कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 ‘वृधु’ तथा ‘लभ्’ के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘वृधु’ धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 203
उत्तर

नियम — आत्मनेपद के लोट् प्रत्यय हैं — ताम्, इताम्, अन्ताम् / स्व, इथाम्, ध्वम् / ऐ, आवहै, आमहै। ध्यान दीजिए, उत्तमपुरुष में के स्थान पर हो जाता है (वर्धे → वर्धै) — यही लोट् की सबसे स्पष्ट पहचान है।

‘वृधु’- धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 203
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःवर्धताम्वर्धेताम्वर्धन्ताम्
मध्यमपुरुषःवर्धस्ववर्धेथाम्वर्धध्वम्
उत्तमपुरुषःवर्धैवर्धावहैवर्धामहै
‘वर्धेताम्’ दो जगह आया है — घबराइए मत: लोट् की तालिका में वर्धेताम् प्रथमपुरुष द्विवचन है (‘वे दोनों बढ़ें’), और लङ् की तालिका में अवर्धेताम् प्रथमपुरुष द्विवचन था (‘वे दोनों बढ़े’)। दोनों में भेद केवल आगे के ‘अ’ का है। इसी प्रकार लोट् का वर्धेथाम् (तुम दोनों बढ़ो) और लङ् का अवर्धेथाम् (तुम दोनों बढ़े) — अट् आगम ही दोनों को अलग करता है।

प्रयोग — तव यशः वर्धताम्। (तुम्हारा यश बढ़े) · त्वं विद्यया वर्धस्व। (तुम विद्या से बढ़ो) · वयं सर्वे वर्धामहै। (हम सब बढ़ें)

आशीर्वाद का लकार: ‘वर्धताम्’, ‘जयतु’, ‘भवतु’, ‘शुभं भवतु’ — संस्कृत में शुभकामना प्रायः लोट् से ही दी जाती है। ‘आयुष्मान् भव’, ‘चिरं जीव’, ‘सुखिनः सन्तु निरामयाः’ — सब लोट् हैं।
प्र२.
‘लभ्’ धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 203
उत्तर
‘लभ्’- धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 203
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःलभताम्लभेताम्लभन्ताम्
मध्यमपुरुषःलभस्वलभेथाम्लभध्वम्
उत्तमपुरुषःलभैलभावहैलभामहै
‘लभस्व’ का ‘स्व’ ध्यान से देखिए: परस्मैपद में मध्यमपुरुष एकवचन का प्रत्यय ‘हि’ था और भ्वादि में लुप्त हो जाता था (पठ!)। आत्मनेपद में उसकी जगह स्व आता है और वह कभी लुप्त नहीं होता — लभस्व, वर्धस्व, मोदस्व, सेवस्व। इसलिए ‘लभ!’ लिखना अशुद्ध है; शुद्ध है ‘लभस्व!’।

पुस्तक की ‘एवमेव’ सूची (लोट्) — भाषताम् · वर्तताम् · कम्पताम् · स्पर्धताम् · सेवताम् · स्पन्दताम् · यतताम् · रोचताम् · एधताम् · मोदताम् · वन्दताम् · रमताम् · शोभताम् · सहताम् · ईक्षताम् · शिक्षताम् — इत्यादयः च।

प्रयोग — सः धनं लभताम्। · त्वं यशः लभस्व। · वयं सफलतां लभामहै

प्र३.
‘वृधु’ धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 203
उत्तर

नियम — आत्मनेपद के विधिलिङ् प्रत्यय हैं — एत, एयाताम्, एरन् / एथाः, एयाथाम्, एध्वम् / एय, एवहि, एमहि। पहचान वही ‘’ है जो परस्मैपद ‘पठेत्’ में थी; अन्तर केवल आत्मनेपदी अन्त का है।

‘वृधु’- धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 203
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःवर्धेतवर्धेयाताम्वर्धेरन्
मध्यमपुरुषःवर्धेथाःवर्धेयाथाम्वर्धेध्वम्
उत्तमपुरुषःवर्धेयवर्धेवहिवर्धेमहि
‘वर्धेरन्’ — यही आत्मनेपद विधिलिङ् की सबसे पक्की पहचान है: परस्मैपद में प्रथमपुरुष बहुवचन ‘पठेयुः’ था; आत्मनेपद में वह वर्धेरन् हो जाता है (‘एरन्’ अन्त)। जहाँ भी वाक्य में ‘-एरन्’ दिखे, समझिए विधिलिङ्, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष बहुवचन — जैसे ‘लभेरन्’, ‘मोदेरन्’, ‘भुञ्जीरन्’।

प्रयोग — वृक्षाः जलेन वर्धेरन्। · त्वं सद्गुणैः वर्धेथाः। · अहं विद्यया वर्धेय

प्र४.
‘लभ्’ धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 203
उत्तर
‘लभ्’- धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 203
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःलभेतलभेयाताम्लभेरन्
मध्यमपुरुषःलभेथाःलभेयाथाम्लभेध्वम्
उत्तमपुरुषःलभेयलभेवहिलभेमहि

पुस्तक की ‘एवमेव’ सूची (विधिलिङ्) — भाषेत · वर्तेत · कम्पेत · स्पर्धेत · सेवेत · स्पन्देत · यतेत · रोचेत · एधेत · मोदेत · वन्देत · रमेत · शोभेत · सहेत · ईक्षेत · शिक्षेत — चेत्यादयः।

एक जोड़ी जो हर बार भ्रम पैदा करती है: लभेत (विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘उसे पाना चाहिए’) और लभेते (लट्, प्रथमपुरुष द्विवचन — ‘वे दोनों पाते हैं’)। अन्तर केवल अन्तिम ‘े’ का है। इसी प्रकार वर्धेत ↔ वर्धेते। पढ़ते समय अन्तिम मात्रा पर उँगली रखकर देखिए — वहीं लकार छिपा है।
चारों आत्मनेपद लकार एक पंक्ति में (प्रथमपुरुष एकवचन) —
लट् — लभते (पाता है) · लृट् — लप्स्यते (पाएगा) · लङ् — अलभत (पाया)
लोट् — लभताम् (पाए) · विधिलिङ् — लभेत (पाना चाहिए)
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. ‘वर्धेरन्’ तथा ‘वर्धन्ताम्’ में लकार बताइए।
    उत्तर — वर्धेरन् = विधिलिङ् (प्र.पु. बहु.); वर्धन्ताम् = लोट् (प्र.पु. बहु.)।
  2. आत्मनेपद में मध्यमपुरुष एकवचन का लोट् प्रत्यय क्या है? एक उदाहरण दीजिए।
    उत्तर — स्व — जैसे लभस्व, वर्धस्व, सेवस्व, मोदस्व।
  3. ‘लभेते’ और ‘लभेत’ में क्या भेद है?
    उत्तर — लभेते = लट्, प्रथमपुरुष द्विवचन (वे दोनों पाते हैं); लभेत = विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (उसे पाना चाहिए)।
  4. ‘सेव्’ धातु का विधिलिङ् प्रथमपुरुष एकवचन तथा लोट् मध्यमपुरुष एकवचन लिखिए।
    उत्तर — सेवेत; सेवस्व।
  5. ‘तुम्हारा यश बढ़े’ — संस्कृत में लिखिए।
    उत्तर — तव यशः वर्धताम्। (लोट्, प्रथमपुरुष एकवचन)
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