धातु — शीङ् (अदादिगण, आत्मनेपदी, अर्थ — सोना, लेटना)। धातुपाठ में नाम ‘शीङ्’ है; ‘ङ्’ इत्-संज्ञक है और आत्मनेपद का संकेत देता है। पुस्तक ने इसे ‘विशिष्टधातवः’ शीर्षक के नीचे इसलिए रखा है कि यह भ्वादि की तरह सीधी नहीं चलती — इसमें कोई विकरण नहीं लगता (अदादिगण में शप् का लोप हो जाता है), और अङ्ग दो रूप लेता है।
शय् (गुण-रहित, ‘य्’ में बदलकर) : द्विवचन में तथा जहाँ आगे स्वर आता है — शयाते, शयाथे
प्रक्रिया : शी + ते → गुण से ई → ए → शेते; शी + आते → ई का ‘य्’ → शयाते
| ‘शीङ्’- धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 204 | |||
|---|---|---|---|
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | शेते | शयाते | शेरते |
| मध्यमपुरुषः | शेषे | शयाथे | शेध्वे |
| उत्तमपुरुषः | शये | शेवहे | शेमहे |
प्रयोग — बालकः खट्वायां शेते। (बालक खाट पर सोता है) · सिंहौ गुहायां शयाते। · जनाः निद्रायां शेरते। · अहं भूमौ शये।