कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 12 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
क्या जैव विविधता शब्द का संबंध केवल जीवों की विविधता से है अथवा इसमें अन्य तत्व भी सम्मिलित हैं?
उत्तर

इसमें जीवों की सूची से कहीं अधिक सम्मिलित है। जैव विविधता तीन स्तरों पर मापी जाती है, और अध्याय तीनों का उपयोग करता है, भले ही नाम सबसे अधिक पहले का लेता हो।

  1. जातीय विविधता — भिन्न-भिन्न जातियों की संख्या और विविधता। यह स्पष्ट स्तर है: पक्के में लगभग 300 पक्षी जातियाँ, संपूर्ण भारत में लगभग 1300।
  2. एक जाति के भीतर आनुवंशिक विविधता — एक ही प्रकार के जीवों के बीच का अंतर। अध्याय इसी से आरंभ होता है: सहस्र वर्षों से कृषक सूखा सहिष्णुता, पीड़क प्रतिरोधकता और न्यून पोषक तत्वों वाली मृदा में उगने की क्षमता जैसी उपयोगी विशेषताओं वाली किस्में संरक्षित करते आए हैं, क्योंकि विविधता से फसल के नष्ट होने का जोखिम कम होता है और खाद्य सुरक्षा सुदृढ़ होती है। ये सारी किस्में एक ही जाति हैं; विविधता उनके जीनों में है।
  3. पारितंत्र और पर्यावास की विविधता — स्वयं स्थानों की विविधता। भारत के प्राकृतिक भूदृश्य में उत्तर में पर्वत, पश्चिम में मरुस्थल, पूर्वोत्तर में वर्षावन, दक्षिण में पठार और लंबी तट रेखाएँ हैं। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी मृदा और जलवायवीय स्थितियाँ हैं, और ये विभिन्न पर्यावास मिलकर विविध जातियों को आश्रय देते हैं।
अतिरिक्त स्तर क्यों मायने रखते हैं: जिस वन में जातियों की संख्या तो उतनी ही हो पर उनके भीतर कोई आनुवंशिक विविधता न हो, वह भंगुर होता है — एक नया रोग पूरी एकरूप फसल को समाप्त कर सकता है, और कृषि में ऐसा बार-बार हुआ है। और कोई देश सैद्धांतिक रूप से हर जाति को चिड़ियाघर में जीवित रख ले, फिर भी उसकी जैव विविधता जा चुकी होगी, क्योंकि अंतःक्रियाएँ — धनेश और फलदार वृक्ष, राइजोबियम और दलहन की जड़, लाइकेन में कवक और शैवाल — केवल कार्यशील पर्यावास में ही रहती हैं। जैव विविधता में ये संबंध भी सम्मिलित हैं।
ध्यान दीजिए: मणिपुर की लोकटक झील के फुमडिस पर्यावास विविधता के अपूरणीय होने का अच्छा उदाहरण हैं। संगाई हिरण उसी एक तैरते घास मैदान का स्थानिक है; फुमडिस बचाए बिना हिरण बचाने का कोई अर्थ ही नहीं।
प्र2.
यदि आपको किसी तालाब में कोई नया जीव दिखाई देता है तो आप उसे वर्गीकृत करने के लिए उसकी किन विशेषताओं का अवलोकन करेंगे और क्यों?
उत्तर

चित्र 12.5 के क्रम में — सबसे मौलिक लक्षण से सबसे सूक्ष्म तक — ताकि हर अवलोकन संभावनाओं को लगभग आधा कर दे।

क्रममैं क्या देखूँगाक्यों — यह क्या तय करता है
1कोशिका का प्रकार: क्या झिल्ली आबद्ध केंद्रक है? (उच्च आवर्धन या अभिरंजन चाहिए)केंद्रक नहीं → मोनेरा, और जाँच वहीं समाप्त। केंद्रक है → आगे
2संगठन का स्तर: एक कोशिका या अनेक?एककोशिकीय सुकेंद्रकी → प्रोटिस्टा। बहुकोशिकीय → आगे
3कोशिका भित्ति: उपस्थित या अनुपस्थित? उपस्थित हो तो काइटिन या सेल्युलोस?भित्ति नहीं → एनिमेलिया। काइटिन → फंजाई। सेल्युलोस → प्लांटी
4पोषण की विधि: हरा और स्वयं भोजन बनाता है, या अवशोषित करता है, या निगलता है?फंजाई (अवशोषण) और प्लांटी (प्रकाश संश्लेषण) के विभाजन की पुष्टि
5शरीर संगठन और सममिति; जंतु हो तो पृष्ठरज्जु या कशेरुक दंड है?एनिमेलिया के भीतर स्थान — अकशेरुकी या कॉर्डेट, फिर संघ
6गति और पोषण की विधि (कूटपाद, पक्ष्माभ, कशाभ; स्पर्शक; मुख और गुदा)समूह और सँकरा हो जाता है और प्रायः जीव का नाम भी मिल जाता है
7जनन और अंत में डीएनए तुलनास्थान की पुष्टि करती है और निकटतम संबंधी बताती है
यही क्रम क्यों: कुंजी का उद्देश्य यह है कि हर प्रश्न उत्तर देने योग्य हो और अधिक-से-अधिक संभावनाएँ काट दे। कोशिका का प्रकार संपूर्ण जीवजगत को दो में बाँट देता है; रंग या आमाप लगभग कुछ भी नहीं बाँटता। मौलिक लक्षण से आरंभ करना आपको क्रियाकलाप 12.1 वाले जाल से भी बचाता है — कि ऊपरी समानता (दोनों तैरते हैं, दोनों हरे हैं) असंबद्ध जीवों को एक साथ रख सकती है।
व्यावहारिक बात: तालाब के प्रतिदर्श में सबसे अधिक प्रोटिस्ट ही मिलते हैं — अमीबा, पैरामीशियम और यूग्लीना (चित्र 12.7)। यदि आपका जीव कूटपाद, पक्ष्माभ या कशाभ से चलता है और वास्तविक केंद्रक युक्त एक कोशिका है, तो लगभग निश्चित रूप से वह वहीं का है।
प्र3.
आनुवंशिक अध्ययन सजीवों के संबंध में गहन जानकारी क्यों प्रदान करते हैं?
उत्तर

क्योंकि डीएनए स्वयं अनुदेश-समुच्चय है, उसका कोई बाहरी परिणाम मात्र नहीं। दिखाई देने वाला हर लक्षण — आकृति, रंग, पोषण की विधि — डीएनए का ही उत्पाद है, अतः डीएनए की तुलना जीवों की तुलना ठीक उसी स्तर पर करती है जहाँ वंशागति वास्तव में होती है।

आनुवंशिक प्रमाण रूप-रंग से अधिक गहरा क्यों है — चार कारण:
  • यह वंशक्रम का सीधा अभिलेख है। प्रत्येक जीवित कोशिका में आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) होता है जिसमें उस जीव की वृद्धि और प्रकार्यों संबंधी अनुदेश निहित होते हैं, और वह जनक से संतति में प्रतिलिपित होता है। जिन जीवों का डीएनए समान होता है उन्हें सहपूर्वजता वाला माना जाता है। समान रूप सहपूर्वजता का अर्थ रख भी सकता है और नहीं भी; समान डीएनए का बहाना बनाना कहीं कठिन है।
  • यह भ्रामक समानता को भेद देता है। डॉल्फिन मछली जैसी दिखती है और चमगादड़ का पंख पक्षी जैसा, परंतु डीएनए दोनों को दृढ़ता से स्तनधारियों के साथ रखता है। इसी प्रकार जो जीव एक जैसे दिखते हैं उनके छिपे अंतर भी डीएनए उजागर कर देता है।
  • यह वहाँ भी काम करता है जहाँ संरचना कुछ नहीं देती। दो जीवाणु सूक्ष्मदर्शी में एक जैसे दंड दिख सकते हैं। तुलना के लिए बाहरी लक्षण लगभग है ही नहीं। डीएनए दो के स्थान पर हजारों लक्षण दे देता है।
  • यह मात्रात्मक है। दो अनुक्रमों में कितना अंतर है, यह मापा जा सकता है, अतः संबंधों को केवल कहा नहीं, क्रम में रखा जा सकता है।
इससे वास्तव में क्या बदला: जीवों की डीएनए स्तर पर तुलना ही वह कार्य है जिसके आधार पर कार्ल वूस ने वर्ष 1977 में तीन डोमेन पद्धति — बैक्टीरिया, आर्किया और यूकैरिया — प्रस्तावित की। इससे पता चला कि "जीवाणु" कहकर एक साथ रखे गए कुछ जीव आपस में उतने ही भिन्न हैं जितने वे हमसे हैं, और यह कि अति सूक्ष्मजीव प्रकारों की विविधता उससे कहीं अधिक है जितना हम पहले सोचते थे। सूक्ष्मदर्शी में कितना भी देखते रहने से यह कभी सामने नहीं आता।
प्र4.
जलवायु में होने वाले परिवर्तन जैव विविधता को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं?
उत्तर

जलवायु वे परिस्थितियाँ तय करती है जिनके लिए हर जाति अनुकूलित है। जब ये परिस्थितियाँ जातियों के अनुकूलन या स्थानांतरण की गति से तेज़ बदलती हैं, तो जनसंख्याएँ घटती हैं और जातियाँ लुप्त होती हैं — और चूँकि जातियाँ एक-दूसरे पर निर्भर हैं, यह क्षति फैलती जाती है।

मुख्य मार्ग, तंत्र सहित —

  • पर्यावास स्वयं बदल जाता है। भारत के हर क्षेत्र का अपना तापमान और वर्षा है, और यही विविध पर्यावास विविध जातियों को आश्रय देते हैं। तापन उस तापमान-पट्टी को ऊँचाई या अक्षांश की ओर खिसका देता है जिसकी जाति को आवश्यकता है। हिमालय या पश्चिमी घाट की जाति ऊपर तभी तक जा सकती है जब तक पर्वत है — पर्वत-शिखर और स्थानिक जातियों के पास जाने को कोई स्थान बचता ही नहीं, इसीलिए स्थानिक जातियाँ सबसे पहले जाती हैं।
  • समय-चक्र बेमेल हो जाता है। पुष्पन, फलन, प्रजनन और प्रवास तापमान और वर्षा से प्रेरित होते हैं। यदि पौधा पहले पुष्पित हो जाए और उसका परागणकर्ता पुराने समय पर निकले, तो दोनों असफल रहते हैं। बैंगनी मेंढक केवल मानसून में प्रजनन के लिए बाहर आता है; मानसून खिसका तो उसका पूरा प्रजनन काल गड़बड़ा जाता है।
  • चरम घटनाएँ बढ़ती हैं। प्रबल चक्रवात, लंबे सूखे और भारी बाढ़ सीधे मारते भी हैं और पर्यावास भी नष्ट करते हैं — जैसे लोकटक झील के वे फुमडिस जिन पर संगाई हिरण निर्भर है।
  • महासागर और प्रवाल। गर्म और अधिक अम्लीय समुद्री जल प्रवालों को विरंजित कर देता है। प्रवाल भित्तियाँ, जैसे अध्याय के आरंभ में उल्लिखित अंडमान सागर की भित्तियाँ, असंख्य जातियों को आश्रय देती हैं; भित्ति गई तो वे सब गईं।
  • शृंखलाबद्ध क्षति। अध्याय सिद्धांत स्पष्ट कहता है: पृथ्वी से जब कोई एक जाति विलुप्त हो जाती है तो उस पर निर्भर अन्य जातियाँ भी धीरे-धीरे कम हो सकती हैं और अंततः विलुप्त भी हो सकती हैं। परागणकर्ता हटा दीजिए तो उसके पौधे असफल; पौधे गए तो शाकाहारी भी।
"तेज़ी" यहाँ मुख्य शब्द क्यों है: आज दिखती विविधता दीर्घकाल तक निरंतर होते परिवर्तनों का परिणाम है — छोटे-छोटे अंतर अनेक पीढ़ियों में संचित होते गए। अनुकूलन एक धीमी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली प्रक्रिया है। वर्तमान जलवायु परिवर्तन दशकों में हो रहा है। दीर्घजीवी, धीमी गति से प्रजनन करने वाली और पहले से दुर्लभ जातियाँ इस गति के साथ चल ही नहीं सकतीं, और सबसे पहले वही समाप्त होती हैं।
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