नियम — लभ् अनिट् धातु है — इसमें ‘स्य’ से पहले ‘इ’ नहीं लगता। इसीलिए रूप ‘लभिष्यते’ नहीं, लप्स्यते बनता है : लभ् + स्य + ते → भ् का प् (चर्त्व, क्योंकि आगे कठोर स् है) → लप्स्यते।
‘वर्धिष्यते’ बनाम ‘लप्स्यते’ — यही सेट्-अनिट् का भेद है: दोनों लृट् हैं, दोनों आत्मनेपद हैं, पर एक में ‘इ’ है और दूसरे में नहीं। जिन धातुओं में यह ‘इ’ लगता है वे सेट् (स + इट्) कहलाती हैं, जिनमें नहीं लगता वे अनिट्। यह धातु का अपना स्वभाव है, कोई नियम इसे बता नहीं देता — धातुपाठ से जाना जाता है। परीक्षा में यही स्थान सबसे अधिक भूल का है : ‘लभिष्यते’ लिखना अशुद्ध है।
पुस्तक की ‘एवमेव’ सूची (लृट्) — भाषिष्यते · वर्तिष्यते · कम्पिष्यते · स्पर्धिष्यते · सेविष्यते · स्पन्दिष्यते · यतिष्यते · रोचिष्यते · एधिष्यते · मोदिष्यते · वन्दिष्यते · शोभिष्यते · सहिष्यते · ईक्षिष्यते · रंस्यते · शिक्षिष्यते — चेत्यादयः।
सूची में छिपा हुआ अपवाद: इस पूरी सूची में एक ही रूप ‘इ’ के बिना है — रंस्यते (धातु रम्)। शेष सब सेट् हैं, इसलिए ‘इष्यते’ में समाप्त होते हैं। रम् अनिट् है, इसीलिए रम् + स्य + ते → म् का अनुस्वार → रंस्यते। पुस्तक ने इसे चुपचाप बीच में रख दिया है; ध्यान से देखने वाला छात्र इसे पकड़ लेगा।