कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 12 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
इनके शरीर बेलनाकार और खंडों में विभाजित होते हैं। खंडीभवन से जीव को क्या लाभ हो सकते हैं? केंचुए की गति का अवलोकन करने से आपको यह संकल्पना निर्मित करने में सहायता मिल सकती है।
उत्तर

खंडीभवन अधिक लचीलेपन और गति पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण को संभव बनाता है — क्योंकि प्रत्येक खंड को अलग से चलाया जा सकता है, पूरे शरीर को एक ठोस पिंड की भाँति काम नहीं करना पड़ता।

केंचुए को देखिए, तंत्र स्पष्ट हो जाएगा। छोटा और मोटा होने की एक तरंग शरीर में आगे से पीछे की ओर दौड़ती है। किसी भी क्षण कुछ खंड लंबे और पतले होते हैं (आगे की बिल पकड़ते हुए) और कुछ छोटे व मोटे (लंगर की भाँति टिके हुए)। यदि पूरे शरीर को एक साथ सिकुड़ना पड़ता तो वह एक ही ढेर में छोटा हो जाता और कहीं नहीं जाता। शरीर विभाजित होने के कारण हर खंड की अपनी वर्तुल और अनुदैर्ध्य पेशियाँ होती हैं और देहगुहा (चित्र 12.15) का अपना द्रव भरा कक्ष होता है जिसके विरुद्ध वह धकेल सके — इसीलिए तरंग जंतु के साथ चलकर उसे आगे बढ़ा देती है। तंत्रिका रज्जु पूरी लंबाई में फैली है और हर खंड तक शाखा भेजती है, जिससे समय-निर्धारण सटीक रहता है।

लाभ, क्रम से —

  • लचीली, तरंग जैसी गति — मृदा में बिल बनाने के लिए अनिवार्य।
  • स्थानीय स्तर पर सटीक नियंत्रण, क्योंकि पेशियाँ और तंत्रिकाएँ हर खंड में दोहराई गई हैं।
  • सुरक्षा का अंतर — एक खंड को क्षति पहुँचने से पूरा जंतु निष्क्रिय नहीं होता।
  • विशेषीकरण की संभावना। दोहराई गई इकाइयाँ आगे चलकर अलग-अलग कार्य ले सकती हैं — आर्थ्रोपोडा में ठीक यही हुआ है, जहाँ अलग खंड सिर, वक्ष और उदर बनकर पाद, पंख, श्रृंगिका और मुखांग धारण करते हैं।
ध्यान दीजिए: ऐनेलिड में अंग तंत्र स्तर का संगठन होता है और देहगुहा भी उपस्थित होती है। देहगुहा खंडों जितनी ही महत्त्वपूर्ण है: यह आहार नाल को देह भित्ति से अलग रखती है, जिससे जंतु अपनी ही आँत को दबाए बिना चल सकता है, और उसमें भरा द्रव पेशियों के लिए कंकाल का काम करता है।
प्र2.
आर्थ्रोपोड की एक निर्धारक संरचनात्मक विशेषता कठोर बहिःकंकाल (दृढ़ बाह्य आवरण) का विकास है। इस बाहरी आवरण के क्या लाभ हो सकते हैं?
उत्तर

बहिःकंकाल सुरक्षा प्रदान करता है, जल की हानि कम करता है और मांसपेशियों को अवलंब देता है — और इन्हीं के कारण आर्थ्रोपोड शुष्क और अरक्षित पर्यावरण में जीवित रह पाते हैं, जहाँ कोमल शरीर वाले जंतु नहीं रह सकते।

  1. सुरक्षा। कठोर आवरण कोमल अंगों को परभक्षियों और भौतिक क्षति से बचाता है।
  2. जल की हानि में कमी। आवरण पर मोम की परत होती है। स्थल पर यही निर्णायक लाभ है — केंचुए को नम मृदा में रहना पड़ता है क्योंकि उसकी त्वचा से जल उड़ता है; भृंग गर्म सूखी भूमि पर चल सकता है।
  3. शक्तिशाली पेशियों को अवलंब। पेशियाँ आवरण के भीतरी तल से जुड़ी होती हैं और उस पर उत्तोलक की भाँति खिंचती हैं। दृढ़ आधार होने से छोटा जंतु भी बड़ा बल उत्पन्न कर लेता है — इसीलिए कीट अपनी लंबाई से कई गुना कूद जाते हैं और केकड़े का चीलीपद कवच तोड़ सकता है।
  4. संधित उपांग। नाम ही यह कहता है — आर्थ्रो का अर्थ है संधित और पोडा का अर्थ है पाद। दृढ़ पट्टिकाओं के बीच की संधियाँ पाद, पंख और मुखांगों को सटीक, शक्तिशाली और नियंत्रित गति देती हैं।
इसकी कीमत: दृढ़ आवरण बढ़ नहीं सकता। आर्थ्रोपोड को समय-समय पर निर्मोचन करना पड़ता है — पुराना बहिःकंकाल उतारकर नया कठोर बनाना — और जब तक नया आवरण मुलायम है, जंतु असुरक्षित रहता है। बहिःकंकाल अपनी दृढ़ता की तुलना में भारी भी होता है, यही एक कारण है कि कुत्ते जितने बड़े कीट नहीं होते।
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