कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 12 क्रियाकलाप 12.2 के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
वन में जातियाँ किस प्रकार वितरित हैं? कौन-से पादप और जंतु निकट रूप से संबंधित हैं?
उत्तर

जातियाँ वन में समान रूप से नहीं फैली होतीं — प्रत्येक वहीं मिलती है जहाँ उसकी विशिष्ट आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। इसलिए वन एक समान वृक्षों का ढेर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे विशिष्ट क्षेत्रों की पच्चीकारी है।

पक्के के आँकड़े क्या दिखाते हैं: धनेश की चारों जातियाँ एक ही वन के अलग-अलग भागों में पाई जाती हैं, और केस स्टडी दो कारक बताती है जो यह तय करते हैं — वृक्षों का आकार और फलों की उपलब्धता। ये विशाल पक्षी घोंसला केवल पुराने विशाल वृक्षों के कोटरों में बनाते हैं और विशेष प्रकार के फल ही खाते हैं। जहाँ पर्याप्त बड़ा वृक्ष और उपयुक्त फल देने वाले वृक्ष साथ-साथ हों, वहीं वह धनेश मिलेगा; अन्यत्र नहीं।

पक्के के उदाहरण में निकट रूप से संबंधित पादप और जंतु —

  • पुराने विशाल वृक्ष ↔ धनेश। वृक्ष घोंसले का कोटर देता है; उपयुक्त आकार का कोटर न हो तो पक्षी जनन ही नहीं कर सकता।
  • फलदार वृक्ष ↔ धनेश। वृक्ष भोजन देता है; धनेश फल निगलकर बीज को मूल वृक्ष से दूर गिरा देता है, अर्थात बीज प्रकीर्णन करता है। यह संबंध दोनों ओर से चलता है — इसीलिए धनेश को "वन का कृषक" कहा जाता है।
  • बाघ ↔ हिरण ↔ घास और झाड़ियाँ। अभयारण्य की संपूर्ण आहार श्रृंखला आधार पर स्थित पादपों पर टिकी है।
संकेत: जो संबंध दोनों ओर से चलता है — जिसमें दोनों साथी एक-दूसरे के लिए आवश्यक हों — वही सबसे प्रबल होता है। उसे एक सिरे से तोड़िए तो दोनों सिरे टूट जाते हैं; प्रश्न (iii) यही निकालने को कहता है।
प्र2.
धनेश पक्षियों की इन चार जातियों के वर्गीकरण से जैव विविधता को समझने में किस प्रकार सहायता प्राप्त होती है?
उत्तर

क्योंकि जब तक ये चार अलग-अलग न पहचानी जाएँ, पूरा प्रतिरूप अदृश्य रहता है। यदि वैज्ञानिक केवल "धनेश" लिखे, तो पक्के में एक ही पक्षी सर्वत्र मिलता प्रतीत होगा। जैसे ही चारों जातियाँ अलग की जाती हैं, वही वन चार भिन्न पक्षियों का घर निकलता है, जिनमें से हर एक वन के अपने भाग में, अलग वृक्षों और अलग फलों के साथ रहता है।

वर्गीकरण से यहाँ क्या मिलता है:
  • नाम गणना में बदल जाता है। "पक्के में लगभग 300 पक्षी जातियाँ, जबकि संपूर्ण भारत में लगभग 1300" — यह समृद्धि का माप है, और यह तभी संभव है जब इनमें से हर पक्षी को अलग पहचानकर नाम दिया गया हो।
  • सटीक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। केस स्टडी स्वयं गिनाती है — वन में जातियाँ किस प्रकार वितरित हैं, कौन-से पादप और जंतु निकट रूप से संबंधित हैं। बिना छाँटे ढेर से ये प्रश्न पूछे ही नहीं जा सकते।
  • पता चलता है कि जातियाँ वन को कैसे बाँटती हैं। चार निकट संबंधी पक्षियों का साथ रहना बताता है कि वे आमने-सामने प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे; हर एक ने कुछ भिन्न वृक्ष और फल चुन लिए हैं। संसाधनों का यही बँटवारा उन तंत्रों में से एक है जिनसे एक वन इतनी जातियों को एक साथ आश्रय दे पाता है।
  • संरक्षण विशिष्ट हो जाता है। "धनेश बचाइए" एक नारा है; "इस घाटी में इन जातियों के पुराने कोटरयुक्त विशाल वृक्ष बचाइए, क्योंकि लाल गर्दन वाला धनेश केवल वहीं घोंसला बनाता है" एक कार्य है।
प्र3.
वैज्ञानिक इतनी सारी जातियों का पता किस प्रकार लगाते हैं?
उत्तर

स्मृति के स्थान पर एक प्रणाली का उपयोग करके — वही तीन साधन जो यह अध्याय आगे विकसित करता है।

  1. पदानुक्रम। प्रत्येक जाति जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति के अंतर्गत रखी जाती है। डाक-पते की भाँति यह सात चरणों में करोड़ों से घटाकर कुछ तक ले आता है। पक्के के चारों धनेश एक ही कुल में आते हैं, अतः कुल के विषय में जो भी सत्य है वह चारों के लिए पहले से ज्ञात है।
  2. विशिष्ट दो भागों वाला नाम। द्विनाम पद्धति प्रत्येक जाति को एक ही लैटिन नाम देती है जो संपूर्ण विश्व में प्रयुक्त होता है, अतः अरुणाचल प्रदेश का वैज्ञानिक और फ्रांस का वैज्ञानिक एक ही जंतु की बात करते हैं — बाघ, पुलि, टाइगर और तीग्रे का भ्रम नहीं रहता।
  3. पहचान कुंजियाँ और अभिलेख। क्षेत्र-पुस्तिकाएँ, संग्रहालय के प्रतिदर्श, छायाचित्र, ध्वनि-अभिलेख और अब डीएनए बारकोड — इनसे किसी नए प्राप्त जीव का मिलान पहले से ज्ञात जातियों से किया जाता है। जो मिलान न करे, वही नई जाति का संभावित उम्मीदवार है।
क्या आप जानते हैं? केरल के बैंगनी मेंढक नासिकाबैट्रेकस सह्याद्रेंसिस का वर्णन वर्ष 2003 में ही हुआ — यह वर्ष के अधिकांश समय भूमिगत रहता है और केवल मानसून में प्रजनन के लिए बाहर आता है। इसका अस्तित्व केवल इसलिए छूटा रहा क्योंकि उसे सही समय पर सही स्थान पर किसी ने खोजा नहीं था।
प्र4.
चार प्रकार के ये धनेश पक्षी कुछ मामलों में समान दिखते हैं। वे ऐसी कौन-सी विशेषताएँ हैं जो वैज्ञानिकों को उन्हें एक दूसरे से विभेदित करने में सहायता कर सकती हैं?
उत्तर

चारों बड़े फलभक्षी पक्षी हैं और इनकी शरीर रचना एक जैसी है, अतः इन्हें सामान्य रूप-रंग से नहीं बल्कि सूक्ष्म और पुनरावर्तनीय लक्षणों से अलग करना पड़ता है।

  • शिरस्त्राण (कास्क) और चोंच। चोंच के ऊपर का सींग जैसा उभार जातियों में आकार, आकृति और रंग में भिन्न होता है — धनेशों में यही सर्वाधिक उपयोगी लक्षण है।
  • पंखों का रंग और प्रतिरूप। लाल गर्दन वाले धनेश की लालिमायुक्त गर्दन; श्वेत-श्याम धनेश का काला-सफेद शरीर; महाधनेश की पीली चोंच और गर्दन; मोरछली धनेश की गलथैली और धारियाँ।
  • शरीर का आमाप। महाधनेश चारों में सबसे बड़ा है; श्वेत-श्याम धनेश सबसे छोटा।
  • बोली। प्रत्येक जाति की अपनी तेज़ आवाज़ होती है, जिससे वह दिखने से पहले ही पहचानी जाती है।
  • पारिस्थितिकीय लक्षण। कौन-से फल खाता है, किस प्रकार के वृक्ष और किस आकार के कोटर में घोंसला बनाता है, वन के किस भाग में रहता है — केस स्टडी के अनुसार ये जातियों में भिन्न हैं।
  • आनुवंशिक समानता। जहाँ रूप से संदेह बना रहे, वहाँ डीएनए तुलना निर्णय कर देती है।
केवल रूप-रंग पर्याप्त क्यों नहीं: अनेक पक्षियों में नर और मादा भिन्न दिखते हैं, और शिशु पक्षी दोनों से भिन्न। जो लक्षण लिंग, आयु या ऋतु के साथ बदल जाए वह खराब लक्षण है। कास्क की आकृति, बोली और डीएनए स्थिर रहते हैं, इसलिए वर्गिकीविद् इन्हीं पर भरोसा करते हैं।
प्र5.
यदि वन से पुराने विशाल वृक्ष समाप्त हो जाएँ तो क्या होगा?
उत्तर

धनेश का जनन रुक जाएगा, और उसका प्रभाव फिर पूरे वन में फैलता चला जाएगा। केस स्टडी स्पष्ट कहती है कि ये विशाल पक्षी घोंसला केवल पुराने विशाल वृक्षों के कोटरों में बनाते हैं।

परिणामों की शृंखला, चरण दर चरण:
  1. कोटर नहीं → घोंसला नहीं। धनेश स्वयं कोटर नहीं खोद सकता; उसे बना-बनाया कोटर चाहिए। बड़ा कोटर बनने में दशकों लगते हैं। पुराने वृक्ष हटते ही अंडे देने का स्थान समाप्त।
  2. घोंसला नहीं → चूजे नहीं। वयस्क पक्षी वर्षों जीवित रह सकते हैं, इसलिए वन में धनेश दिखते तो रहेंगे — परंतु जनसंख्या अपनी पूर्ति करना बंद कर देगी।
  3. धनेश नहीं → बीज प्रकीर्णन नहीं। धनेश फल पूरा निगलते हैं और बीज मूल वृक्ष से दूर गिराते हैं। इनके बिना अनेक बड़े फलों वाले वनवृक्षों के बीज मूल वृक्ष के नीचे ही गिरेंगे, जहाँ भीड़ भी है और उन्हें खाने वाले भी।
  4. प्रकीर्णन नहीं → नए वृक्ष कम। दशकों में वे वृक्ष जातियाँ घटेंगी जो धनेश पर निर्भर थीं — और अंततः वही वृक्ष भी, जो आगे चलकर अगली पीढ़ी के घोंसला-वृक्ष बनते।
  5. कोटर उपयोग करने वाले अन्य जीव भी प्रभावित। उल्लू, तोते, गिलहरियाँ, चमगादड़ और अनेक कीट इन्हीं कोटरों का उपयोग करते हैं। पुराने वृक्ष हटते ही इन सबका आश्रय एक साथ छिन जाता है।
इसका स्वरूप देखिए: क्षति विलंबित और स्वयं को बढ़ाने वाली है। वृक्ष कटने के दिन कुछ नहीं मरता — और यही बात ऐसी क्षति को दिखने में कठिन और लौटाने में असंभव बना देती है।
संकेत: धनेश जैसी जाति, जिसके हटने से पूरा वन बदल जाए, और पुराने कोटरयुक्त वृक्ष जैसा संसाधन, जिस पर अनेक जातियाँ निर्भर हों — इन्हीं के कारण संरक्षण केवल जंतुओं का नहीं, पर्यावास की संरचना का किया जाता है।
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