कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 ‘वृधु’ तथा ‘लभ्’ के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘वृधु’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 201
उत्तर

नियम — लृट् में ‘स्य’ जुड़ता है, और वृध् सेट् धातु है — अर्थात् ‘स्य’ से पहले इ (इट् आगम) लगता है। इसलिए रूप बनता है वर्ध + + ष्य + ते = वर्धिष्यते

‘वृधु’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 201
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःवर्धिष्यतेवर्धिष्येतेवर्धिष्यन्ते
मध्यमपुरुषःवर्धिष्यसेवर्धिष्येथेवर्धिष्यध्वे
उत्तमपुरुषःवर्धिष्येवर्धिष्यावहेवर्धिष्यामहे
अन्त वही, बीच नया: वर्धिष्य-ते, वर्धिष्य-एते, वर्धिष्य-न्ते — प्रत्यय ठीक वही आत्मनेपद के नौ हैं जो लट् में थे। लृट् ने केवल ‘इष्य’ बीच में डाला। इसलिए आत्मनेपद के नौ प्रत्यय एक बार पक्के होने पर लृट् की तालिका स्वतः बन जाती है।

प्रयोग — वृक्षः जले सिक्ते वर्धिष्यते। · भवतः यशः वर्धिष्यते। · वयं ज्ञानेन वर्धिष्यामहे

प्र२.
‘लभ्’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 202
उत्तर

नियम — लभ् अनिट् धातु है — इसमें ‘स्य’ से पहले ‘इ’ नहीं लगता। इसीलिए रूप ‘लभिष्यते’ नहीं, लप्स्यते बनता है : लभ् + स्य + ते → भ् का प् (चर्त्व, क्योंकि आगे कठोर स् है) → लप्स्यते

‘लभ्’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 202
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःलप्स्यतेलप्स्येतेलप्स्यन्ते
मध्यमपुरुषःलप्स्यसेलप्स्येथेलप्स्यध्वे
उत्तमपुरुषःलप्स्येलप्स्यावहेलप्स्यामहे
‘वर्धिष्यते’ बनाम ‘लप्स्यते’ — यही सेट्-अनिट् का भेद है: दोनों लृट् हैं, दोनों आत्मनेपद हैं, पर एक में ‘इ’ है और दूसरे में नहीं। जिन धातुओं में यह ‘इ’ लगता है वे सेट् (स + इट्) कहलाती हैं, जिनमें नहीं लगता वे अनिट्। यह धातु का अपना स्वभाव है, कोई नियम इसे बता नहीं देता — धातुपाठ से जाना जाता है। परीक्षा में यही स्थान सबसे अधिक भूल का है : ‘लभिष्यते’ लिखना अशुद्ध है।

पुस्तक की ‘एवमेव’ सूची (लृट्) — भाषिष्यते · वर्तिष्यते · कम्पिष्यते · स्पर्धिष्यते · सेविष्यते · स्पन्दिष्यते · यतिष्यते · रोचिष्यते · एधिष्यते · मोदिष्यते · वन्दिष्यते · शोभिष्यते · सहिष्यते · ईक्षिष्यते · रंस्यते · शिक्षिष्यते — चेत्यादयः।

सूची में छिपा हुआ अपवाद: इस पूरी सूची में एक ही रूप ‘इ’ के बिना है — रंस्यते (धातु रम्)। शेष सब सेट् हैं, इसलिए ‘इष्यते’ में समाप्त होते हैं। रम् अनिट् है, इसीलिए रम् + स्य + ते → म् का अनुस्वार → रंस्यते। पुस्तक ने इसे चुपचाप बीच में रख दिया है; ध्यान से देखने वाला छात्र इसे पकड़ लेगा।
प्र३.
‘वृधु’ धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 202
उत्तर

नियम — लङ् में आगे अट् आगम ‘अ’ लगता है और आत्मनेपद के प्रत्यय बदलकर त, इताम्, अन्त / थाः, इथाम्, ध्वम् / इ, वहि, महि हो जाते हैं। ‘वर्धते’ का लङ् — अवर्धत

‘वृधु’- धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 202
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःअवर्धतअवर्धेताम्अवर्धन्त
मध्यमपुरुषःअवर्धथाःअवर्धेथाम्अवर्धध्वम्
उत्तमपुरुषःअवर्धेअवर्धावहिअवर्धामहि
लट् और लङ् की जोड़ी मिलाकर देखिए: वर्धावहे → अवर्धावहि, वर्धामहे → अवर्धामहि। आत्मनेपद में भूतकाल का चिह्न दुहरा है — आगे और अन्त में हे के स्थान पर हि। यही जोड़ी लभ्, शीङ् और भुज् में भी दिखेगी (अलभावहि, अशेवहि, अभुञ्ज्वहि)।

प्रयोग — बालकः शीघ्रम् अवर्धत। · तस्य कीर्तिः अवर्धत। · वयं तत्र अवर्धामहि

प्र४.
‘लभ्’ धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 202
उत्तर

नियम — वही अट् आगम, वही प्रत्यय, अङ्ग अपरिवर्तित लभ — इसलिए यह तालिका वृधु की तालिका की हूबहू प्रतिच्छाया है।

‘लभ्’- धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 202
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःअलभतअलभेताम्अलभन्त
मध्यमपुरुषःअलभथाःअलभेथाम्अलभध्वम्
उत्तमपुरुषःअलभेअलभावहिअलभामहि
एक खाना विशेष सावधानी माँगता है: अलभे (उत्तमपुरुष एकवचन — ‘मैंने पाया’) और लभे (लट् उत्तमपुरुष एकवचन — ‘मैं पाता हूँ’) में भेद केवल आगे के ‘अ’ का है। इसी तरह ‘अवर्धे’ और ‘वर्धे’। लिखते समय अट् आगम छोड़ देना अर्थ को वर्तमान में बदल देता है।

पुस्तक की ‘एवमेव’ सूची (लङ्) — अभाषत · अवर्तत · अकम्पत · अस्पर्धत · असेवत · अस्पन्दत · अयतत · अरोचत · ऐधत · अमोदत · अवन्दत · अरमत · अशोभत · असहत · ऐक्षत · अशिक्षत — चेत्यादयः।

‘ऐधत’ और ‘ऐक्षत’ में ‘ऐ’ क्यों: जिन धातुओं का आरम्भ ही स्वर से होता है (एध्, ईक्ष्), उनमें अट् आगम का ‘अ’ धातु के स्वर से मिलकर वृद्धि कर देता है — अ + ए = ऐ (एध् → ऐधत), अ + ई = ऐ (ईक्ष् → ऐक्षत)। यही नियम ‘इच्छति → ऐच्छत्’, ‘अर्हति → आर्हत्’ में भी लगता है। शेष सब में केवल ‘अ’ जुड़ता है।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. ‘लभ्’ का लृट् प्रथमपुरुष बहुवचन लिखिए और बताइए कि उसमें ‘इ’ क्यों नहीं है।
    उत्तर — लप्स्यन्ते। लभ् अनिट् धातु है, इसलिए ‘स्य’ से पहले इट् (इ) नहीं लगता; भ् का प् चर्त्व से हुआ।
  2. ‘अवर्धेथाम्’ का पुरुष, वचन और हिन्दी अर्थ लिखिए।
    उत्तर — मध्यमपुरुष, द्विवचन — ‘तुम दोनों बढ़े’।
  3. ‘एध्’ धातु का लङ् प्रथमपुरुष एकवचन लिखिए।
    उत्तर — ऐधत (अ + ए = ऐ, वृद्धि)।
  4. ‘वर्धिष्यते’ और ‘अवर्धत’ में कौन-सा लकार है?
    उत्तर — क्रमशः लृट् (‘इष्य’ चिह्न) और लङ् (आगे ‘अ’)।
  5. ‘रम्’ धातु का लृट् प्रथमपुरुष एकवचन लिखिए।
    उत्तर — रंस्यते — यह अनिट् है, इसलिए ‘रमिष्यते’ अशुद्ध होगा।
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