कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 12 क्रियाकलाप 12.4 के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
विद्यालय की प्रयोगशाला में उपलब्ध जीवाणु और नील-हरित शैवालों की स्थायी स्लाइडों का सूक्ष्मदर्शी द्वारा अवलोकन कीजिए।
उत्तर

स्लाइड को मंच पर रखिए, पहले निम्न शक्ति (10×) पर पदार्थ खोजिए, फिर उच्च शक्ति (45×) पर और यदि आपके सूक्ष्मदर्शी में हो तो तेल-निमज्जन लेंस (100×) पर लाइए — जीवाणु केवल कुछ माइक्रोमीटर के होते हैं और निम्न शक्ति पर धुँधले ही रहते हैं।

आपको क्या दिखना चाहिए —

  • जीवाणु — अत्यंत छोटे, अभिरंजित बिंदु, दंड या सर्पिल। इनके भीतर कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखता: न केंद्रक, न हरितलवक, न कोई कोशिकांग। प्रायः ये शृंखलाओं या गुच्छों में मिलते हैं।
  • नील-हरित शैवाल — स्पष्ट रूप से बड़े, नीले-हरे, प्रायः कोशिकाओं के सिरे से सिरे तक जुड़े अशाखित तंतुओं के रूप में (जैसे नॉस्टॉक, ऑसिलेटोरिया)। रंग पूरी कोशिका में फैला होता है, हरितलवक में बंद नहीं।
संकेत: सूक्ष्म समायोजन का उपयोग केवल उच्च शक्ति पर कीजिए और डायाफ्राम से प्रकाश घटाइए — अनभिरंजित पूर्वकेंद्रकी जीव लगभग पारदर्शी होते हैं और तीव्र प्रकाश की अपेक्षा मंद, विभेदयुक्त प्रकाश में कहीं अधिक सरलता से दिखते हैं।
प्र2.
उनकी तुलना चित्र 12.6 से कीजिए।
उत्तर

चित्र 12.6 मोनेरा जगत के सदस्य दिखाता है। अपनी स्लाइड को चित्र से बिंदुवार मिलाइए।

विशेषताजीवाणुनील-हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया)
कोशिका का प्रकारपूर्वकेंद्रकी — झिल्ली आबद्ध केंद्रक नहींपूर्वकेंद्रकी — झिल्ली आबद्ध केंद्रक नहीं
संगठन का स्तरएककोशिकीयएककोशिकीय, प्रायः तंतुओं या निवहों में
सूक्ष्मदर्शी में आमापबहुत छोटे बिंदु, दंड, सर्पिलस्पष्टतः बड़े; कोशिकाओं की शृंखला
रंगकेवल वही जो अभिरंजक से आयाप्राकृतिक रूप से नीला-हरा
पोषणअधिकांशतः विषमपोषी; कुछ स्वपोषीस्वपोषी (प्रकाश संश्लेषण) — और अपघटक भी
दिखने में भिन्न होकर भी दोनों एक ही जगत में क्यों: जगत का निर्णय चित्र 12.5 के पहले विभाजन पर होता है — कोशिका का प्रकार। दोनों में से किसी में वास्तविक केंद्रक नहीं है, अतः रंग, आकृति या पोषण चाहे जो हो, दोनों मोनेरा हैं। इसकी तुलना अमीबा से कीजिए, जो एककोशिकीय तो है परंतु उसमें वास्तविक केंद्रक है, इसलिए वह प्रोटिस्टा में जाता है।
प्र3.
आपने क्या अवलोकन किया?
उत्तर

दोनों एककोशिकीय पूर्वकेंद्रकी जीव हैं — न वास्तविक केंद्रक, न झिल्ली आबद्ध कोशिकांग — इसीलिए दोनों को मोनेरा जगत के अंतर्गत रखा गया है। इसके आगे दोनों आमाप, रंग और पोषण की विधि में भिन्न हैं।

पूर्वकेंद्रकी होने का परिणाम: भीतर कोई कक्ष न होने के कारण जीवाणु कोशिका का सारा कार्य एक ही स्थान में होता है। इसका डीएनए कोशिकाद्रव्य में स्वतंत्र पड़ा रहता है। इससे कोशिका छोटी और सरल रहती है, और तेज़ भी — जीवाणु बीस मिनट में विभाजित हो सकता है, इसीलिए जीवाणु नई परिस्थितियों में इतनी शीघ्रता से फैल जाते हैं।

ये जीव कहाँ रहते हैं और क्या करते हैं — अध्याय के अनुसार:

  • जीवाणु सर्वत्र पाए जाते हैं — मृदा, जल, वायु, उष्ण स्रोत तथा अन्य चरम परिस्थितियाँ जहाँ अधिकांश जीवों का जीवित रहना संभव नहीं, यहाँ तक कि मानव शरीर के भीतर भी।
  • ये रोमंथी जीवों की आहार नली में पाए जाते हैं और इन जंतुओं के गोबर से बायोगैस उत्पादन के लिए उत्तरदायी हैं।
  • कुछ हानिकारक रोगजनक होते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं, परंतु अनेक लाभदायक हैं — लैक्टोबैसिलस और राइजोबियम
  • नील-हरित शैवाल स्वपोषी और अपघटक होते हैं; पोषक चक्रण के अतिरिक्त कुछ जीवाणु तेल, कीटनाशक, वाहित मल इत्यादि प्रदूषकों को भी विघटित कर देते हैं।
क्या आप जानते हैं? साइनोबैक्टीरिया उन प्रारंभिक जीवों में थे जिन्होंने प्रकाश संश्लेषण से ऑक्सीजन उत्पन्न की। लगभग 2.5 अरब वर्ष पूर्व यह ऑक्सीजन वायुमंडल में संचित हुई जिससे पृथ्वी अन्य प्रकार के जीवों के लिए उपयुक्त बन गई। प्राचीन साइनोबैक्टीरिया के जीवाश्म स्ट्रोमेटोलाइट्स नामक रचनाओं में मिलते हैं, और ये राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में पाए गए हैं — पृथ्वी पर जीवन के कुछ प्राचीनतम प्रमाण।
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