प्र१.
‘पठ्’ धातुः — लट्-लकारः (साधारण प्रयोग) — पृष्ठ 199
उत्तर
धातु — पठ् (भ्वादिगण, परस्मैपदी, अर्थ — पढ़ना)। यह पूरे परिशिष्ट की आधार-धातु है; पुस्तक इसे पहले साधारण अर्थ में देती है, फिर उसी के सामने प्रेरणार्थक रूप रखकर भेद दिखाती है।
बनने की प्रक्रिया — पठ् + शप् (अ) + ति → पठ + ति = पठति
यहाँ ‘शप्’ भ्वादिगण का विकरण है और तीनों पुरुष-वचनों में बना रहता है; इसी कारण पूरी तालिका में ‘पठ’ अङ्ग अपरिवर्तित दिखता है।
यहाँ ‘शप्’ भ्वादिगण का विकरण है और तीनों पुरुष-वचनों में बना रहता है; इसी कारण पूरी तालिका में ‘पठ’ अङ्ग अपरिवर्तित दिखता है।
| ‘पठ्’- धातुः — पृष्ठ 199 | |||
|---|---|---|---|
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | पठति | पठतः | पठन्ति |
| मध्यमपुरुषः | पठसि | पठथः | पठथ |
| उत्तमपुरुषः | पठामि | पठावः | पठामः |
उत्तमपुरुष में ‘आ’ कहाँ से आया: पठामि, पठावः, पठामः — तीनों में दीर्घ ‘आ’ है, जबकि शेष छह रूपों में ह्रस्व ‘अ’। कारण यह है कि उत्तमपुरुष के प्रत्ययों (मि, वस्, मस्) से पहले अतो दीर्घो यञि से अङ्ग का अन्तिम ‘अ’ दीर्घ हो जाता है। यही नियम आगे लृट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ् — सब जगह दिखेगा (पठिष्यामि, अपठाम, पठाम)।
प्रयोग —
- बालकः पुस्तकं पठति। (प्रथमपुरुष एक. — वह पढ़ता है)
- छात्रौ श्लोकौ पठतः। (प्रथमपुरुष द्वि.)
- त्वं किं पठसि? (मध्यमपुरुष एक.)
- यूयं संस्कृतं पठथ। (मध्यमपुरुष बहु.)
- वयं प्रतिदिनं पठामः। (उत्तमपुरुष बहु.)