्रीलिङ्गरूपाणि के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘सरित्’ शब्दः — ‘त्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 191)
उत्तर

अर्थ — नदी, सरिता; व्युत्पत्ति सृ (बहना) धातु से — ‘जो बहती रहे’। प्रातिपदिक सरित् (स्त्रीलिङ्ग)। इसी साँचे पर विपद्, आपद्, सम्पद्, शरद्, परिषद् जैसे त्/द्-अन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द चलते हैं।

बलवत् (strong) अङ्ग — सरित् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — सरिद् / सरित् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — सरित् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — अङ्ग सर्वत्र सरित्। पदान्त त् मृदु परिवेश में द् हो जाता है — इसीलिए प्रथमा एकवचन में दो रूप (सरिद्, सरित्) और भ्याम्/भिस्/भ्यस् से पहले सरिद्- (सरिद्भ्याम्, सरिद्भिः)। ‘सु’ कठोर है, इसलिए वहाँ त् ही रहता है — सरित्सु

‘त्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘सरित्’ शब्दः — पृष्ठ 191
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमासरिद्, सरित्सरितौसरितः
द्वितीयासरितम्सरितौसरितः
तृतीयासरितासरिद्भ्याम्सरिद्भिः
चतुर्थीसरितेसरिद्भ्याम्सरिद्भ्यः
पञ्चमीसरितःसरिद्भ्याम्सरिद्भ्यः
षष्ठीसरितःसरितोःसरिताम्
सप्तमीसरितिसरितोःसरित्सु
सम्बोधनम्हे सरिद्, हे सरित्हे सरितौहे सरितः
‘सरिद्भिः’ पर ‘सरित्सु’ क्यों: दोनों जगह प्रत्यय व्यञ्जनादि है, पर भ् मृदु (घोष) है और स् कठोर (अघोष)। मृदु के आगे जश्त्व से त् → द् (सरिद्भिः), कठोर के आगे चर्त्व से त् ज्यों-का-त्यों (सरित्सु)। यही जोड़ा विद्युत् में भी है — विद्युद्भिः पर विद्युत्सु।

प्रयोग —

  • सरित् पर्वतात् प्रवहति। (प्रथमा एक.)
  • जनाः सरितम् पूजयन्ति। (द्वितीया एक.)
  • सरिता क्षेत्राणि सिच्यन्ते। (तृतीया एक.)
  • सरिद्भिः देशः समृद्धः। (तृतीया बहु.)
  • सरित्सु गङ्गा पवित्रतमा। (सप्तमी बहु. — निर्धारणे सप्तमी)
प्र२.
‘विद्युत्’ शब्दः — ‘त्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 191)
उत्तर

अर्थ — बिजली, विद्युत्; व्युत्पत्ति वि + द्युत् (चमकना) — ‘जो विशेष रूप से चमके’। प्रातिपदिक विद्युत् (स्त्रीलिङ्ग)। इसी वर्ग में मरुत् (पुंलिङ्ग) भी उसी साँचे पर चलता है।

बलवत् (strong) अङ्ग — विद्युत् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — विद्युद् / विद्युत् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — विद्युत् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — सरित् का जुड़वाँ — प्रथमा एकवचन विद्युद्, विद्युत्; मध्यम अङ्ग विद्युद्- (विद्युद्भ्याम्, विद्युद्भिः, विद्युद्भ्यः); सप्तमी बहुवचन विद्युत्सु

‘त्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘विद्युत्’ शब्दः — पृष्ठ 191
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाविद्युद्, विद्युत्विद्युतौविद्युतः
द्वितीयाविद्युतम्विद्युतौविद्युतः
तृतीयाविद्युताविद्युद्भ्याम्विद्युद्भिः
चतुर्थीविद्युतेविद्युद्भ्याम्विद्युद्भ्यः
पञ्चमीविद्युतःविद्युद्भ्याम्विद्युद्भ्यः
षष्ठीविद्युतःविद्युतोःविद्युताम्
सप्तमीविद्युतिविद्युतोःविद्युत्सु
सम्बोधनम्हे विद्युद्, हे विद्युत्हे विद्युतौहे विद्युतः
लिङ्ग-सावधानी: ‘विद्युत्’ स्त्रीलिङ्ग है — ‘चञ्चला विद्युत्’, ‘विद्युत् चमकति’ — इसलिए इसके विशेषण भी स्त्रीलिङ्ग में आएँगे। इसके विपरीत ‘मरुत्’ (वायु) पुंलिङ्ग है, यद्यपि उसके रूप ठीक इसी साँचे पर चलते हैं।

प्रयोग —

  • मेघेषु विद्युत् चमकति। (प्रथमा एक.)
  • कविः विद्युतम् उपमानं करोति। (द्वितीया एक.)
  • विद्युता यन्त्राणि चलन्ति। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
  • विद्युत्सु महती शक्तिः निहिता। (सप्तमी बहु.)
प्र३.
‘दिव्’ शब्दः — ‘व्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 192)
उत्तर

अर्थ — आकाश, स्वर्ग, द्युलोक; प्रातिपदिक दिव् (स्त्रीलिङ्ग)। यह भी अनियमित शब्द है और वेदों में अत्यन्त प्रसिद्ध — ‘द्यौः शान्तिः अन्तरिक्षं शान्तिः’ (शान्तिपाठ)।

बलवत् (strong) अङ्ग — द्यौ (प्र.एक. में द्यौः) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — द्यु : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — दिव् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — यहाँ दो अङ्ग साफ़ दिखते हैं — स्वरादि प्रत्ययों से पहले दिव् (दिवौ, दिवः, दिवा, दिवि) और व्यञ्जनादि प्रत्ययों से पहले द्यु (द्युभ्याम्, द्युभिः, द्युभ्यः, द्युषु)। प्रथमा एकवचन द्यौः विशेष रूप है — इसे अलग से याद करना पड़ता है।

‘व्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘दिव्’ शब्दः — पृष्ठ 192
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाद्यौःदिवौदिवः
द्वितीयादिवम्दिवौदिवः
तृतीयादिवाद्युभ्याम्द्युभिः
चतुर्थीदिवेद्युभ्याम्द्युभ्यः
पञ्चमीदिवःद्युभ्याम्द्युभ्यः
षष्ठीदिवःदिवोःदिवाम्
सप्तमीदिविदिवोःद्युषु
सम्बोधनम्हे द्यौःहे दिवौहे दिवः
‘दिव्’ का ‘द्यु’ कैसे बनता है: जब आगे व्यञ्जन आता है तो ‘इ’ का ‘य्’ में परिवर्तन होकर द् + य् + उ = द्यु बन जाता है। इसी से ‘द्युलोक’, ‘द्युति’ (चमक), ‘द्यौः’ जैसे शब्द बने हैं। ध्यान दीजिए कि सप्तमी बहुवचन द्युषु है — ‘उ’ के बाद स् का षत्व होकर षु।

प्रयोग —

  • द्यौः नीला दृश्यते। (प्रथमा एक.)
  • पक्षिणः दिवम् उड्डीयन्ते। (द्वितीया एक.)
  • दिवि ताराः दीप्यन्ते। (सप्तमी एक. — अधिकरणे सप्तमी)
  • द्युभिः पृथिवी संयुक्ता। (तृतीया बहु.)
प्रसिद्ध प्रयोग: ‘दिवि’ (आकाश में) और ‘भुवि’ (पृथ्वी पर) — यह जोड़ी सुभाषितों में बार-बार आती है : ‘न दिवि न भुवि …’। ‘दिवा’ (दिन में) भी इसी शब्द का तृतीया-रूप है, जो अव्यय की तरह प्रयुक्त होता है।
प्र४.
‘दिश्’ शब्दः — ‘श्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः (पृष्ठ 192)
उत्तर

अर्थ — दिशा; प्रातिपदिक दिश् (स्त्रीलिङ्ग), ‘दिश्’ धातु (दिखाना, संकेत करना) से। ‘दिक्’ रूप से बने शब्द अत्यन्त प्रसिद्ध हैं — दिग्गज, दिक्सूचक, दिग्दर्शन, दिगम्बर।

बलवत् (strong) अङ्ग — दिश् (अपरिवर्तित) : प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एकवचन-द्विवचन
मध्यम अङ्ग — दिग् / दिक् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — दिश् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले

पहचान — श् भी पद के अन्त में नहीं टिकता — वह कवर्ग में बदलकर ग् या क् हो जाता है। इसलिए प्रथमा एकवचन दिग्, दिक्; मध्यम अङ्ग दिग्- (दिग्भ्याम्, दिग्भिः); सप्तमी बहुवचन दिक्षु। स्वरादि प्रत्ययों से पहले श् बना रहता है — दिशौ, दिशः, दिशा, दिशि।

‘श्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘दिश्’ शब्दः — पृष्ठ 192
विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमादिग्, दिक्दिशौदिशः
द्वितीयादिशम्दिशौदिशः
तृतीयादिशादिग्भ्याम्दिग्भिः
चतुर्थीदिशेदिग्भ्याम्दिग्भ्यः
पञ्चमीदिशःदिग्भ्याम्दिग्भ्यः
षष्ठीदिशःदिशोःदिशाम्
सप्तमीदिशिदिशोःदिक्षु
सम्बोधनम्हे दिग्, हे दिक्हे दिशौहे दिशः
‘दिक्षु’ की सिद्धि — दिश् + सु → पदान्त श् → क् (व्रश्चादि-सूत्र तथा चर्त्व) → दिक् + सु → क् के बाद स् → ष् (षत्व) → दिक्षु
इसी से ‘दश दिक्षु’ (दसों दिशाओं में) जैसा प्रसिद्ध प्रयोग बनता है।

प्रयोग —

  • पूर्वा दिक् सूर्योदयस्य दिक् अस्ति। (प्रथमा एक.)
  • सः दिशम् पश्यति। (द्वितीया एक.)
  • दिशा ज्ञातया मार्गः सुलभः। (तृतीया एक.)
  • दिक्षु कीर्तिः प्रसृता। (सप्तमी बहु.)
  • हे दिक्! (सम्बोधन एक. — काव्य में)
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘सरित्’ का तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए और भेद का कारण बताइए।
    उत्तर — सरिद्भिः; सरित्सु। भ् मृदु है (जश्त्व → द्), स् कठोर है (चर्त्व → त्)।
  2. ‘विद्युत्’ का चतुर्थी द्विवचन तथा षष्ठी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — विद्युद्भ्याम्; विद्युताम्।
  3. ‘दिव्’ के वे चार रूप लिखिए जिनमें ‘द्यु’ अङ्ग दिखता है।
    उत्तर — द्युभ्याम्, द्युभिः, द्युभ्यः, द्युषु।
  4. ‘दिश्’ का सप्तमी बहुवचन बनाकर दो चरणों में सिद्धि लिखिए।
    उत्तर — दिक्षु — (१) पदान्त श् → क्, (२) क् के बाद स् → ष् (षत्व)।
  5. रिक्तस्थान भरिए — ______ जलं पिबन्ति ग्रामवासिनः। (सरित्, षष्ठी एकवचन)
    उत्तर — सरितः (सरितः जलम् = नदी का जल)।
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