(iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है।
अभिकथन असत्य क्यों है। युग्मनज तत्काल नहीं जुड़ता। निषेचन डिंबवाहिनी में होता है, गर्भाशय में नहीं। अध्याय स्पष्ट कहता है — गर्भाशय की ओर जाते हुए युग्मनज में अनेक समसूत्री विभाजन होते हैं और तभी वह गर्भाशय के आंतरिक आस्तर में अंतर्रोपित होता है। निषेचन और अंतर्रोपण के बीच कई दिन बीतते हैं, और जो अंतर्रोपित होता है वह अब एककोशिकीय युग्मनज नहीं, कोशिकाओं का एक गोला होता है।
डिंबवाहिनी में निषेचन → यात्रा के दौरान बार-बार समसूत्री विभाजन
→ विभाजित पिंड गर्भाशय तक पहुँचता है
→ स्थूलित आंतरिक आस्तर में अंतर्रोपण = गर्भावस्था का आरंभ
कारण सत्य क्यों माना जाता है। गर्भाशय युग्मनज के आने की प्रतीक्षा करके तैयार नहीं होता — वह हर चक्र में पहले ही तैयार हो जाता है। अध्याय के अनुसार अंडोत्सर्ग से पूर्व ही गर्भाशय तैयार होने लगता है और आंतरिक आस्तर स्थूलित हो जाता है, और अंडोत्सर्ग के बाद वह और अधिक मोटा तथा रक्त वाहिकाओं से समृद्ध हो जाता है। अर्थात हर माह आस्तर तैयार किया जाता है, चाहे युग्मनज बने या न बने।
फिर भी कारण अभिकथन की व्याख्या क्यों नहीं है: पूरी तरह तैयार आस्तर भी जुड़ाव को जल्दी नहीं करा सकता, क्योंकि युग्मनज अभी गर्भाशय में पहुँचा ही नहीं है। विलंब डिंबवाहिनी की यात्रा से तय होता है, आस्तर की तैयारी से नहीं। अतः कारण स्वयं में सत्य होते हुए भी अभिकथन का कारण नहीं है — और यहाँ तो अभिकथन ही असत्य है।
शब्दों पर एक टिप्पणी: कारण में आया ‘सदैव’ शब्द ध्यान माँगता है। आस्तर हर चक्र में तैयार किया जाता है — इसी अर्थ में कारण सत्य है। वह अक्षरशः हर समय उपस्थित नहीं रहता — रजोधर्म के दिनों (दिन 1 – 5) में तो वही आस्तर निस्तारित हो रहा होता है और दिन 6 – 14 में पुनः बनता है। कारण को ‘हर चक्र में भित्ति पहले से तैयार कर ली जाती है’ के अर्थ में पढ़िए, तब विकल्प (iv) सही चयन है।