धातु — वृधु (भ्वादिगण, आत्मनेपदी, अर्थ — बढ़ना, वृद्धि पाना)। धातुपाठ में इसका नाम ‘वृधु’ है (अन्तिम ‘उ’ इत्-संज्ञक है, जो आत्मनेपद का संकेत देता है); प्रयोग में धातु वृध् ही रहती है। लट् में ऋ का गुण होकर ‘अर्’ बनता है — वृध् → वर्ध।
वर्ध + ते = वर्धते (आत्मनेपद का प्रत्यय ‘ते’ है, ‘ति’ नहीं)
| ‘वृधु’- धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 201 | |||
|---|---|---|---|
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वर्धसे | वर्धेथे | वर्धध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वर्धे | वर्धावहे | वर्धामहे |
प्रयोग —
- वृक्षः वर्धते। (वृक्ष बढ़ता है)
- बालकाः शनैः शनैः वर्धन्ते। (बालक धीरे-धीरे बढ़ते हैं)
- त्वं ज्ञानेन वर्धसे। (तुम ज्ञान से बढ़ते हो)
- वयं परिश्रमेण वर्धामहे। (हम परिश्रम से बढ़ते हैं)