सीधा उत्तर — छपे पृष्ठ 199 से 206 तक शारदा केवल धातुरूपों की तालिकाएँ छापती है — पाँच धातुओं के, पाँच लकारों में, तीनों पुरुष और तीनों वचन सहित। यह पाठ नहीं, परिशिष्ट है; इसमें न श्लोक हैं, न कथा, न ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ जैसा प्रश्न-खण्ड। हर तालिका पूरी भरी हुई छपी है, इसलिए यहाँ हल करने को कुछ बचता ही नहीं — उत्तर लुप्त नहीं हैं, प्रश्न ही नहीं हैं।
पुस्तक स्वयं क्या कहती है — परिशिष्ट ३ के अन्त में (पृष्ठ 183) पुस्तक लिखती है — ‘अस्मिन् परिशिष्टत्रये … इत्येते विचाराः सामान्यतया प्रदर्शिताः सन्ति। छात्राः विस्तृताध्ययनार्थम् अन्यान् ग्रन्थान् परिशीलयेयुः।’ अर्थात् परिशिष्ट केवल संकेत देते हैं; विस्तार के लिए व्याकरण-ग्रन्थ देखने चाहिए। धातुरूपों पर भी यही बात लागू होती है — यहाँ पाँच ही लकार हैं, दस नहीं।
परिशिष्ट में क्या-क्या छपा है —
| पृष्ठ | शीर्षक | धातु तथा तालिकाएँ |
|---|---|---|
| 199 | परस्मैपदिधातूनां लट्-लकारः णिच्-प्रत्ययान्तानां प्रयोगः (प्रेरणार्थे) | पठ् — साधारण लट् · ‘पठ् + णिच् = पठि’ का लट् (पाठयति) · एवमेव-सूची |
| 199–200 | परस्मैपदिधातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः | पठ् — लट् · लृट् · लङ् · लोट् · विधिलिङ् (पाँच तालिकाएँ) |
| 201–203 | आत्मनेपदीनां धातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः | वृधु तथा लभ् — पाँच-पाँच लकार (दस तालिकाएँ) + ‘वृध्’ के रूपों का वाक्येषु प्रयोगः + तीन एवमेव-सूचियाँ |
| 204–206 | विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः) | शीङ् तथा भुज् — पाँच-पाँच लकार (दस तालिकाएँ) |
तालिका कैसे पढ़ें — हर तालिका के ऊपर नीली पट्टी में धातु और लकार लिखा है (जैसे ‘पठ्’- धातुः, लङ्-लकारः)। बायाँ स्तम्भ पुरुष का है और तीन स्तम्भ एकवचनम्, द्विवचनम्, बहुवचनम् के। किसी खाने में यदि तिरछी रेखा से दो रूप छपे हैं (जैसे ‘पठतु / पठतात्’) तो दोनों शुद्ध हैं — परीक्षा में कोई एक लिखना पर्याप्त है। कई तालिकाओं के नीचे नीले अक्षरों में ‘एवमेव …’ लिखकर वे धातुएँ गिनाई गई हैं जो उसी साँचे पर चलती हैं — वह सूची तालिका जितनी ही काम की है।