कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 11 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
एक पुष्प के परागकोश को परिपक्व होने से पूर्व ही हटा दिया जाता है। इसके पश्चात उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के परागकण उसके वर्तिकाग्र पर छिड़के जाते हैं और बीज बनते हैं। यहाँ कौन-सी प्रक्रिया सुनिश्चित होती है? (i) स्व-परागण (ii) पर-परागण (iii) निषेचन (iv) ऊतक संवर्धन
उत्तर

(ii) पर-परागण।

क्यों: इस उपचार के दोनों चरण ठीक वही दो काम करते हैं जो पर-परागण की गारंटी के लिए आवश्यक हैं।
  • परिपक्व होने से पहले परागकोश हटा देना पुष्प का अपना परागकण झड़ने से पहले ही हटा देता है — अतः अब स्व-परागण असंभव है।
  • उसी प्रजाति के दूसरे पौधे का परागकण वर्तिकाग्र पर छिड़कना अध्याय की पर-परागण की परिभाषा को अक्षरशः पूरा करता है — एक पौधे के पुष्प के परागकोश से उसी प्रकार के दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर परागकण का स्थानांतरण।
(iii) आकर्षक गलत विकल्प क्यों है: निषेचन तो निश्चित रूप से हुआ — बीज बने हैं और बिना निषेचन के बीज बन ही नहीं सकते। परंतु निषेचन वह नहीं है जिसे प्रयोगकर्ता ने सुनिश्चित किया; परागकण पहुँच जाने के बाद वह अपने आप हुआ। उपचार ने अभिकल्प से जो सुनिश्चित किया वह यह है कि परागकण किसी दूसरे पौधे से ही आए। (i) इसलिए नहीं कि परागकोश हटा दिए गए, और (iv) असंबद्ध है — ऊतक संवर्धन अलैंगिक प्रवर्धन की विधि है जिसमें परागकण होता ही नहीं।
संकेत: इस प्रक्रिया का एक नाम है — कृत्रिम संकरण। अध्याय पृष्ठ 217 के ‘विज्ञान एवं समाज’ बॉक्स में इसका वर्णन करता है: पुष्पों से पुंकेसर हटाना, स्व-परागण रोकने के लिए थैली लगाना, और वांछित लक्षणों वाले परागकणों का हाथ से स्थानांतरण। पादप प्रजनक इसी से नई उच्च उत्पादक और रोग-प्रतिरोधी किस्में बनाते हैं।
प्र2.
पौधों में लैंगिक जनन के निम्नलिखित चरणों को सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए — (i) वर्तिकाग्र पर पराग का अंकुरण (ii) निषेचन (iii) परागण (iv) युग्मनज का निर्माण
उत्तर

(iii) परागण → (i) वर्तिकाग्र पर पराग का अंकुरण → (ii) निषेचन → (iv) युग्मनज का निर्माण।

(iii) परागण (i) पराग नलिका वर्तिका में नीचे (ii) निषेचन (iv) युग्मनज परागकोश → वर्तिकाग्र बीजांड में युग्मकों का युग्मन फिर: युग्मनज → भ्रूण  |  बीजांड → बीज  |  अंडाशय → फल
यह क्रम भौतिक अनिवार्यता से तय है — हर चरण वही परिस्थिति बनाता है जो अगले को चाहिए।
कोई और क्रम संभव क्यों नहीं:
  • परागकण को वर्तिकाग्र पर पहुँचे बिना वहाँ अंकुरित होने का प्रश्न ही नहीं — अतः (iii) पहले, (i) बाद में।
  • जब तक नलिका वर्तिका से नीचे न बढ़ जाए, नर युग्मक बीजांड तक नहीं पहुँच सकता — अतः (i) पहले, (ii) बाद में।
  • युग्मनज उसी युग्मन का परिणाम है। युग्मन से पहले उसका अस्तित्व हो ही नहीं सकता — अतः (ii) पहले, (iv) बाद में।
संकेत: (ii) और (iv) लगभग एक ही क्षण हैं, इसीलिए यही जोड़ी उलझाती है। निषेचन घटना है — दो युग्मकों का युग्मन। युग्मनज उस घटना का परिणाम है। कारण को परिणाम से पहले लिखा जाएगा।
प्र3.
नीचे दिए गए अभिकथन एवं कारण को पढ़िए और उनके संबंध में आगे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। अभिकथन — निषेचन के पश्चात निर्मित युग्मनज तत्काल गर्भाशय भित्ति से जुड़ जाता है। कारण — गर्भाशय की भित्ति सदैव युग्मनज को ग्रहण करने के लिए तैयार रहती है। (i) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण, अभिकथन की सही व्याख्या है। (ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं किंतु कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं है। (iii) अभिकथन सत्य है, किंतु कारण असत्य है। (iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है।
उत्तर

(iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है।

अभिकथन असत्य क्यों है। युग्मनज तत्काल नहीं जुड़ता। निषेचन डिंबवाहिनी में होता है, गर्भाशय में नहीं। अध्याय स्पष्ट कहता है — गर्भाशय की ओर जाते हुए युग्मनज में अनेक समसूत्री विभाजन होते हैं और तभी वह गर्भाशय के आंतरिक आस्तर में अंतर्रोपित होता है। निषेचन और अंतर्रोपण के बीच कई दिन बीतते हैं, और जो अंतर्रोपित होता है वह अब एककोशिकीय युग्मनज नहीं, कोशिकाओं का एक गोला होता है।

डिंबवाहिनी में निषेचन → यात्रा के दौरान बार-बार समसूत्री विभाजन
→ विभाजित पिंड गर्भाशय तक पहुँचता है
→ स्थूलित आंतरिक आस्तर में अंतर्रोपण = गर्भावस्था का आरंभ

कारण सत्य क्यों माना जाता है। गर्भाशय युग्मनज के आने की प्रतीक्षा करके तैयार नहीं होता — वह हर चक्र में पहले ही तैयार हो जाता है। अध्याय के अनुसार अंडोत्सर्ग से पूर्व ही गर्भाशय तैयार होने लगता है और आंतरिक आस्तर स्थूलित हो जाता है, और अंडोत्सर्ग के बाद वह और अधिक मोटा तथा रक्त वाहिकाओं से समृद्ध हो जाता है। अर्थात हर माह आस्तर तैयार किया जाता है, चाहे युग्मनज बने या न बने।

फिर भी कारण अभिकथन की व्याख्या क्यों नहीं है: पूरी तरह तैयार आस्तर भी जुड़ाव को जल्दी नहीं करा सकता, क्योंकि युग्मनज अभी गर्भाशय में पहुँचा ही नहीं है। विलंब डिंबवाहिनी की यात्रा से तय होता है, आस्तर की तैयारी से नहीं। अतः कारण स्वयं में सत्य होते हुए भी अभिकथन का कारण नहीं है — और यहाँ तो अभिकथन ही असत्य है।
शब्दों पर एक टिप्पणी: कारण में आया ‘सदैव’ शब्द ध्यान माँगता है। आस्तर हर चक्र में तैयार किया जाता है — इसी अर्थ में कारण सत्य है। वह अक्षरशः हर समय उपस्थित नहीं रहता — रजोधर्म के दिनों (दिन 1 – 5) में तो वही आस्तर निस्तारित हो रहा होता है और दिन 6 – 14 में पुनः बनता है। कारण को ‘हर चक्र में भित्ति पहले से तैयार कर ली जाती है’ के अर्थ में पढ़िए, तब विकल्प (iv) सही चयन है।
प्र4.
अलैंगिक जनन से उत्पन्न संततियाँ आनुवंशिक रूप से जनक के समान क्यों होती हैं?
उत्तर

क्योंकि जनक केवल एक है और कोशिका विभाजन भी केवल एक ही प्रकार का है — समसूत्री विभाजन, जो गुणसूत्र समूह की यथावत प्रतिलिपि बनाता है, न उसे आधा करता है और न उसमें फेरबदल करता है।

जनक कोशिका (गुणसूत्र संख्या 2n)
↓ डीएनए का प्रतिकरण: प्रत्येक गुणसूत्र की एक प्रतिलिपि
समसूत्री विभाजन: प्रत्येक गुणसूत्र की दोनों प्रतियाँ अलग-अलग संतति कोशिकाओं में
दो संतति कोशिकाएँ, प्रत्येक में 2n गुणसूत्र, वही सूचना लिए हुए

जो तीन बातें अंतर पैदा कर सकती थीं वे तीनों अनुपस्थित हैं —

  • अर्धसूत्री विभाजन नहीं, अतः गुणसूत्र जोड़े कभी स्वतंत्र रूप से पृथक नहीं होते और युग्मक बनते ही नहीं — क्रियाकलाप 11.4 वाला 2n फेरबदल होता ही नहीं।
  • दूसरा जनक नहीं, अतः कहीं और से कोई गुणसूत्र कभी नहीं आता।
  • निषेचन नहीं, अतः दो भिन्न समूह कभी मिलते नहीं।

परिणाम है समान आनुवंशिक सूचना वाले जीवों का समूह — जिन्हें अध्याय क्लोन कहता है। यह मुकुलन करती यीस्ट कोशिका, हाइड्रा के मुकुल, राइजोपस के बीजाणु, आलू के कंद और कलमी गुलाब सब पर समान रूप से लागू होता है।

‘समरूप’ पूर्णतः निरपेक्ष क्यों नहीं है: डीएनए का प्रतिकरण अत्यंत परिशुद्ध है पर पूर्ण नहीं। कभी-कभार कोई प्रतिलिपि-त्रुटि — उत्परिवर्तन — आ जाती है और उस संतति कोशिका तथा उसके सारे वंशजों में चली जाती है। पूर्णतः अलैंगिक वंश के लिए विभिन्नता का यही एकमात्र स्रोत है, और वह लैंगिक जनन के फेरबदल की तुलना में बहुत धीमा और विरल है। यही अंतर क्लोनी फसलों को संवेदनशील बना देता है, जैसा प्रश्न 7 में देखेंगे।
प्र5.
गर्भावस्था के दौरान मासिक धर्म क्यों रुक जाता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

क्योंकि रजोधर्म उस गर्भाशय आस्तर का निस्तारण है जिसकी अब आवश्यकता नहीं रही — और गर्भावस्था में उस आस्तर की तो पूरी आवश्यकता है, अतः वह निस्तारित होने के बजाय बनाए रखा जाता है।

दोनों स्थितियों की तुलना कीजिए —

अवस्थानिषेचन न होने परगर्भावस्था में
अंडाणुलगभग एक दिन जीवनक्षम रहकर नष्ट हो जाता हैशुक्राणु से युग्मित — युग्मनज बन जाता है
गर्भाशय आस्तरमोटा और रक्त वाहिकाओं से समृद्ध, पर पोषण देने को कुछ नहींमोटा और रक्त वाहिकाओं से समृद्ध, और उसमें भ्रूण अंतर्रोपित है
आगे क्या होता हैआस्तर कुछ रक्त के साथ निस्तारित हो जाता है — रजोधर्मआस्तर बनाए रखा जाता है और भ्रूण के पोषण के लिए और अधिक स्थूलित होता है
अंडोत्सर्गअगले चक्र में फिर होता हैपूरी गर्भावस्था के लिए रुक जाता है — नया अंडाणु मुक्त नहीं होता
शरीर को यह अंतर पता कैसे चलता है: भ्रूण के अंतर्रोपित होते ही वह और उसके चारों ओर बनने वाले ऊतक माँ के रक्त में हार्मोन छोड़ने लगते हैं। हार्मोन, जैसा अध्याय परिभाषित करता है, ऐसे रसायन हैं जो शरीर के अन्य भागों के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं। ये विशेष हार्मोन एक साथ दो काम करते हैं — गर्भाशय आस्तर को टूटने देने के बजाय बनाए रखते हैं, और अंडाशय को दूसरा अंडाणु मुक्त करने से रोकते हैं। अतः चक्र के दोनों भाग, अंडोत्सर्ग और निस्तारण, एक साथ बंद हो जाते हैं और पूरे नौ माह बंद ही रहते हैं।
संकेत: इसीलिए मासिक धर्म का न होना प्रायः गर्भावस्था का पहला संकेत होता है। यह संयोग नहीं, आस्तर के बनाए रखे जाने का सीधा परिणाम है। प्रसव के कुछ समय बाद चक्र फिर आरंभ होता है, और स्तनपान कराने वाली माताओं में प्रायः कुछ देर से।
प्र6.
दिन के समय खिलने वाले पुष्पों की तुलना में रात में खिलने वाले पुष्प सफेद या हल्के रंग के क्यों होते हैं?
उत्तर

क्योंकि उनके परागणकारी रात में उड़ते हैं, और अंधकार में केवल सफेद सतह ही दिखाई दे पाती है। चटकीले रंग का दल वहाँ अदृश्य रहता।

अंधकार में सफेद क्यों काम करता है और रंग क्यों नहीं: रंगीन दल इसलिए रंगीन दिखता है कि उसका वर्णक अधिकांश तरंगदैर्घ्यों को अवशोषित कर लेता है और केवल एक सँकरी पट्टी परावर्तित करता है। दिन के प्रकाश में यह ठीक है — परावर्तित पट्टी तब भी चमकीली रहती है। रात में प्रकाश वैसे ही बहुत कम होता है, अतः अधिकांश अवशोषित हो जाने के बाद पतंगे की आँख तक लगभग कुछ नहीं लौटता। सफेद दल में ऐसा वर्णक नहीं होता और वह उपलब्ध थोड़े-से प्रकाश का लगभग पूरा परावर्तित कर देता है, अतः गहरी पत्तियों के सामने वह एक उजला धब्बा बनकर उभर आता है। चाँदनी में प्रायः सफेद पुष्प पूरे पौधे की सबसे चमकीली वस्तु होता है।
आँख भी सहायता क्यों नहीं कर पाती: मंद प्रकाश में हमारी और कीट दोनों की आँखें मुख्यतः चमक के प्रति अनुक्रिया करती हैं, रंग के प्रति नहीं। अतः जो पतंगा दिन में रंग पहचान सकता है वह भी रात में वस्तुतः विपर्यास (contrast) ही देख रहा होता है। और विपर्यास ही वह वस्तु है जिसे सफेद दल अधिकतम कर देता है।

रंग के स्थान पर रात में खिलने वाले पुष्प क्या अपनाते हैं। वे सुगंध पर खर्च करते हैं। रात की रानी, हरसिंगार (पारिजात), चमेली और ब्रह्मकमल सूर्यास्त के बाद तीव्र सुगंध छोड़ते हैं। गंध के अणु वायु के साथ चलते हैं और पूर्ण अंधकार में भी उनका पीछा किया जा सकता है, अतः दूर से बुलाने का काम दृष्टि के स्थान पर गंध करती है और अंतिम पहुँच के लिए हल्के रंग का दल काम आता है। ऐसे अनेक पुष्प भरपूर मकरंद भी बनाते हैं, क्योंकि रात में उड़ने वाले पतंगे और चमगादड़ बड़े होते हैं और उन्हें अच्छा पुरस्कार चाहिए।

क्या आप जानते हैं? संकेत केवल रंग का नहीं, समय का भी है। रात की रानी अपनी सुगंध अंधेरा होने के बाद ही छोड़ती है और प्रातः बंद कर देती है — जो आगंतुक उड़ ही नहीं रहे उनके लिए विज्ञापन करने का कोई अर्थ नहीं।
प्र7.
लैंगिक रूप से उत्पन्न पौधों की तुलना में कायिक रूप से प्रवर्धित पौधे रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों होते हैं?
उत्तर

क्योंकि वे क्लोन हैं। खेत के हर पौधे में समान आनुवंशिक सूचना है, अतः जो रोगजनक एक पौधे को हरा सकता है वह सबको हरा सकता है।

दो अलग-अलग कारण हैं, और दोनों महत्त्वपूर्ण हैं —

  1. सहारा लेने योग्य कोई आनुवंशिक विभिन्नता नहीं। कायिक प्रवर्धन एक ही जनक से समसूत्री विभाजन द्वारा होता है, अतः न कोई फेरबदल है और न दूसरा जनक। यदि जनक में किसी कवक के प्रति प्रतिरोध का जीन नहीं है तो उसके किसी भी क्लोन में नहीं होगा। खेत में घुसा रोग बिना एक भी ऐसे पौधे से टकराए, जो उसे रोक सके, पूरे खेत में फैल जाता है।
  2. रोग स्वयं रोपण-द्रव्य के भीतर यात्रा करता है। कर्तन, कंद, प्रकंद या कलम जीवित तने का एक टुकड़ा है और जनक के भीतर जो भी विषाणु, जीवाणु और कवक थे उन्हें सीधे नए पौधे में ले जाता है। बीज प्रायः ऐसा नहीं करता — भ्रूण बीजांड के भीतर नए सिरे से बनता है और तुलनात्मक रूप से स्वच्छ होता है। अतः क्लोनी प्रवर्धन केवल पौधे का नहीं, उसके संक्रमणों का भी प्रवर्धन कर देता है।
लैंगिक जनन जीव संख्या की रक्षा कैसे करता है: लैंगिक रूप से उत्पन्न फसल की संतति एक-दूसरे से भिन्न होती है, क्योंकि अर्धसूत्री विभाजन और निषेचन प्रत्येक बीज को लक्षणों का नया संयोजन देते हैं। रोग आने पर कुछ पौधों में संयोगवश ऐसा संयोजन होता है जो उसका प्रतिरोध कर लेता है। वे जीवित रहकर बीज बनाते हैं, अतः फसल को क्षति तो होती है पर वह नष्ट नहीं होती, और अगली पीढ़ी में प्रतिरोधी लक्षण अधिक सामान्य हो जाता है। क्लोनी खेत में इस तंत्र के पास काम करने को कुछ है ही नहीं।
क्या आप जानते हैं? यह केवल सैद्धांतिक चिंता नहीं है। कभी विश्व की मुख्य व्यापारिक किस्म रहा ग्रॉ मिशेल केला क्लोनी रूप से ही प्रवर्धित होता था और पनामा रोग से समाप्त हो गया। उसकी जगह लेने वाला कैवेंडिश भी क्लोन ही है और अब उसी कवक के नए प्रभेद के आक्रमण में है। इसी चक्र को तोड़ने के लिए अध्याय में दिया प्ररोह शीर्ष से बने विषाणु-मुक्त ऊतक संवर्धित केले के पादपकों का उदाहरण महत्त्वपूर्ण है — शीर्षस्थ विभज्योतक प्रायः विषाणु से मुक्त होता है, अतः क्लोन कम-से-कम स्वच्छ आरंभ तो करते हैं।
प्र8.
यदि किसी प्रकार के पौधे में सभी पुष्प केवल स्व-परागण करने में सक्षम हों तो आगे आने वाली अनेक पीढ़ियों में आनुवंशिक विविधता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

आनुवंशिक विविधता तेजी से घटेगी और कुछ ही पीढ़ियों में जीव संख्या लगभग एकरूप हो जाएगी।

क्यों: स्व-परागण में दोनों युग्मक एक ही पौधे से आते हैं, अतः किसी जीन जोड़े का मिलान अपनी ही प्रतियों से ही हो सकता है। जो जोड़ा मिश्रित था (एक रूप एक जनक से, दूसरा दूसरे से) उसके अगली पीढ़ी में मिश्रित बने रहने की संभावना आधी है और मिलान वाला जोड़ा बन जाने की संभावना भी आधी — और एक बार मिलान वाला बन जाने पर वह स्व-परागण से फिर कभी मिश्रित नहीं हो सकता।
n पीढ़ी स्व-परागण के बाद शेष मिश्रित जीन जोड़ों का अंश = (½)n
1 पीढ़ी बाद = 50%
3 पीढ़ी बाद = (½)3 = 12.5%
5 पीढ़ी बाद = (½)5 = 1/32 = 3.1%
10 पीढ़ी बाद = (½)100.1%

अर्थात लगभग पाँच से दस पीढ़ियों में पौधे लगभग पूर्णतः एकरूप हो जाते हैं — जिसे प्रजनक शुद्ध वंशक्रम कहते हैं।

इस हानि के परिणाम —

  • छिपे हुए हानिकारक लक्षण प्रकट हो जाते हैं। जीन का जो हानिकारक रूप जोड़े के मिश्रित रहते ढका हुआ था वह जोड़े के मिलान वाला होते ही दिखने लगता है। पौधे दुर्बल, छोटे और कम उर्वर हो जाते हैं — यह अंतःप्रजनन अवनयन है।
  • नए संयोजन नहीं बनते। पौधे के भीतर क्रियाकलाप 11.4 वाला फेरबदल तो होता रहता है, पर दोनों युग्मक एक ही पौधे से आने के कारण मिलाने को कोई नई सामग्री ही नहीं होती। जीव संख्या नवीनता बनाना बंद कर देती है।
  • अनुकूलन की क्षमता समाप्त। नया पीड़क, नया रोग या वर्षा में परिवर्तन आने पर कोई ऐसा भिन्न पौधा नहीं होता जो संयोगवश उसे सह ले। एक ही महामारी पूरी जीव संख्या ले जा सकती है, ठीक प्रश्न 7 वाली क्लोनी फसलों की तरह।
संकेत: एकरूपता सदैव हानि नहीं है, इसीलिए कुछ फसलें इसे जान-बूझकर अपनाती हैं। गेहूँ, चावल और मटर मुख्यतः स्व-परागित हैं: खेत का हर पौधा साथ-साथ पकता है और एक-सी उपज देता है, और किसी परागणकारी की आवश्यकता ही नहीं, अतः बीज बनना सुनिश्चित रहता है। प्रजनक तो बलपूर्वक स्व-परागण भी कराते हैं — पहले शुद्ध वंशक्रम स्थिर करने के लिए, और फिर दो ऐसे वंशक्रमों को मिलाकर ओजस्वी संकर बनाने के लिए।
प्र9.
एक कृषक बड़ी संख्या में आनुवंशिक रूप से एक जैसे पौधे शीघ्रता से उगाना चाहता है। इसके लिए उपयुक्त जनन विधियों का सुझाव दीजिए और समझाइए कि वे प्रभावी क्यों हैं?
उत्तर

उसे कायिक प्रवर्धन अपनाना चाहिए — सबसे बढ़कर प्ररोह शीर्ष से ऊतक संवर्धन, और फसल के अनुसार कर्तन, कलम बाँधना या परतन। ये सभी अलैंगिक हैं, अतः सभी क्लोन देते हैं।

विधिकिसके लिए सर्वोत्तमइस कृषक के लिए क्यों उपयुक्त
ऊतक संवर्धन प्ररोह शीर्ष (शीर्षस्थ विभज्योतक) सेकेला, गन्ना, आर्किड, आलूऊतक के एक छोटे टुकड़े से हजारों समरूप पादपक, निर्जर्मित पोषक माध्यम में, किसी भी ऋतु में और छोटे स्थान में; शीर्षस्थ विभज्योतक प्रायः विषाणु-मुक्त होता है, अतः पादपक स्वस्थ मिलते हैं
कर्तनगन्ना, मनीप्लांट, गुलाब, गुड़हलसबसे सरल और सस्ती; 3 – 5 पर्वसंधियों वाली कर्तन दो-तीन सप्ताह में जड़ पकड़ लेती है
कलम बाँधनाआम, नीबू वर्ग, गुलाब, सेबचुनी हुई किस्म के प्ररोह को दृढ़ और रोग-प्रतिरोधी जड़ प्रणाली के साथ जोड़ देती है
परतननींबू, अमरूद, चमेली, अनारअत्यंत विश्वसनीय, क्योंकि जड़ें बनने तक टहनी जनक से जुड़ी रहती है और मुरझा नहीं सकती
ये विधियाँ उसकी आवश्यकता के लिए प्रभावी क्यों हैं:
  • आनुवंशिक रूप से समरूप — एक जनक से केवल समसूत्री विभाजन होता है, अतः हर पौधे में ठीक जनक के लक्षण होते हैं: वही उपज, वही आकार, वही मिठास, वही पकने का समय। पूरा बाग एक ही पौधे की तरह व्यवहार करता है, जिससे छिड़काव, कटाई और विपणन कहीं सरल हो जाते हैं।
  • शीघ्रता — पौधा पुष्पन, परागण, बीज बनने, बीज की प्रसुप्ति और अंकुरण — सब छोड़ देता है। कर्तन में पहले से पर्वसंधियाँ और संचित भोजन होते हैं और वह तुरंत बढ़ने लगती है, अतः फसल बीज से उगाई गई फसल से महीनों या वर्षों पहले तैयार हो जाती है।
  • बड़ी संख्या — विशेषकर ऊतक संवर्धन एक प्ररोह शीर्ष से हजारों पादपक बना देता है। अध्याय का अपना उदाहरण केले की खेती का है, जहाँ व्यापक स्तर पर बने स्वस्थ पादपकों ने कार्यपद्धति में क्रांति ला दी है और उच्च उपज सुनिश्चित की है।
  • कुछ फसलों के लिए एकमात्र विकल्प — केला, बीजरहित अंगूर और गन्ना उपयोगी बीज बनाते ही नहीं, अतः इन्हें और किसी प्रकार उगाया ही नहीं जा सकता।
कृषक को दी जाने वाली चेतावनी: एकरूपता एक जोखिम भी है। क्लोनों के खेत में ऐसा कोई पौधा नहीं होता जो किसी नए रोग का प्रतिरोध कर सके। उसे सलाह दीजिए कि एक से अधिक किस्में लगाए, प्रमाणित विषाणु-मुक्त रोपण-द्रव्य खरीदे और फसल चक्र अपनाए।
प्र10.
सुरेश परागकणों के अंकुरण का अध्ययन करने के लिए विभिन्न शर्करा सांद्रता (0%, 2.5%, 5%, 7.5%, 10%) में परागकण लेकर स्लाइड तैयार करता है। (i) इस व्यवस्थापन के उपयोग से किन विभिन्न परिकल्पनाओं की जाँच की जा सकती है? (ii) इस व्यवस्थापन में कौन-से मानदंडों को समान रखा जाना चाहिए?
उत्तर

(i) इस व्यवस्थापन से जाँची जा सकने वाली परिकल्पनाएँ। प्रत्येक ऐसा कथन होनी चाहिए जिसे प्रयोग गलत सिद्ध कर सके।

  1. परागकणों को अंकुरण के लिए बाहरी शर्करा की आवश्यकता होती है। अनुमान: 0% (केवल जल) पर अंकुरण नाममात्र या शून्य, अधिक सांद्रताओं पर अंकुरण।
  2. अंकुरित होने वाले परागकणों का प्रतिशत शर्करा की सांद्रता पर निर्भर करता है। अनुमान: अंकुरित कणों की गिनती स्लाइड-दर-स्लाइड बदलेगी।
  3. पराग नलिका की लंबाई शर्करा की सांद्रता पर निर्भर करती है। अनुमान: कुछ स्लाइडों पर नलिकाएँ मापने योग्य रूप से लंबी होंगी।
  4. कोई एक इष्टतम सांद्रता होती है और उसके दोनों ओर अंकुरण घट जाता है। अनुमान: सांद्रता के सापेक्ष अंकुरण का आलेख चढ़ेगा, शिखर बनाएगा और फिर उतरेगा।
‘जितनी अधिक शर्करा उतनी अधिक वृद्धि’ के बजाय इष्टतम की अपेक्षा क्यों: शर्करा एक साथ दो भूमिकाएँ निभाती है। वह श्वसन का क्रियाधार है जो पराग नलिका बनाने की ऊर्जा देती है, अतः बहुत कम होने पर परागकण भूखा रह जाता है। और वह परासरणी कारक भी है। केवल जल में बाहर का विलयन परागकण के भीतरी द्रव से अधिक तनु होता है, अतः जल भीतर दौड़ता है और परागकण फट सकता है। बहुत सांद्र विलयन में उलटा होता है — जल परागकण से बाहर खिंच जाता है, वह सिकुड़ जाता है और अंकुरण रुक जाता है। इन दोनों के बीच कहीं वह सांद्रता है जो परागकण को भोजन भी दे और उसका जल-संतुलन भी बनाए रखे, और शिखर वहीं बनता है।

(ii) समान रखे जाने वाले मानदंड — जिस एक कारक की जाँच हो रही है उसके अतिरिक्त सब कुछ।

चर का प्रकारयहाँ क्या है
स्वतंत्र चर (केवल यही बदला जाता है)शर्करा सांद्रता: 0%, 2.5%, 5%, 7.5%, 10%
आश्रित चर (जो मापा जाता है)अंकुरित परागकणों का प्रतिशत; पराग नलिका की लंबाई
नियंत्रित चर (समान रखे जाएँ)वही पादप जाति और यथासंभव वही पुष्प; समान आयु और ताजगी के परागकण; प्रति स्लाइड लगभग समान संख्या में कण; समान आयतन और आकार की बूँद; वही स्लाइड और कवरस्लिप; वही ताप; वही आर्द्रता; वही प्रकाश; गिनने से पहले वही प्रतीक्षा समय; सूक्ष्मदर्शी का वही आवर्धन; ‘अंकुरित’ की वही परिभाषा (जैसे, नलिका कम-से-कम परागकण की चौड़ाई जितनी लंबी); गिनने वाला वही व्यक्ति
संकेत: 0% वाली स्लाइड व्यर्थ नहीं है — वही नियंत्रण है। उसके बिना सुरेश यह दावा ही नहीं कर सकता था कि अंकुरण शर्करा से हुआ, क्योंकि तुलना करने को कुछ होता ही नहीं। साथ ही उसे प्रत्येक स्लाइड पर कई क्षेत्र गिनकर औसत लेना चाहिए; एक ही क्षेत्र भ्रामक हो सकता है।
प्र11.
नीचे दिए गए चित्र को देखिए और दिए गए संकेतों के आधार पर पता लगाइए कि इन पुष्पों में किस प्रकार का परागण हुआ होगा — टमाटर: पुंकेसर वर्तिकाग्र को ढक लेते हैं। गेहूँ: पुष्प परागण के पश्चात खुलते हैं। पपीता: नर और मादा पुष्प प्रायः अलग-अलग पपीते के पेड़ों पर होते हैं।
उत्तर

टमाटर और गेहूँ में स्व-परागण होता है; पपीते में पर-परागण होना ही पड़ता है। हर संकेत अकेले ही प्रश्न का उत्तर तय कर देता है।

पुष्पदिया गया संकेतपरागण का प्रकारसंकेत से यह क्यों तय होता है
टमाटरपुंकेसर वर्तिकाग्र को ढक लेते हैंस्व-परागणपरागकोश वर्तिका के चारों ओर एक सटा हुआ शंकु बना लेते हैं, अतः फटने पर परागकण सीधे उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिरता है। बाहर का परागकण इस शंकु को सरलता से पार नहीं कर सकता
गेहूँपुष्प परागण के पश्चात खुलते हैंस्व-परागण (थोड़ा वायु-पर-परागण संभव)यदि पुष्प के खुलने तक परागण हो ही चुका है तो वह बंद पुष्प के भीतर ही हुआ होगा — और भीतर उसका अपना परागकण ही उपस्थित था
पपीतानर और मादा पुष्प प्रायः अलग-अलग पेड़ों परपर-परागणमादा पुष्प में पुंकेसर होते ही नहीं, अतः उसका अपना परागकण है ही नहीं। परागकण को नर पेड़ से मादा पेड़ तक कीटों (मुख्यतः पतंगों) और वायु द्वारा लाया जाना ही पड़ेगा
यही तर्क क्रियाकलाप 11.6 के मटर में फिर क्यों दिखता है: मटर भी बंद कली के भीतर ही स्व-परागण कर लेता है, इसीलिए पहले से खिले मटर के पुष्प से पुंकेसर हटाने पर भी फली बन गई। गेहूँ भी ऐसा ही करता है। जब भी पुस्तक कहे कि पुष्प ‘परागण के पश्चात खुलता है’, तो उसे स्व-परागण की गारंटी समझिए।
संकेत: गेहूँ के पुष्प एक बार खुल जाने पर कुछ परागकण वायु में निकलता है और पड़ोसी पौधे पर उतर सकता है, अतः थोड़ा-बहुत पर-परागण भी होता है — गेहूँ एक घास है और अध्याय घासों को वायु-परागित पौधों में गिनता है। और टमाटर उगाने वाला जानता है कि पुष्प को कंपित करती मधुमक्खी परागकोश शंकु से कहीं अधिक परागकण झाड़ देती है, इसीलिए ग्रीनहाउस में स्व-परागित फसल के लिए भी मधुमक्खियाँ रखी जाती हैं।
प्र12.
उत्तरी भारत के निचले हिमालयी क्षेत्र में सेब एक महत्त्वपूर्ण नकदी फसल है जो कृषकों की आजीविका में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक परागणकारियों की जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट के कारण सेब की उपज निरंतर घट रही है। एक शोधकर्ता कृषक समूह ने दो अलग-अलग स्थानों स्थान ‘क’ और स्थान ‘ख’ पर परीक्षणार्थ सेब के दो उद्यान लगाए। स्थान ‘क’ के उद्यानों में इन्होंने सेब के पुष्पों का परागण प्राकृतिक परागणकारियों द्वारा होने दिया। स्थान ‘ख’ के उद्यानों में इन्होंने मधुमक्खी पालन की मिश्रित कृषि तकनीक अपनाई। सेब के उत्पादन के साथ-साथ कृषक ने शहद का भी उत्पादन किया। सेबों की उपज को चित्र 11.24 में दर्शाया गया है। इसे फल लगने (फलधारी शाखाओं की कुल संख्या के सापेक्ष फलों की संख्या) तथा फल गिरने (विकसित हो रहे फलों का समयपूर्व गिर जाना) के आधार पर सेब के उद्यानों के दो प्रकार के प्रायोगिक स्थलों के संदर्भ में दर्शाया गया है। (i) शोधकर्ता-कृषक समूह ने इस शोध कार्य के लिए किन परिकल्पनाओं पर विचार किया होगा? (ii) प्रयोग में कौन-कौन से विभिन्न मानदंड हैं? (iii) सेब की अधिक उपज के संदर्भ में परीक्षणार्थ लगाए गए दो उद्यानों ‘क’ और ‘ख’ के आँकड़ों की तुलना और विश्लेषण कीजिए। (iv) अपने विश्लेषण के आधार पर इन आँकड़ों से आपने क्या निष्कर्ष निकाला?
उत्तर

(i) परिकल्पनाएँ। प्रत्येक कारण और प्रभाव के विषय में जाँची जा सकने वाली कथन है।

  1. सेब की उपज में गिरावट का मुख्य कारण परागणकारियों की कमी है, केवल जलवायु परिवर्तन नहीं।
  2. उद्यान में मधुमक्खी की प्रबंधित कालोनी रखने से फल लगना बढ़ेगा, क्योंकि अधिक पुष्पों का परागण होगा।
  3. भली प्रकार परागित पुष्पों से भली प्रकार निषेचित, अधिक बीजयुक्त फल बनते हैं जिन्हें वृक्ष थामे रखता है — अतः फल गिरना घटेगा
  4. मधुमक्खी पालन वाली मिश्रित कृषि से कुल आय बढ़ेगी, क्योंकि कृषक बड़ी सेब की फसल के साथ शहद भी लेगा।

(ii) मानदंड।

प्रकारइस प्रयोग में
स्वतंत्र चरपरागण की विधि — केवल प्राकृतिक परागणकारी (स्थान ‘क’) बनाम मधुमक्खी कालोनी जोड़ी गई (स्थान ‘ख’)
आश्रित चरफल लगने का प्रतिशत और फल गिरने का प्रतिशत
नियंत्रित चर (समान रखे जाने चाहिए)सेब की किस्म; वृक्षों की आयु, आकार और संख्या; गिनी गई फलधारी शाखाओं की संख्या; मृदा और ऊँचाई; सिंचाई, खाद और छँटाई; पीड़कनाशी का उपयोग और उसका समय; ऋतु; गिनने की तिथि और विधि

(iii) आँकड़ों की तुलना। मुद्रित पृष्ठ पर चित्र 11.24 पढ़ने पर —

01020 3040 प्रतिशत 26 40 35 8 फल लगना फल गिरना प्राकृतिक परागण (क) मधुमक्खी कालोनी के साथ (ख)
चित्र 11.24 अक्ष-नामों सहित पुनः बनाया गया। ध्यान दीजिए: हिंदी संस्करण में x-अक्ष पर ‘फल लगना’ और ‘फल गिरना’ नाम तथा मूल-बिंदु पर 0 छपे हैं, जबकि अंग्रेज़ी संस्करण में ये दोनों नाम और 0 छपे ही नहीं हैं। दंडों के मान दोनों संस्करणों में समान हैं।
मापस्थान ‘क’ — प्राकृतिक परागणस्थान ‘ख’ — मधुमक्खी कालोनी के साथपरिवर्तन
फल लगना26%40%+14 प्रतिशत बिंदु, अर्थात 54% सापेक्ष वृद्धि
फल गिरना35%8%−27 प्रतिशत बिंदु, अर्थात 77% सापेक्ष कमी
वास्तव में टिके फल16.9%36.8%लगभग 2.2 गुना अधिक
फल लगने में वृद्धि = 40% − 26% = 14 प्रतिशत बिंदु
सापेक्ष वृद्धि = (14 ÷ 26) × 100 = 53.8% ≈ 54%

फल गिरने में कमी = 35% − 8% = 27 प्रतिशत बिंदु
सापेक्ष कमी = (27 ÷ 35) × 100 = 77.1% ≈ 77%

टिके फल = फल लगना × (100 − फल गिरना) ÷ 100
स्थान ‘क’ = 26 × (100 − 35) ÷ 100 = 26 × 0.65 = 16.9%
स्थान ‘ख’ = 40 × (100 − 8) ÷ 100 = 40 × 0.92 = 36.8%
अनुपात = 36.8 ÷ 16.9 = 2.2 गुना

(iv) निष्कर्ष। मधुमक्खी की कालोनी रखने से फसल दोनों चरणों पर सुधरती है — अधिक पुष्पों में फल लगते हैं और उनमें से कहीं अधिक फल पकने तक टिके रहते हैं — अतः स्थान ‘ख’ की अंतिम उपज स्थान ‘क’ से कुछ अधिक दोगुनी है। इससे परिकल्पना 1 से 3 तक की पुष्टि होती है: सेब की उपज में गिरावट मुख्यतः परागण की सीमा की समस्या है और उसे दूर किया जा सकता है। अतः मधुमक्खी पालन वाली मिश्रित कृषि हिमालयी सेब उत्पादक के लिए व्यावहारिक और कम लागत वाला उपाय है, और वह दुगुना लाभ देता है क्योंकि शहद भी मिलता है।

अधिक परागण से फल गिरना भी क्यों घटता है, केवल फल लगना ही नहीं: सेब का फल तभी सामान्य रूप से विकसित होता है जब उसके पर्याप्त बीजांड निषेचित हुए हों। जिस पुष्प को कुछ ही परागकण मिले उससे कम बीजों वाला फल बनता है और वृक्ष ऐसे फलों को छोटा रहते ही गिरा देता है। मधुमक्खियों द्वारा भरपूर परागण प्रति पुष्प अधिक बीजांडों को निषेचित करता है, अतः बनने वाले फल अधिक बीजयुक्त होते हैं और टिके रहते हैं। चित्र 11.24 के दोनों दंड वस्तुतः एक ही कारण के दो दृश्य हैं।
संकेत — अभिकल्प की एक कमी जिसका नाम लेना चाहिए: दोनों उद्यान दो भिन्न स्थानों पर हैं, अतः मृदा, ऊँचाई, मौसम और आसपास की वनस्पति वास्तव में नियंत्रित नहीं हैं। अंतर का कुछ भाग मधुमक्खियों के बजाय स्थानों के कारण भी हो सकता है। अधिक सुदृढ़ अभिकल्प वह होता जिसमें यह तुलना कई युग्मित स्थानों पर दोहराई जाती, या एक ही उद्यान के आधे भाग में मधुमक्खी कालोनी रखी जाती और आधा भाग बिना उपचार के छोड़ा जाता।
प्र13.
एक विद्यार्थी का दावा है कि ‘मानवों में अंडोत्सर्ग सदैव मासिक धर्म के 14वें दिन होता है।’ कथन की विवेचनात्मक रूप से जाँच कीजिए और बताइए कि दावा सही है या नहीं। अपने उत्तर के लिए कम-से-कम दो कारण दीजिए।
उत्तर

यह दावा सही नहीं है। 28 दिन के चक्र के लिए 14वाँ दिन एक उचित औसत है, पर ‘सदैव’ शब्द इस कथन को गलत बना देता है।

कारण 1 — चक्र की लंबाई ही व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदलती है। अध्याय बताता है कि चक्र सामान्यतः प्रत्येक 21 – 35 दिनों में दोहराया जाता है। 14वाँ दिन केवल 28 दिन के चक्र का मध्यबिंदु है। कहीं अधिक स्थिर रहने वाली बात यह है कि अंडोत्सर्ग और अगले मासिक धर्म के बीच लगभग 14 दिन का अंतर होता है। उसी से पीछे गिनने पर —

अंडोत्सर्ग का दिन ≈ चक्र की लंबाई − 14 दिन
21 दिन का चक्र: 21 − 14 = दिन 7
28 दिन का चक्र: 28 − 14 = दिन 14
35 दिन का चक्र: 35 − 14 = दिन 21
21 दिन28 दिन35 दिन दिन 7 दिन 14 दिन 21 14 दिन 14 दिन 14 दिन दिन 1 = मासिक धर्म का पहला दिन। अंडोत्सर्ग के बाद का अंतराल लगभग 14 दिन रहता है, पहले का नहीं।
अंडोत्सर्ग अगले मासिक धर्म के सापेक्ष स्थिर है, पिछले के सापेक्ष नहीं — इसीलिए उसका दिन चक्र की लंबाई के साथ खिसक जाता है।

कारण 2 — एक ही व्यक्ति में भी चक्र स्थिर नहीं रहता। उसकी लंबाई माह-दर-माह बीमारी, तनाव, यात्रा, भार में परिवर्तन, अधिक शारीरिक परिश्रम, थायरॉइड की गड़बड़ी, पी.सी.ओ.एस. और स्तनपान के साथ बदलती है। चक्र आरंभ होने के (अध्याय के अनुसार 10 – 14 वर्ष की आयु में) पहले एक-दो वर्ष प्रायः अनियमित रहते हैं और लगभग 50 वर्ष की आयु में रजोनिवृत्ति से पहले के वर्ष भी। कुछ चक्रों में अंडाणु मुक्त होता ही नहीं।

दावे को सही ढंग से कैसे कहा जाए: ‘एक प्रारूपिक 28 दिन के चक्र में अंडोत्सर्ग लगभग 14वें दिन होता है।’ अध्याय का अपना चित्र 11.21 सावधानी से स्वयं को 28 दिन की अवधि वाले एक प्रारूपिक रजोधर्म के प्रमुख चरण कहता है — अर्थात एक प्रतिनिधि स्थिति, कोई नियम नहीं।
संकेत: यह केवल शब्दों की बारीकी नहीं है। कैलेंडर से ‘सुरक्षित अवधि’ निकालना यही मानकर चलता है कि अंडोत्सर्ग किसी निश्चित दिन होता है, और यह मान्यता गलत होने के ही कारण ऐसी गणना गर्भ रोकने की अविश्वसनीय विधि है।
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