कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 2 क्रियाकलाप 2.2 के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन2026-09-08
प्र1.
आपने क्या अवलोकन किया?
उत्तर
आलू के दोनों टुकड़े विपरीत व्यवहार करते हैं।
बीकर
तरल
लगभग एक घंटे बाद प्रेक्षण
‘क’
साधारण जल
आलू के टुकड़े के आमाप में वृद्धि हो जाती है; वह अधिक दृढ़ लगता है
‘ख’
20 प्रतिशत नमक अथवा चीनी का घोल
आलू का टुकड़ा संकुचित हो जाता है; वह नरम और ढीला लगता है
जल सदा अधिक सांद्र विलयन की ओर जाता है, इसीलिए एक ही आलू बीकर ‘क’ में जल पाता है और बीकर ‘ख’ में खोता है।
सुझाव: दोनों टुकड़े लगभग समान आकार के कटे होने चाहिए और रखने से पहले तौले जाने चाहिए, अन्यथा अंतिम भार की तुलना किससे की जाएगी?
प्र2.
इससे आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं? उनके भार में परिवर्तन के संदर्भ में आप क्या अनुमान लगाते हैं?
उत्तर
बीकर ‘क’ के टुकड़े का भार बढ़ जाता है और बीकर ‘ख’ के टुकड़े का भार घट जाता है। इसके लिए उत्तरदायी प्रक्रिया परासरण है।
भार में वृद्धि (क) = अंतिम भार − प्रारंभिक भार → एक धनात्मक संख्या
भार में कमी (ख) = अंतिम भार − प्रारंभिक भार → एक ऋणात्मक संख्या
उदाहरण — क: 25.0 g → 27.2 g, परिवर्तन = +2.2 g
ख: 25.0 g → 22.6 g, परिवर्तन = −2.4 g
झिल्ली के पार केवल जल गया, अतः भार में परिवर्तन सीधे यह बताता है कि कितना जल भीतर आया या बाहर गया।
ऐसा क्यों होता है: आलू की कोशिकाओं की झिल्ली वरणात्मक रूप से पारगम्य है — वह जल को जाने देती है, चीनी या नमक के अणुओं को नहीं। बीकर ‘क’ में बाहर का जल कोशिका-रस से तनु है (जल अधिक, विलेय कम), अतः जल भीतर जाता है जब तक दोनों सांद्रताएँ पास न आ जाएँ। बीकर ‘ख’ में बाहर का 20 प्रतिशत घोल कोशिका-रस से कहीं अधिक सांद्र है, अतः जल बाहर जाता है। वरणात्मक पारगम्य झिल्ली के पार जल की इस शुद्ध गति को परासरण कहते हैं, जो वास्तव में जल का ही विसरण है। साधारण विसरण के लिए झिल्ली की आवश्यकता ही नहीं — कक्षा 8 में आपने जल में रंजक का फैलना (क्रियाकलाप 7.8) और वायु में सुगंध का फैलना (7.9) देखा था। परासरण उसी की विशेष स्थिति है जहाँ गति करने वाले कण जल के अणु हैं और बीच में वरणात्मक पारगम्य झिल्ली है।
क्या आप जानते हैं? पौधा ठीक इसी प्रकार जल पीता है। मृदा का जल तनु है, जड़ का कोशिका-रस सांद्र, अतः जल परासरण द्वारा जड़ की कोशिकाओं में प्रवेश करता है — न कोई पंप, न कोई ऊर्जा।
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