सीधा उत्तर — पृष्ठ 184 से 198 तक शारदा केवल शब्दरूपों की तालिकाएँ छापती है — अट्ठाईस व्यञ्जनान्त (हलन्त) शब्दों के पूरे रूप और अन्त में सुप्-प्रत्ययों की तालिका। यह पाठ नहीं, परिशिष्ट है; इसमें न श्लोक हैं, न कथा, न ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ जैसा प्रश्न-खण्ड। हर तालिका दोनों ओर से पूरी भरी हुई छपी है, इसलिए यहाँ हल करने को कुछ बचता ही नहीं — उत्तर लुप्त नहीं हैं, प्रश्न ही नहीं हैं।
पुस्तक स्वयं क्या कहती है — पिछले परिशिष्ट के अन्त में (पृष्ठ 183) पुस्तक लिखती है — ‘अस्मिन् परिशिष्टत्रये … इत्येते विचाराः सामान्यतया प्रदर्शिताः सन्ति। छात्राः विस्तृताध्ययनार्थम् अन्यान् ग्रन्थान् परिशीलयेयुः।’ अर्थात् परिशिष्ट केवल संकेत देते हैं, विस्तार के लिए व्याकरण-ग्रन्थ देखने चाहिए।
परिशिष्ट में क्या-क्या छपा है —
| पृष्ठ | लिङ्ग | शब्दाः (कारान्त-सहित) |
|---|---|---|
| 184–185 | पुंलिङ्गम् | ब्रह्मन् · गुणिन् · पथिन् (सब ‘न्’ कारान्त) |
| 185–187 | पुंलिङ्गम् | विद्वस् · चन्द्रमस् · वेधस् · पुंस् (सब ‘स्’ कारान्त) |
| 187–188 | पुंलिङ्गम् | सुहृद् (‘द्’) · वणिज् · भिषज् (‘ज्’) |
| 189–190 | स्त्रीलिङ्गम् | वाच् · त्वच् (‘च्’) · स्रज् · रुज् (‘ज्’) |
| 191–192 | स्त्रीलिङ्गम् | सरित् · विद्युत् (‘त्’) · दिव् (‘व्’) · दिश् (‘श्’) |
| 193–194 | नपुंसकलिङ्गम् | जगत् (‘त्’) · नामन् · कर्मन् · चर्मन् (‘न्’) |
| 195–197 | नपुंसकलिङ्गम् | मनस् · तपस् · पयस् · शिरस् · छन्दस् (‘स्’) · चक्षुष् (‘ष्’) |
| 198 | तीनों लिङ्ग | सुप्-प्रत्ययाः — विभक्ति के मूल इक्कीस प्रत्यय |
तालिका कैसे पढ़ें — हर तालिका में बायाँ स्तम्भ विभक्ति का है और तीन स्तम्भ एकवचन, द्विवचन, बहुवचन के। सात विभक्तियों के बाद आठवीं पंक्ति सम्बोधनम् की है। एक खाने में यदि अल्पविराम से दो रूप छपे हैं (जैसे ‘वाग्, वाक्’ या ‘मनःसु, मनस्सु’) तो दोनों शुद्ध हैं — परीक्षा में कोई एक लिखना पर्याप्त है।