कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 शब्दरूपाणि के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
परिशिष्टम् ४ ‘शब्दरूपाणि’ में क्या है, और इसमें अभ्यास क्यों नहीं है?
उत्तर

सीधा उत्तर — पृष्ठ 184 से 198 तक शारदा केवल शब्दरूपों की तालिकाएँ छापती है — अट्ठाईस व्यञ्जनान्त (हलन्त) शब्दों के पूरे रूप और अन्त में सुप्-प्रत्ययों की तालिका। यह पाठ नहीं, परिशिष्ट है; इसमें न श्लोक हैं, न कथा, न ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ जैसा प्रश्न-खण्ड। हर तालिका दोनों ओर से पूरी भरी हुई छपी है, इसलिए यहाँ हल करने को कुछ बचता ही नहीं — उत्तर लुप्त नहीं हैं, प्रश्न ही नहीं हैं

पुस्तक स्वयं क्या कहती है — पिछले परिशिष्ट के अन्त में (पृष्ठ 183) पुस्तक लिखती है — ‘अस्मिन् परिशिष्टत्रये … इत्येते विचाराः सामान्यतया प्रदर्शिताः सन्ति। छात्राः विस्तृताध्ययनार्थम् अन्यान् ग्रन्थान् परिशीलयेयुः।’ अर्थात् परिशिष्ट केवल संकेत देते हैं, विस्तार के लिए व्याकरण-ग्रन्थ देखने चाहिए।

परिशिष्ट में क्या-क्या छपा है —

पृष्ठलिङ्गशब्दाः (कारान्त-सहित)
184–185पुंलिङ्गम्ब्रह्मन् · गुणिन् · पथिन् (सब ‘न्’ कारान्त)
185–187पुंलिङ्गम्विद्वस् · चन्द्रमस् · वेधस् · पुंस् (सब ‘स्’ कारान्त)
187–188पुंलिङ्गम्सुहृद् (‘द्’) · वणिज् · भिषज् (‘ज्’)
189–190स्त्रीलिङ्गम्वाच् · त्वच् (‘च्’) · स्रज् · रुज् (‘ज्’)
191–192स्त्रीलिङ्गम्सरित् · विद्युत् (‘त्’) · दिव् (‘व्’) · दिश् (‘श्’)
193–194नपुंसकलिङ्गम्जगत् (‘त्’) · नामन् · कर्मन् · चर्मन् (‘न्’)
195–197नपुंसकलिङ्गम्मनस् · तपस् · पयस् · शिरस् · छन्दस् (‘स्’) · चक्षुष् (‘ष्’)
198तीनों लिङ्गसुप्-प्रत्ययाः — विभक्ति के मूल इक्कीस प्रत्यय
यहाँ केवल हलन्त शब्द क्यों: अजन्त (स्वरान्त) शब्द — बालक, लता, मुनि, नदी, साधु, धेनु, पितृ, फल — कक्षा ६, ७ और ८ में पढ़े जा चुके हैं। उनका साँचा सरल है। कठिनाई व्यञ्जनान्त शब्दों में आती है, क्योंकि उनमें अङ्ग स्वयं बदलता है (ब्रह्मन् → ब्रह्मा / ब्रह्माण् / ब्रह्मण् / ब्रह्म) और पदान्त व्यञ्जन भी बदलता है (वाच् → वाग् / वाक्)। इसीलिए कक्षा ९ का परिशिष्ट पूरा-का-पूरा इन्हीं को देता है।

तालिका कैसे पढ़ें — हर तालिका में बायाँ स्तम्भ विभक्ति का है और तीन स्तम्भ एकवचन, द्विवचन, बहुवचन के। सात विभक्तियों के बाद आठवीं पंक्ति सम्बोधनम् की है। एक खाने में यदि अल्पविराम से दो रूप छपे हैं (जैसे ‘वाग्, वाक्’ या ‘मनःसु, मनस्सु’) तो दोनों शुद्ध हैं — परीक्षा में कोई एक लिखना पर्याप्त है।

एक सूत्र जो पूरा परिशिष्ट खोल देता है: हलन्त शब्द का अङ्ग तीन रूप लेता है — बलवत् (प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एक./द्वि.), मध्यम (भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु से पहले) और दुर्बल (शेष स्वरादि प्रत्ययों से पहले)। नीचे हर तालिका के ऊपर यही तीन अङ्ग अलग से दिए गए हैं — उन्हें देख लेने के बाद चौबीस खाने अपने आप बन जाते हैं।
प्र२.
किसी नए हलन्त शब्द का रूप बनाना हो तो किस तालिका के साँचे पर चलें?
उत्तर

विधि तीन चरणों की है — (क) शब्द का अन्तिम वर्ण देखिए, (ख) उसका लिङ्ग देखिए, (ग) उसी कारान्त-लिङ्ग वाली तालिका का साँचा लगाइए। परिशिष्ट में जो अट्ठाईस शब्द छपे हैं, वे उदाहरण-मात्र हैं; उनके साँचे पर सैकड़ों शब्द चलते हैं।

नया शब्दकिस साँचे परक्योंनमूना रूप
आत्मन् (पुं.)ब्रह्मन्‘न्’ कारान्त पुंलिङ्ग, अन् वालाआत्मा, आत्मानौ, आत्मानः
राजन् (पुं.)ब्रह्मन्वही साँचा; दुर्बल अङ्ग राज्ञ्राजा, राजानौ, राज्ञः
धनिन्, बलिन् (पुं.)गुणिन्‘इन्’ प्रत्ययान्तधनी, धनिनौ, धनिनः
विपद्, आपद् (स्त्री.)सरित्पदान्त द्/त् वाला स्त्रीलिङ्गविपद्/विपत्, विपदौ, विपदः
मरुत् (पुं.)विद्युत् (लिङ्ग-भेद सहित)‘त्’ कारान्तमरुत्, मरुतौ, मरुतः
यशस्, वयस्, वचस् (नपुं.)तपस् / मनस्‘अस्’ अन्त वाला नपुंसकयशः, यशसी, यशांसि
धनुष्, हविष् (नपुं.)चक्षुष्‘उस्/इस्’ अन्त वाला नपुंसकधनुः, धनुषी, धनूंषि
वर्मन्, चर्मन्, जन्मन् (नपुं.)कर्मन्‘मन्’ अन्त वाला नपुंसकवर्म, वर्मणी, वर्माणि
क्यों यह काम करता है: संस्कृत में रूप शब्द-विशेष का नहीं, अङ्ग-वर्ग का होता है। ‘ब्रह्मन्’ और ‘आत्मन्’ में जो साझा है वह अन्तिम ‘अन्’ है — इसलिए दोनों का व्यवहार एक। जहाँ धातु-निष्पन्न विशेषता हो (जैसे राजन् का दुर्बल अङ्ग ‘राज्ञ्’, पथिन् का ‘पथ्’) वहीं भेद पड़ता है, और वही याद रखने योग्य है।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘आत्मन्’ शब्द का तृतीया एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन लिखिए।
    उत्तर — आत्मना; आत्मसु (ब्रह्मन् के साँचे पर — दुर्बल अङ्ग आत्मन्/आत्मन्, मध्यम आत्म-)।
  2. ‘यशस्’ (नपुं.) का प्रथमा बहुवचन क्या होगा?
    उत्तर — यशांसि (तपस् → तपांसि के समान — नुम् आगम तथा दीर्घ)।
  3. ‘विपद्’ (स्त्री.) का प्रथमा एकवचन दोनों रूपों में लिखिए।
    उत्तर — विपद्, विपत् (जश्त्व से द्, चर्त्व से त्)।
  4. नीचे दिए शब्दों को उनके साँचे से मिलाइए — (क) धनिन् (ख) वचस् (ग) मरुत् (घ) राजन्।
    उत्तर — (क) गुणिन् (ख) मनस्/तपस् (ग) विद्युत् — ‘त्’ कारान्त साँचा (घ) ब्रह्मन्।
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