कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 णिच्-प्रत्ययान्तानां प्रयोगः (प्रेरणार्थे) के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘पठ्’ धातुः — लट्-लकारः (साधारण प्रयोग) — पृष्ठ 199
उत्तर

धातु — पठ् (भ्वादिगण, परस्मैपदी, अर्थ — पढ़ना)। यह पूरे परिशिष्ट की आधार-धातु है; पुस्तक इसे पहले साधारण अर्थ में देती है, फिर उसी के सामने प्रेरणार्थक रूप रखकर भेद दिखाती है।

बनने की प्रक्रिया — पठ् + शप् (अ) + ति → पठ + ति = पठति
यहाँ ‘शप्’ भ्वादिगण का विकरण है और तीनों पुरुष-वचनों में बना रहता है; इसी कारण पूरी तालिका में ‘पठ’ अङ्ग अपरिवर्तित दिखता है।
‘पठ्’- धातुः — पृष्ठ 199
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःपठतिपठतःपठन्ति
मध्यमपुरुषःपठसिपठथःपठथ
उत्तमपुरुषःपठामिपठावःपठामः
उत्तमपुरुष में ‘आ’ कहाँ से आया: पठामि, पठावः, पठामः — तीनों में दीर्घ ‘आ’ है, जबकि शेष छह रूपों में ह्रस्व ‘अ’। कारण यह है कि उत्तमपुरुष के प्रत्ययों (मि, वस्, मस्) से पहले अतो दीर्घो यञि से अङ्ग का अन्तिम ‘अ’ दीर्घ हो जाता है। यही नियम आगे लृट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ् — सब जगह दिखेगा (पठिष्यामि, अपठाम, पठाम)।

प्रयोग —

  • बालकः पुस्तकं पठति। (प्रथमपुरुष एक. — वह पढ़ता है)
  • छात्रौ श्लोकौ पठतः। (प्रथमपुरुष द्वि.)
  • त्वं किं पठसि? (मध्यमपुरुष एक.)
  • यूयं संस्कृतं पठथ। (मध्यमपुरुष बहु.)
  • वयं प्रतिदिनं पठामः। (उत्तमपुरुष बहु.)
प्र२.
‘पठ्’ + णिच् = पठि — लट्-लकारः (प्रेरणार्थे) — पृष्ठ 199
उत्तर

नियम — जब क्रिया कर्ता स्वयं न करके दूसरे से कराता है, तब धातु के आगे णिच् प्रत्यय लगता है और अर्थ ‘पढ़ना’ से बदलकर ‘पढ़ाना’ हो जाता है। पुस्तक ने पट्टी में यही सूत्र-रूप में लिखा है — ‘पठ्’ + णिच् = पठि

रूप कैसे बना — पठ् + णिच् (इ) → अ की वृद्धि होकर आ → पाठि
पाठि + शप् (अ) + ति → पाठति (इ + अ = अय्)
अर्थ : पठति = पढ़ता है · पाठयति = पढ़ाता है / पढ़ने को प्रेरित करता है
‘पठ्’ + णिच् = पठि — लट्-लकारः — पृष्ठ 199
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःपाठयतिपाठयतःपाठयन्ति
मध्यमपुरुषःपाठयसिपाठयथःपाठयथ
उत्तमपुरुषःपाठयामिपाठयावःपाठयामः
प्रत्यय वही, अङ्ग बदला: ध्यान दीजिए — ति, तः, अन्ति, सि, थः, थ, मि, वः, मः — प्रत्यय ठीक वही हैं जो साधारण ‘पठति’ की तालिका में थे। बदला केवल अङ्ग है : पठ → पाठय। इसीलिए णिजन्त धातु का रूप याद करना अलग से काम नहीं है — अङ्ग बना लीजिए, प्रत्यय पहले से आते हैं। यही बात लृट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ् पर भी लागू होती है (अपाठयत्, पाठयिष्यति, पाठयतु, पाठयेत्)।

वाक्य में प्रेरणा कैसे दिखती है — प्रेरणार्थक वाक्य में प्रेरक (कराने वाला) प्रथमा में आता है और प्रेर्य (जिससे कराया जाए) द्वितीया में :

  • बालकः पुस्तकं पठति। → शिक्षकः बालकं पुस्तकं पाठयति। (शिक्षक बालक को पढ़ाता है)
  • शिशुः दुग्धं पिबति। → माता शिशुं दुग्धं पाययति। (माता शिशु को दूध पिलाती है)
  • अहं कथां शृणोमि। → सः मां कथां श्रावयति। (वह मुझे कथा सुनाता है)

पुस्तक की ‘एवमेव’ सूची — तालिका के नीचे पुस्तक ये णिजन्त रूप गिनाती है :

णिजन्त रूपमूल धातुअर्थ
लेखयतिलिख्लिखवाता है
खादयतिखाद्खिलाता है
हासयतिहस्हँसाता है
चालयतिचल्चलाता है
स्मारयतिस्मृयाद दिलाता है
पाययतिपापिलाता है
क्रीडयतिक्रीड्खिलाता है (खेल)
नाययतिनीले जवाता है
दर्शयतिदृश्दिखाता है
गमयतिगम्भेजता है / बिताता है
भोजयतिभुज्भोजन कराता है
दापयतिदादिलवाता है
श्रावयतिश्रुसुनाता है
ज्ञापयतिज्ञाजतलाता है, सूचित करता है
गणयतिगण् (चुरादि)गिनता है
सूची में एक बात ध्यान देने की: पुस्तक ने अन्त में गणयति भी रखा है। यह ठीक तो है, पर इसका कारण थोड़ा अलग है — ‘गण्’ चुरादिगण की धातु है, और चुरादि धातुओं में णिच् स्वभाव से ही लगा रहता है (चुरादिभ्यो णिच्)। इसलिए ‘गणयति’ का अर्थ ‘गिनवाता है’ नहीं, सीधा ‘गिनता है’ होता है — जैसे चोरयति (चुराता है), कथयति (कहता है), पूजयति (पूजता है)। रूप का साँचा वही ‘अय्’ वाला है, इसीलिए वह इसी सूची में रख दिया गया है।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. ‘पाठयावः’ का पुरुष तथा वचन बताइए और हिन्दी अर्थ लिखिए।
    उत्तर — उत्तमपुरुष, द्विवचन — ‘हम दोनों पढ़ाते हैं’।
  2. ‘छात्रः श्लोकं पठति’ को प्रेरणार्थक वाक्य में बदलिए।
    उत्तर — गुरुः छात्रं श्लोकं पाठयति। (प्रेरक प्रथमा में, प्रेर्य द्वितीया में)
  3. ‘दृश्’ तथा ‘श्रु’ के णिजन्त रूप लिखिए और अर्थ बताइए।
    उत्तर — दर्शयति = दिखाता है; श्रावयति = सुनाता है (दोनों में स्वर की वृद्धि हुई है)।
  4. ‘पाठयति’ में णिच् लगने पर धातु के स्वर के साथ क्या हुआ?
    उत्तर — ‘पठ्’ के ‘अ’ की वृद्धि होकर ‘आ’ हो गया — पठ् → पाठि → पाठयति।
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