प्र1.
इनके शरीर बेलनाकार और खंडों में विभाजित होते हैं। खंडीभवन से जीव को क्या लाभ हो सकते हैं? केंचुए की गति का अवलोकन करने से आपको यह संकल्पना निर्मित करने में सहायता मिल सकती है।
उत्तर
खंडीभवन अधिक लचीलेपन और गति पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण को संभव बनाता है — क्योंकि प्रत्येक खंड को अलग से चलाया जा सकता है, पूरे शरीर को एक ठोस पिंड की भाँति काम नहीं करना पड़ता।
केंचुए को देखिए, तंत्र स्पष्ट हो जाएगा। छोटा और मोटा होने की एक तरंग शरीर में आगे से पीछे की ओर दौड़ती है। किसी भी क्षण कुछ खंड लंबे और पतले होते हैं (आगे की बिल पकड़ते हुए) और कुछ छोटे व मोटे (लंगर की भाँति टिके हुए)। यदि पूरे शरीर को एक साथ सिकुड़ना पड़ता तो वह एक ही ढेर में छोटा हो जाता और कहीं नहीं जाता। शरीर विभाजित होने के कारण हर खंड की अपनी वर्तुल और अनुदैर्ध्य पेशियाँ होती हैं और देहगुहा (चित्र 12.15) का अपना द्रव भरा कक्ष होता है जिसके विरुद्ध वह धकेल सके — इसीलिए तरंग जंतु के साथ चलकर उसे आगे बढ़ा देती है। तंत्रिका रज्जु पूरी लंबाई में फैली है और हर खंड तक शाखा भेजती है, जिससे समय-निर्धारण सटीक रहता है।
लाभ, क्रम से —
- लचीली, तरंग जैसी गति — मृदा में बिल बनाने के लिए अनिवार्य।
- स्थानीय स्तर पर सटीक नियंत्रण, क्योंकि पेशियाँ और तंत्रिकाएँ हर खंड में दोहराई गई हैं।
- सुरक्षा का अंतर — एक खंड को क्षति पहुँचने से पूरा जंतु निष्क्रिय नहीं होता।
- विशेषीकरण की संभावना। दोहराई गई इकाइयाँ आगे चलकर अलग-अलग कार्य ले सकती हैं — आर्थ्रोपोडा में ठीक यही हुआ है, जहाँ अलग खंड सिर, वक्ष और उदर बनकर पाद, पंख, श्रृंगिका और मुखांग धारण करते हैं।
ध्यान दीजिए: ऐनेलिड में अंग तंत्र स्तर का संगठन होता है और देहगुहा भी उपस्थित होती है। देहगुहा खंडों जितनी ही महत्त्वपूर्ण है: यह आहार नाल को देह भित्ति से अलग रखती है, जिससे जंतु अपनी ही आँत को दबाए बिना चल सकता है, और उसमें भरा द्रव पेशियों के लिए कंकाल का काम करता है।