प्र1.
कोशिकाएँ संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी वृद्धि का अनुवीक्षण किस प्रकार करती हैं?
उत्तर
नई कोशिकाओं के बनने और पुरानी कोशिकाओं की सुनियोजित, नियंत्रित मृत्यु के बीच संतुलन बनाकर। इसकी मुख्य प्रक्रिया क्रमादेशित कोशिका मृत्यु (पी.सी.डी.) है।
- पी.सी.डी. कोशिका के वरणात्मक रूप से नष्ट होने की आनुवांशिकतः नियंत्रित और व्यवस्थित प्रक्रिया है — कोशिका निर्देश पर स्वयं को क्रमबद्ध ढंग से समेट लेती है, फटकर पड़ोसियों को हानि नहीं पहुँचाती।
- यह तीन कार्यों के लिए अनिवार्य है — सामान्य विकास, कोशिकीय गुणवत्ता नियंत्रण और प्रतिरक्षा कार्य।
- इसके साथ संपर्क अवरोध भी काम करता है — अनेक जंतु कोशिकाओं में पड़ोसी कोशिकाओं के संपर्क में आते ही विभाजन रुक जाता है, अतः ऊतक पूरा बनते ही बढ़ना बंद कर देता है।
- प्रत्येक कोशिका की एक निश्चित जीवन अवधि भी होती है। उदाहरण के लिए, परिपक्व लाल रक्त कोशिकाएँ लगभग 120 दिन जीवित रहती हैं और फिर प्रतिस्थापित हो जाती हैं।
कोशिका विभाजन की दर = कोशिका मृत्यु की दर → ऊतक का आमाप स्थिर
विभाजन > मृत्यु → अर्बुद
विभाजन < मृत्यु → ऊतक क्षीण
विभाजन > मृत्यु → अर्बुद
विभाजन < मृत्यु → ऊतक क्षीण
ऐसा क्यों होता है: पुस्तक का सबसे प्रभावी उदाहरण मानव हाथ है। भ्रूण के विकास के समय पी.सी.डी. विकसित हो रही अँगुलियों के बीच की कोशिकाओं को हटा देता है, और इसी प्रकार चप्पू जैसी कली में से अलग-अलग अँगुलियाँ तराशी जाती हैं — इसके बिना हमारे हाथ जालयुक्त होते। अतः यहाँ कोशिका मृत्यु क्षति नहीं, मूर्तिकार का औजार है। यही प्रक्रिया उन कोशिकाओं को भी हटाती है जिनके डीएनए में त्रुटि आ गई हो, इससे पहले कि वे कैंसरयुक्त बनें — इसीलिए पी.सी.डी. को गुणवत्ता नियंत्रण कहा जाता है। दोनों छोरों पर समस्या है — कोशिकाएँ समय पर न मरें तो अर्बुद बनते हैं, और बहुत जल्दी मर जाएँ तो ऊतक टूटने लगते हैं।