कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः) के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘शीङ्’ धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 204
उत्तर

धातु — शीङ् (अदादिगण, आत्मनेपदी, अर्थ — सोना, लेटना)। धातुपाठ में नाम ‘शीङ्’ है; ‘ङ्’ इत्-संज्ञक है और आत्मनेपद का संकेत देता है। पुस्तक ने इसे ‘विशिष्टधातवः’ शीर्षक के नीचे इसलिए रखा है कि यह भ्वादि की तरह सीधी नहीं चलती — इसमें कोई विकरण नहीं लगता (अदादिगण में शप् का लोप हो जाता है), और अङ्ग दो रूप लेता है।

दो अङ्ग — शे (गुण-युक्त) : एकवचन तथा बहुवचन के अधिकांश रूपों में — शेते, शेरते, शेषे
शय् (गुण-रहित, ‘य्’ में बदलकर) : द्विवचन में तथा जहाँ आगे स्वर आता है — शयाते, शयाथे
प्रक्रिया : शी + ते → गुण से ई → ए → शेते; शी + आते → ई का ‘य्’ → शयाते
‘शीङ्’- धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 204
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःशेतेशयातेशेरते
मध्यमपुरुषःशेषेशयाथेशेध्वे
उत्तमपुरुषःशयेशेवहेशेमहे
‘शेरते’ में ‘र’ कहाँ से आया: प्रथमपुरुष बहुवचन का प्रत्यय ‘अन्ते’ है, पर शीङ् में उसका ‘न्’ बदलकर र् हो जाता है (शीङः सार्वधातुके गुणः तथा ‘आत्मनेपदेष्वनतः’ के अनुसार अत् → रत्) — इसलिए ‘शेअन्ते’ नहीं, शेरते बनता है। यही असाधारण रूप शीङ् की सबसे बड़ी पहचान है; लङ् में यह अशेरत और लोट् में शेरताम् बनकर फिर दिखता है। ‘शयन्ते’ लिखना अशुद्ध है।
‘शये’ और ‘शेवहे’ — एक ही तालिका में दो अलग अङ्ग: उत्तमपुरुष एकवचन शये है (शी + ए → य् आदेश), पर द्विवचन-बहुवचन में शेवहे, शेमहे (गुण)। कारण यह कि ‘ए’ स्वर से आरम्भ होता है, जबकि ‘वहे/महे’ व्यञ्जन से — स्वर से पहले ‘य्’, व्यञ्जन से पहले गुण।

प्रयोग — बालकः खट्वायां शेते। (बालक खाट पर सोता है) · सिंहौ गुहायां शयाते। · जनाः निद्रायां शेरते। · अहं भूमौ शये

प्र२.
‘शीङ्’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 204
उत्तर

नियम — लृट् में अङ्ग की झंझट समाप्त हो जाती है — शयिष्य बनकर सर्वत्र वही रहता है (शी → गुण से शे → ‘अय्’ → शयि + ष्य)। इसीलिए यह तालिका सबसे सरल है।

‘शीङ्’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 204
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःशयिष्यतेशयिष्येतेशयिष्यन्ते
मध्यमपुरुषःशयिष्यसेशयिष्येथेशयिष्यध्वे
उत्तमपुरुषःशयिष्येशयिष्यावहेशयिष्यामहे
‘शेरते’ यहाँ क्यों नहीं दिखता: ‘र्’ वाला विशेष आदेश केवल सार्वधातुक लकारों में होता है — लट्, लङ्, लोट् में। लृट् और विधिलिङ् में अङ्ग के आगे ‘इष्य’ या ‘ई’ आ जाने से प्रत्यय सीधे ‘न्ते’ ही रहता है — शयिष्यन्ते, शयीरन्। इसीलिए शीङ् की पाँच तालिकाओं में तीन विशेष हैं और दो साधारण।

प्रयोग — बालकः रात्रौ शीघ्रं शयिष्यते। · वयं तत्र शयिष्यामहे

प्र३.
‘शीङ्’ धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 204
उत्तर
‘शीङ्’- धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 204
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःअशेतअशयाताम्अशेरत
मध्यमपुरुषःअशेथाःअशयाथाम्अशेध्वम्
उत्तमपुरुषःअशयिअशेवहिअशेमहि
दो खाने ध्यान माँगते हैं: (क) प्रथमपुरुष बहुवचन अशेरत — यहाँ फिर वही ‘र्’ आदेश है (‘अशयन्त’ अशुद्ध)। (ख) उत्तमपुरुष एकवचन अशयि — लङ् आत्मनेपद का उत्तमपुरुष एकवचन प्रत्यय ‘इ’ है और स्वर होने के कारण अङ्ग ‘शय्’ रूप लेता है : अ + शय् + इ = अशयि। ‘अशये’ लिखना अशुद्ध है। तुलना कीजिए — वृधु में अवर्ध था, पर शीङ् में अशयि; भ्वादि अ-कारान्त अङ्ग में ‘अ + इ = ए’ हो जाता है, शीङ् में ऐसा कोई ‘अ’ है ही नहीं।

प्रयोग — सः रात्रौ सुखेन अशेत। · ते वृक्षच्छायायाम् अशेरत। · अहं तत्र अशयि

प्र४.
‘शीङ्’ धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 204
उत्तर
‘शीङ्’- धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 204
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःशेताम्शयाताम्शेरताम्
मध्यमपुरुषःशेष्वशयाथाम्शेध्वम्
उत्तमपुरुषःशयैशयावहैशयामहै
‘शेष्व’ में ‘ष’ क्यों: आत्मनेपद लोट् का मध्यमपुरुष एकवचन प्रत्यय ‘स्व’ है (लभस्व, वर्धस्व)। शीङ् में उससे पहले ‘ए’ आता है, और इण्-कु के बाद स् का ष् हो जाता है (षत्व) — इसलिए शे + स्व = शेष्व। यही षत्व ‘शेषे’ (लट् मध्यम एक.) में भी दिखता है।
उत्तमपुरुष में तीनों रूप ‘शय्’ वाले हैं: शयै, शयावहै, शयामहै — यहाँ गुण नहीं हुआ, क्योंकि लोट् के उत्तमपुरुष प्रत्ययों से पहले ‘आट्’ नामक ‘आ’ जुड़ जाता है और उससे पहले ई का ‘य्’ हो जाता है। तुलना कीजिए — लट् में शेवहे, शेमहे (गुण) पर लोट् में शयावहै, शयामहै (य्)।

प्रयोग — शिशुः सुखेन शेताम्। · त्वम् अत्र शेष्व। · अहं किं शयै?

प्र५.
‘शीङ्’ धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 205
उत्तर

नियम — विधिलिङ् में अङ्ग सर्वत्र शयी रहता है — शी + ई (यासुट्) → य् आदेश + ई = शयी। इसलिए यह तालिका बिलकुल एक-रस है।

‘शीङ्’- धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 205
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःशयीतशयीयाताम्शयीरन्
मध्यमपुरुषःशयीथाःशयीयाथाम्शयीध्वम्
उत्तमपुरुषःशयीयशयीवहिशयीमहि
‘वर्धेत’ के सामने ‘शयीत’ रखिए: भ्वादि आत्मनेपद में विधिलिङ् का चिह्न दिखता है (वर्धत, लभत), पर अदादि शीङ् में वही चिह्न बनकर आता है (शयत)। कारण एक ही है — यासुट् का ‘ई’ भ्वादि के अङ्गान्त ‘अ’ से मिलकर ‘ए’ बन जाता है (अ + ई = ए), पर शीङ् में मिलने को ‘अ’ है ही नहीं, इसलिए ‘ई’ ज्यों-का-त्यों रह जाता है। आगे भुज् में भी यही ‘ई’ मिलेगा — भुञ्जत।

प्रयोग — रोगी शान्त्या शयीत। (रोगी को शान्ति से लेटना चाहिए) · ते वृक्षतले शयीरन्। · अहं तत्र न शयीय

अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. ‘शीङ्’ का लट् प्रथमपुरुष बहुवचन लिखिए और ‘र्’ का कारण बताइए।
    उत्तर — शेरते। आत्मनेपद के ‘अन्ते’ प्रत्यय का ‘न्’ इस धातु में ‘र्’ हो जाता है, इसलिए ‘शयन्ते’ नहीं, शेरते।
  2. ‘अशयि’ का पुरुष-वचन-लकार बताइए।
    उत्तर — उत्तमपुरुष, एकवचन, लङ्-लकार — ‘मैं सोया’।
  3. ‘शेष्व’ में स् का ष् क्यों हुआ?
    उत्तर — उससे पहले ‘ए’ (इण् वर्ण) है, इसलिए षत्व हुआ — शे + स्व = शेष्व।
  4. ‘वर्धेत’ के समान शीङ् का विधिलिङ् प्रथमपुरुष एकवचन क्या होगा और उसमें ‘ए’ के स्थान पर क्या है?
    उत्तर — शयीत — यहाँ ‘ए’ के स्थान पर है, क्योंकि अङ्ग के अन्त में ‘अ’ नहीं है।
  5. ‘शयाते’ और ‘शयाथे’ का अन्तर बताइए।
    उत्तर — शयाते = प्रथमपुरुष द्विवचन (वे दोनों सोते हैं); शयाथे = मध्यमपुरुष द्विवचन (तुम दोनों सोते हो)।
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