प्र1.
क्या होगा यदि… वायु में ध्वनि की चाल आवृत्ति पर निर्भर करती तो क्या तब भी गायक द्वारा वाद्ययंत्रों के साथ प्रस्तुत संगीत कानों को सुखद लगता है? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
उत्तर
नहीं — संगीत गमन करते-करते बिखर जाता, और मंच से जितना दूर बैठिए उतना ही बुरा सुनाई देता।
गाया हुआ स्वर या वाद्ययंत्र का स्वर कभी एकल आवृत्ति नहीं होता: वह मूल आवृत्ति के साथ अनेक अधिस्वरकों का संयोजन होता है। ये सब एक ही क्षण मंच से चलते हैं।
मान लीजिए मूल आवृत्ति (200 Hz) 340 m s⁻¹ से और एक अधिस्वरक (400 Hz) 350 m s⁻¹ से चले।
34 m के हॉल को पार करने में मूल आवृत्ति का समय = 34 m ÷ 340 m s⁻¹ = 0.100 s
अधिस्वरक का समय = 34 m ÷ 350 m s⁻¹ = 0.097 s
पहुँचने पर अंतर = 0.100 s − 0.097 s = 0.003 s, और दूरी के साथ यह बढ़ता जाएगा
34 m के हॉल को पार करने में मूल आवृत्ति का समय = 34 m ÷ 340 m s⁻¹ = 0.100 s
अधिस्वरक का समय = 34 m ÷ 350 m s⁻¹ = 0.097 s
पहुँचने पर अंतर = 0.100 s − 0.097 s = 0.003 s, और दूरी के साथ यह बढ़ता जाएगा
- एक ही स्वर के अधिस्वरक मूल आवृत्ति से पहले या बाद पहुँचते, अतः स्वर बिखर जाता और उसकी ध्वनिगुणता दूरी के साथ बदलती जाती — हॉल के पीछे बैठे श्रोता को तबला तबले जैसा सुनाई ही न देता।
- गायक के उच्च स्वर और संगत वाद्य के निम्न स्वर भिन्न समयों पर पहुँचते, अतः एक साथ बजाए जाने पर भी वे ताल से बाहर हो जाते।
- भिन्न दूरियों पर बैठे श्रोता एक ही प्रस्तुति से भिन्न ताल और भिन्न स्वर-रंग सुनते।
वास्तविक संसार संगीत के अनुकूल क्यों है: वायु में ध्वनि की चाल केवल माध्यम पर — ताप और आर्द्रता पर — निर्भर करती है, स्रोत या उसकी आवृत्ति पर नहीं। अतः किसी स्वर-संयोजन की सभी आवृत्तियाँ एक ही 344 m s⁻¹ से चलती हैं और साथ ही पहुँचती हैं, जिससे स्वर अखंड बना रहता है। आवृत्ति बदलने पर तरंगदैर्घ्य समायोजित होता है (λ = v/ν), चाल कभी नहीं।
क्या आप जानते हैं? कुछ विशेष पदार्थ, जैसे सरंध्र फोम और अभियांत्रित संरचनाएँ, ध्वनि की चाल को आवृत्ति पर निर्भर बना देते हैं। ध्वनिकी के अभियंता इसी असामान्य व्यवहार के कारण उनका उपयोग करते हैं।