कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 12 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
स्पंज एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं और जलीय पर्यावरण में पाए जाते हैं। क्या आपको लगता है कि वे स्थल पर जीवित रह सकते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर

नहीं। स्पंज स्थल पर जीवित नहीं रह सकता, क्योंकि उसके सभी जैव प्रक्रम उसके शरीर से बहते जल पर निर्भर हैं।

तंत्र क्या है: स्पंज बहुकोशिकीय तो है परंतु उसमें ऊतक और अंग संगठन नहीं होते। उसमें न मुख है, न आहार नाल, न क्लोम, न हृदय, न पेशियाँ, न तंत्रिका तंत्र। इसके स्थान पर उसके शरीर के अनेक छिद्रों से जल निरंतर बहता रहता है, और वही धारा एक साथ चार काम करती है —
  • यह भोजन के कण सीधे कोशिकाओं तक पहुँचाती है;
  • यह ऑक्सीजन सीधे कोशिकाओं तक पहुँचाती है;
  • यह अपशिष्ट पदार्थों को बाहर ले जाती है;
  • यह स्पंज की जनन कोशिकाओं को भी बाहर और भीतर ले जाती है।
जल हट जाए तो चारों काम एक साथ रुक जाते हैं। कोई अंग उन्हें सँभाल भी नहीं सकता, क्योंकि अंग हैं ही नहीं। स्थलीय जंतु को श्वसन के लिए फेफड़े या श्वासनलिकाएँ चाहिए, पाचन के लिए आहार नाल, और सूखने से बचने के लिए जलरोधी आवरण — स्पंज में इनमें से कुछ नहीं है, और उसका शरीर छिद्रयुक्त है, अतः वह मिनटों में सूख जाएगा।
क्या आप जानते हैं? अनुसंधान अध्ययन दर्शाते हैं कि एक किलोग्राम स्पंज प्रतिदिन 24000 लीटर समुद्री जल को निस्यंदित कर सकता है। यही एक आँकड़ा बता देता है कि यह जंतु धारा पर कितना पूर्णतः निर्भर है — वह जल में इतना नहीं रहता जितना अपने से होकर बहते जल पर जीता है।
प्र2.
यद्यपि नाइडेरिया के शरीर में एक ही छिद्र होता है जो भोजन के अंतर्ग्रहण और अपशिष्ट के निष्कासन दोनों का कार्य करता है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस शरीर की संरचना की क्या कमियाँ हो सकती हैं?
उत्तर

एक ही छिद्र का अर्थ है कि भोजन ग्रहण और अपशिष्ट निष्कासन एक साथ नहीं हो सकते, और पाचन को चरणों में बाँटा नहीं जा सकता। इससे तीन कमियाँ निकलती हैं।

  1. अपशिष्ट निकलते समय भोजन लेना रुक जाता है। एक ही द्वार दोनों दिशाओं में प्रयुक्त होता है, अतः जंतु निरंतर नहीं खा सकता। एक सिरे पर मुख और दूसरे पर गुदा वाली आहार नाल भोजन को एक ही दिशा में चलाती है और दोनों प्रवाहों को अलग रखती है।
  2. आहार नाल में विशेषीकरण संभव नहीं। एक छिद्र वाली देहगुहा में पाचन एक ही कक्ष में होता है। नली होने पर अलग-अलग भाग क्रम से अलग-अलग कार्य कर सकते हैं — पीसना, फिर एंजाइम पाचन, फिर अवशोषण, फिर जल का पुनरवशोषण। यह कहीं अधिक दक्ष है।
  3. अपचित अपशिष्ट आते हुए भोजन से मिल जाता है। पोषक और अपशिष्ट एक ही स्थान साझा करते हैं, जिससे अवशोषण सीमित होता है और अपशिष्ट फिर से ग्रहण होने का जोखिम रहता है।
फिर भी नाइडेरिया के लिए यह चल क्यों जाता है: हाइड्रा या जेलीफिश का शरीर केवल दो कोशिका स्तर मोटा होता है, अतः भीतरी स्तर की हर कोशिका पाचन गुहा को सीधे छूती है और वहीं से भोजन सोख लेती है — रुधिर आपूर्ति की आवश्यकता ही नहीं। यह रचना तभी कमी बनती है जब जंतु बड़ा और मोटा हो जाए। अध्याय के अगले चरण इसी का समाधान करते हैं: गोल कृमियों में दो छिद्र — मुख और गुदा होते हैं, जो इस क्रम की पहली वास्तविक एकदिशीय आहार नाल है।
प्रतिरूप देखिए: पोरीफेरा (ऊतक नहीं, सारा काम जल की धारा करती है) → नाइडेरिया (वास्तविक ऊतक, स्पर्शकों से सक्रिय शिकार, परंतु एक छिद्र) → प्लैटीहेल्मिन्थीस (द्विपार्श्व सममिति, फिर भी एक छिद्र) → नेमाटोडा (दो छिद्र)। हर चरण पिछली उपलब्धि रखता है और एक कमी दूर करता है।
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