अर्थ — नदी, सरिता; व्युत्पत्ति सृ (बहना) धातु से — ‘जो बहती रहे’। प्रातिपदिक सरित् (स्त्रीलिङ्ग)। इसी साँचे पर विपद्, आपद्, सम्पद्, शरद्, परिषद् जैसे त्/द्-अन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द चलते हैं।
मध्यम अङ्ग — सरिद् / सरित् : भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनादि प्रत्यय) से पहले
दुर्बल (weak) अङ्ग — सरित् : शेष सब स्वरादि प्रत्ययों से पहले
पहचान — अङ्ग सर्वत्र सरित्। पदान्त त् मृदु परिवेश में द् हो जाता है — इसीलिए प्रथमा एकवचन में दो रूप (सरिद्, सरित्) और भ्याम्/भिस्/भ्यस् से पहले सरिद्- (सरिद्भ्याम्, सरिद्भिः)। ‘सु’ कठोर है, इसलिए वहाँ त् ही रहता है — सरित्सु।
| ‘त्’ कारान्तः स्त्रीलिङ्गः ‘सरित्’ शब्दः — पृष्ठ 191 | |||
|---|---|---|---|
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमा | सरिद्, सरित् | सरितौ | सरितः |
| द्वितीया | सरितम् | सरितौ | सरितः |
| तृतीया | सरिता | सरिद्भ्याम् | सरिद्भिः |
| चतुर्थी | सरिते | सरिद्भ्याम् | सरिद्भ्यः |
| पञ्चमी | सरितः | सरिद्भ्याम् | सरिद्भ्यः |
| षष्ठी | सरितः | सरितोः | सरिताम् |
| सप्तमी | सरिति | सरितोः | सरित्सु |
| सम्बोधनम् | हे सरिद्, हे सरित् | हे सरितौ | हे सरितः |
प्रयोग —
- सरित् पर्वतात् प्रवहति। (प्रथमा एक.)
- जनाः सरितम् पूजयन्ति। (द्वितीया एक.)
- सरिता क्षेत्राणि सिच्यन्ते। (तृतीया एक.)
- सरिद्भिः देशः समृद्धः। (तृतीया बहु.)
- सरित्सु गङ्गा पवित्रतमा। (सप्तमी बहु. — निर्धारणे सप्तमी)