अर्थ — विधि (करना चाहिए), निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न और प्रार्थना — इन अर्थों में विधिलिङ् आता है। हिन्दी में इसका अनुवाद प्रायः ‘पढ़ना चाहिए’ या ‘यदि पढ़े तो’ होता है। पहचान — बीच में ए दिखता है।
बनने की प्रक्रिया — पठ् + शप् (अ) + यासुट् (ई/या) + त् → पठ + ई + त् → पठेत् (अ + ई = ए, गुण)
‘पठेत्’ और ‘पठेत’ को कभी मत मिलाइए: पठेत् (हलन्त) = प्रथमपुरुष एकवचन — ‘उसे पढ़ना चाहिए’। पठेत (बिना हलन्त) = मध्यमपुरुष बहुवचन — ‘तुम सबको पढ़ना चाहिए’। ठीक यही जोड़ी लङ् में भी थी (अपठत् / अपठत)। संस्कृत में हलन्त का चिह्न सजावट नहीं, अर्थ का भेद है।
सुभाषितों का लकार: संस्कृत के अधिकांश नीति-वचन विधिलिङ् में ही हैं — ‘सत्यं ब्रूयात्’, ‘न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्’, ‘धर्मं चरेत्’, ‘नित्यं पठेत्’। कारण यह कि नीति आज्ञा नहीं देती, विधि बताती है — ‘ऐसा करना चाहिए’। इसीलिए विधिलिङ् पहचानना श्लोक समझने की सीधी कुंजी है।
प्रयोग — छात्रः प्रतिदिनं पठेत्। · यूयं ध्यानेन पठेत। · अहं संस्कृतं पठेयम्। · ते सर्वे पठेयुः।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर
शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
- ‘पठ्’ धातु का लङ् मध्यमपुरुष एकवचन तथा विधिलिङ् मध्यमपुरुष एकवचन लिखिए।
उत्तर — अपठः; पठेः (दोनों विसर्गान्त — यही ध्यान देने की बात है)।
- ‘अपठन्’ और ‘पठन्तु’ में लकार तथा अर्थ बताइए।
उत्तर — अपठन् = लङ्, प्रथमपुरुष बहुवचन (उन्होंने पढ़ा); पठन्तु = लोट्, प्रथमपुरुष बहुवचन (वे पढ़ें)।
- ‘पठतात्’ किस लकार का रूप है और यह किस आदेश से बना?
उत्तर — लोट्-लकार; तातङ् आदेश से — यह ‘पठतु’ तथा ‘पठ’ दोनों का विकल्प-रूप है।
- ‘वयं संस्कृतं पठामः’ को लृट् तथा विधिलिङ् में बदलिए।
उत्तर — वयं संस्कृतं पठिष्यामः। (लृट्) · वयं संस्कृतं पठेम। (विधिलिङ्)
- ‘गम्’ (गच्छ्) धातु को पठ् के साँचे पर चलाकर लङ् प्रथमपुरुष बहुवचन लिखिए।
उत्तर — अगच्छन्।