कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 2 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
कोष्ठक में दिए गए संकेतों के आधार पर निम्नलिखित युग्मों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए — (i) कोशिका झिल्ली और कोशिका भित्ति (पारगम्यता) (ii) रूक्ष अंतर्द्रव्यी जालिका और चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (संरचना) (iii) हरितलवक और वर्णीलवक (वर्णक)
उत्तर

(i) कोशिका झिल्ली और कोशिका भित्ति — पारगम्यता

कोशिका झिल्लीकोशिका भित्ति
पारगम्यतावरणात्मक रूप से पारगम्य — कुछ पदार्थों को जाने देती है, कुछ को रोकती हैपूर्णतः पारगम्य — जल और घुले हुए खनिज सीधे आर-पार जाते हैं
इसका अर्थजल पार जाता है; नमक और चीनी के अणु रुक जाते हैं, जिससे परासरण संभव होता हैकोई छँटाई नहीं करती; चयन ठीक भीतर स्थित झिल्ली पर छोड़ देती है
कहाँ उपस्थितप्रत्येक जीवित कोशिका मेंकेवल पादप, कवक और जीवाणु में

(ii) रूक्ष और चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका — संरचना

रूक्ष (खुरदुरी) अंतर्द्रव्यी जालिकाचिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका
सतहसतह पर राइबोसोम जुड़े होते हैं, अतः इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से खुरदुरी दिखती हैसतह पर राइबोसोम नहीं होते, अतः चिकनी दिखती है
मुख्य कार्यप्रोटीन संश्लेषण और प्रोटीन का स्रवण (जैसे अग्न्याशयी कोशिकाओं में ग्रंथि कोशिकाएँ)वसा और हार्मोन का संश्लेषण और भंडारण

(iii) हरितलवक और वर्णीलवक — वर्णक

हरितलवकवर्णीलवक
वर्णकपर्णहरित — हरा वर्णकपर्णहरित के अतिरिक्त वर्णक — पीले, नारंगी या लाल
वर्णक का कार्यप्रकाश-संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश का अवशोषणचटक रंग देना, जिससे परागणकारी और फल खाने वाले जंतु आकर्षित हों
कहाँपत्तियों और अन्य हरे भागों मेंफूलों की पंखुड़ियों और फलों में
ऐसा क्यों होता है: तीनों युग्मों में दोनों संरचनाएँ निकट संबंधी हैं और एक छोटा-सा अंतर ही कार्य तय कर देता है। झिल्ली और भित्ति दोनों सीमाएँ हैं, पर कोशिका की आंतरिक संरचना को केवल वरणात्मक सीमा ही नियंत्रित कर सकती है — पूर्ण पारगम्य भित्ति यह कभी नहीं कर पाती, इसीलिए दोनों साथ चाहिए। रूक्ष और चिकनी जालिका एक ही सतत जाल हैं; उसके एक भाग पर राइबोसोम जोड़ देने से वह भाग प्रोटीन की फैक्टरी बन जाता है। हरितलवक और वर्णीलवक दोनों लवक हैं; वर्णक बदलते ही भोजन की फैक्टरी संकेत-चिह्न बन जाती है।
प्र2.
दो समान जंतु कोशिकाओं को दो अलग-अलग विलयनों में रखा जाता है— कोशिका X को शुद्ध जल में रखा जाता है। कोशिका Y को नमक के सांद्र विलयन में रखा जाता है। कुछ समय पश्चात कोशिका X फूल जाती है और कोशिका Y संकुचित हो जाती है। निम्नलिखित में से कौन-सा कथन उपर्युक्त अवलोकनों का सही स्पष्टीकरण है? (i) नमक के अणु कोशिका Y में प्रवेश कर गए जिस कारण वह संकुचित हो गई। (ii) कोशिका X में जल प्रवेश कर गया और कोशिका Y से बाहर गए जल की मात्रा उसमें प्रवेश कर गए नमक के विलयन की मात्रा से अधिक थी। (iii) कोशिका झिल्ली के माध्यम से जल कोशिका X में प्रवेश कर गया और कोशिका Y से बाहर चला गया। (iv) विलेय के संचलन के कारण दोनों कोशिकाओं में परासरण हुआ।
उत्तर

सही स्पष्टीकरण है (iii) कोशिका झिल्ली के माध्यम से जल कोशिका X में प्रवेश कर गया और कोशिका Y से बाहर चला गया।

शुद्ध जल में कोशिका X: बाहर अल्पपरासारी → जल भीतर → कोशिका फूलती है
सांद्र नमक में कोशिका Y: बाहर अतिपरासारी → जल बाहर → कोशिका सिकुड़ती है
दोनों स्थितियों में झिल्ली के पार जाने वाला एकमात्र पदार्थ है जल

शेष विकल्प क्यों गलत हैं —

  • (i) गलत है क्योंकि नमक के अणु कोशिका झिल्ली के पार जाते ही नहीं — वह वरणात्मक रूप से पारगम्य है। और यदि नमक भीतर आता भी, तो भीतर की सांद्रता बढ़ाकर जल को भीतर खींचता, अतः कोशिका फूलती, सिकुड़ती नहीं।
  • (ii) इसी कारण गलत है — यह मान लेता है कि नमक का विलयन कोशिका में प्रवेश कर गया। कोशिका Y में कुछ भी प्रवेश नहीं किया।
  • (iv) गलत है क्योंकि परासरण परिभाषा से जल की गति है, विलेय की नहीं। विलेय की गति विसरण है, और यहाँ वह होती ही नहीं।
ऐसा क्यों होता है: संपूर्ण परासरण एक ही असमानता पर टिका है — झिल्ली विलायक के लिए खुली और विलेय के लिए बंद है। नमक हिलकर सांद्रताएँ बराबर नहीं कर सकता, अतः जल को ही हिलना पड़ता है। इस प्रश्न की दोनों कोशिकाएँ ठीक एक ही नियम मानती हैं; केवल सांद्रता के अंतर की दिशा उलटी है। यह भी ध्यान रखिए कि जंतु कोशिका पर क्या जोखिम है — कोशिका भित्ति न होने से कोशिका X शुद्ध जल में फूलती-फूलती फट भी सकती है।
प्र3.
चित्र 2.20 में एक कोशिका का चित्र देखिए। (क) से (छ) तक चिह्नित भागों की पहचान कीजिए और नीचे दिए गए कार्यों से उनका सही मिलान कीजिए— (i) कोशिका की सभी गतिविधियों का नियंत्रण करना। (ii) कोशिकीय श्वसन का स्थल। (iii) भंडारण कोशिकांग जो कोशिका को दृढ़ता भी प्रदान करता है। (iv) कोशिका के अवयवों को परिवेश से अलग करता है। (v) कोशिका को संरचनात्मक दृढ़ता प्रदान करता है। (vi) अंतर्द्रव्यी जालिका से प्राप्त सामग्री को पैक और संग्रहीत करता है। (vii) भोजन निर्माण में सहायता करता है।
उत्तर

चित्र 2.20 एक पादप कोशिका है — मोटी बाहरी भित्ति, हरितलवक और बड़ी रसधानी से यह स्पष्ट है।

चिह्नभागकार्य
(क)माइटोकॉन्ड्रिया(ii) कोशिकीय श्वसन का स्थल
(ख)केंद्रक(i) कोशिका की सभी गतिविधियों का नियंत्रण करना
(ग)गॉल्जी उपकरण(vi) अंतर्द्रव्यी जालिका से प्राप्त सामग्री को पैक और संग्रहीत करता है
(घ)हरितलवक(vii) भोजन निर्माण में सहायता करता है
(ङ)कोशिका भित्ति(v) कोशिका को संरचनात्मक दृढ़ता प्रदान करता है
(च)कोशिका झिल्ली(iv) कोशिका के अवयवों को परिवेश से अलग करता है
(छ)रसधानी(iii) भंडारण कोशिकांग जो कोशिका को दृढ़ता भी प्रदान करता है
(क) माइटोकॉन्ड्रिया (ख) केंद्रक (ग) गॉल्जी उपकरण (घ) हरितलवक (ङ) कोशिका भित्ति (च) कोशिका झिल्ली (छ) रसधानी
चित्र 2.20 के सात नामांकित भाग और उनमें से प्रत्येक का कार्य।
ऐसा क्यों होता है: सबसे कठिन युग्म (ङ) और (च) को दो संकेत अलग करते हैं। दोनों तीर सीमा की ओर हैं, पर (ङ) मोटी बाहरी नारंगी परत पर पहुँचता है और (च) ठीक उसके भीतर की पतली रेखा पर। इसे कार्यों के शब्दों से मिलाइए — “संरचनात्मक दृढ़ता प्रदान करता है” केवल दृढ़ सेल्युलोस भित्ति हो सकती है, जबकि “कोशिका के अवयवों को परिवेश से अलग करता है” उस सीमा का वर्णन है जो विनिमय को नियंत्रित करती है, अर्थात झिल्ली। कार्य (iii) पर भी ध्यान दीजिए — रसधानी भंडारण कोशिकांग भी है और दृढ़ता का स्रोत भी, क्योंकि उसमें संग्रहीत जल ही वह स्फीति दाब बनाए रखता है जो कोशिका को दृढ़ करता है।
प्र4.
निम्नलिखित में से कोशिकांगों के कौन-से युग्म दिए गए वर्गों से सही सुमेलित हैं? (i) अवर्णी लवक / कोशिका भित्ति (ii) माइटोकॉन्ड्रिया / राइबोसोम (iii) कोशिका भित्ति / गॉल्जी उपकरण (iv) लाइसोसोम / अंतर्द्रव्यी जालिका — जहाँ पहला स्तंभ ‘पादप कोशिका में उपस्थित’ और दूसरा ‘जंतु कोशिका में अनुपस्थित’ है।
उत्तर

केवल विकल्प (i) सही है — अवर्णी लवक पादप कोशिका में उपस्थित है और कोशिका भित्ति जंतु कोशिका में अनुपस्थित।

विकल्पपादप कोशिका में उपस्थित?जंतु कोशिका में अनुपस्थित?निर्णय
(i) अवर्णी लवक / कोशिका भित्तिहाँ — रंगहीन लवक जो स्टार्च, तेल या प्रोटीन संग्रहीत करता हैहाँ — जंतु कोशिका में केवल झिल्ली होती हैसही
(ii) माइटोकॉन्ड्रिया / राइबोसोमहाँनहीं — राइबोसोम जंतु कोशिकाओं में उपस्थित हैंगलत
(iii) कोशिका भित्ति / गॉल्जी उपकरणहाँनहीं — गॉल्जी उपकरण जंतु कोशिकाओं में उपस्थित हैगलत
(iv) लाइसोसोम / अंतर्द्रव्यी जालिकाचित्र 2.10 ख की पादप कोशिका में नहीं दिखाया गया; लाइसोसोम जंतु कोशिकाओं की विशेषता हैंनहीं — अंतर्द्रव्यी जालिका जंतु कोशिकाओं में उपस्थित हैगलत
ऐसा क्यों होता है: यह प्रश्न वास्तव में एक ही बात जाँचता है — कौन-सी संरचनाएँ केवल पादपों की हैं। इस अध्याय में ऐसी केवल तीन हैं — कोशिका भित्ति, लवक (हरितलवक, वर्णीलवक, अवर्णी लवक) और बड़ी केंद्रीय रसधानी। बाकी सब — माइटोकॉन्ड्रिया, राइबोसोम, अंतर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जी उपकरण, केंद्रक, कोशिका झिल्ली — पादप और जंतु दोनों में समान रूप से हैं, क्योंकि वे किसी भी सुकेंद्रकी कोशिका की सामान्य मशीनरी हैं। यह छोटी सूची याद रहे तो हर विकल्प क्षण भर में जाँचा जा सकता है।
प्र5.
दो विद्यार्थी, रेणु और रोहित लवकों पर चर्चा कर रहे थे। रेणु ने इस बात पर बल दिया कि पौधों के सभी भागों में यहाँ तक कि जड़ों में भी लवक होते हैं। यद्यपि रोहित इस कथन से सहमत नहीं था और उसने बताया कि पादप की जड़ों में लवक अनुपस्थित होते हैं क्योंकि जड़ें भूमिगत होती हैं और उन्हें प्रकाश-संश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं होती। कौन सही है? अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिए।
उत्तर

रेणु सही है। जड़ों में लवक होते हैं। रोहित ने लवक को उसके एक विशेष प्रकार, हरितलवक, से भ्रमित कर दिया है।

  • लवक कोशिकांगों का एक कुल है जिसके तीन सदस्य हैं — हरितलवक (हरा, प्रकाश-संश्लेषण के लिए), वर्णीलवक (पीला, नारंगी या लाल) और अवर्णी लवक (रंगहीन, भंडारण के लिए)।
  • जड़ों में हरितलवक नहीं होते क्योंकि भूमि के नीचे प्रकाश नहीं है और प्रकाश-संश्लेषण करना ही नहीं है — रोहित के तर्क का यह भाग ठीक है।
  • परंतु जड़ें अवर्णी लवकों से भरी होती हैं, जो स्टार्च, तेल और प्रोटीन संग्रहीत करते हैं। भोजन संग्रह करना जड़ का एक मुख्य कार्य ही है।
  • कुछ जड़ों में वर्णीलवक तक होते हैं। गाजर की जड़ नारंगी उसी में स्थित वर्णक के कारण होती है; चुकंदर और शकरकंद भी भूमि के नीचे ही रंगीन होते हैं।
लवक = हरितलवक + वर्णीलवक + अवर्णी लवक
जड़: हरितलवक अनुपस्थित, अवर्णी लवक उपस्थित, वर्णीलवक कभी-कभी उपस्थित
→ अतः जड़ों में लवक उपस्थित हैं
ऐसा क्यों होता है: लवक परस्पर परिवर्तनीय हैं — कोशिका का कार्य बदलने पर एक प्रकार दूसरे में बदल सकता है। इसीलिए धूप में रखा आलू हरा पड़ जाता है (अवर्णी लवकों में पर्णहरित बनकर वे हरितलवक बन जाते हैं) और पकने पर हरा टमाटर लाल हो जाता है (हरितलवक वर्णीलवक बन जाते हैं)। पूरा कुल एक ही उद्गम साझा करता है, इसलिए पादप कोशिका में किसी न किसी प्रकार के लवक लगभग सदा होते हैं; बदलता केवल यह है कि कौन-सा प्रकार। रोहित की भूल याद रखने योग्य है — “प्रकाश-संश्लेषण नहीं होता” से केवल इतना सिद्ध होता है कि हरितलवक नहीं हैं, यह नहीं कि लवक नहीं हैं।
स्वयं जाँचिए: कच्चे आलू या अरबी (कोलोकेशिया) की पतली फाँक पर आयोडीन विलयन की एक बूँद डालिए। वह नीली-काली हो जाती है, जो स्टार्च के कणों की उपस्थिति दर्शाती है — वही स्टार्च जो अवर्णी लवकों के भीतर संग्रहीत है।
प्र6.
माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक एक पादप कोशिका के दो महत्त्वपूर्ण कोशिकांग हैं। विवेचना कीजिए कि ये दोनों कोशिकांग संरचनात्मक और कार्यात्मक रूप से एक-दूसरे से किस प्रकार समान और भिन्न हैं?
उत्तर

समानताएँ

  • दोनों दोहरी झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग हैं।
  • दोनों में अपना डीएनए और अपने राइबोसोम होते हैं, अतः दोनों अपने कुछ प्रोटीन स्वयं बना सकते हैं।
  • दोनों की कुछ विशेषताएँ जीवाणुओं से मिलती-जुलती हैं, जो संकेत देती हैं कि दोनों एककोशिकीय जीवों के साथ एक विकासीय इतिहास साझा करते हैं।
  • दोनों ऊर्जा से जुड़े कोशिकांग हैं — एक ऊर्जा पकड़ता है, दूसरा उसे निर्मुक्त करता है। दोनों अपनी आंतरिक झिल्ली की सतह बढ़ाते हैं — एक में अंतःकटक, दूसरे में चक्रिका के आकार की झिल्लियाँ।
  • दोनों पादप कोशिका में पाए जाते हैं।

अंतर

माइटोकॉन्ड्रियाहरितलवक
वर्णककोई नहींपर्णहरित, एक हरा वर्णक
आंतरिक संरचनाभीतरी झिल्ली अँगुली जैसे अंतःकटक में अंतर्वलित; एक अंतरझिल्ली अवकाशअर्ध-तरल पीठिका जिसमें पर्णहरित युक्त चक्रिकाकार झिल्लीनुमा संरचनाएँ
प्रक्रियाकोशिकीय श्वसन — ग्लूकोस और अन्य अणु विघटित होते हैंप्रकाश-संश्लेषण — प्रकाश ऊर्जा अवशोषित होती है और शर्करा बनती है
ऊर्जासंचित रासायनिक ऊर्जा को एटीपी, ऊर्जा की मुद्रा, के रूप में निर्मुक्त करता हैप्रकाश ऊर्जा को शर्करा की रासायनिक ऊर्जा में बदलता है
उपस्थितिसभी सुकेंद्रकी कोशिकाओं में — पादप और जंतु दोनोंकेवल पादपों और कुछ अन्य प्रकाश-संश्लेषी जीवों में; वह भी केवल हरे भागों में
भंडारणभोजन संग्रहीत नहीं करताबनी शर्करा स्टार्च के कणों के साथ पीठिका में संग्रहीत होती है
हरितलवक: प्रकाश ऊर्जा + CO₂ + H₂O → शर्करा + O₂ (ऊर्जा संचित)
माइटोकॉन्ड्रिया: शर्करा + O₂ → एटीपी + CO₂ + H₂O (ऊर्जा निर्मुक्त)
ऐसा क्यों होता है: ये दोनों कोशिकांग एक ही चक्र के विपरीत आधे भाग हैं, और उनकी संरचना इसी को दर्शाती है। दोनों अपनी भीतरी झिल्ली को वलित करते हैं क्योंकि प्रकाश-संश्लेषण और श्वसन दोनों की अभिक्रियाएँ झिल्लियों पर होती हैं, अतः अधिक झिल्ली-क्षेत्र का अर्थ है अधिक दर। साझा विशेषताएँ — दोहरी झिल्ली, अपना डीएनए, अपने राइबोसोम — ही वह कारण हैं जिनसे जीवविज्ञानी मानते हैं कि दोनों कभी स्वतंत्र जीवाणु थे जो बाद में किसी बड़ी कोशिका के भीतर बस गए। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पादप कोशिका को दोनों क्यों चाहिए — हरितलवक सूर्य की ऊर्जा को केवल शर्करा में जमा कर सकता है, और उसे एटीपी के रूप में निकाल सकता है केवल माइटोकॉन्ड्रिया, जो कोशिका के हर अन्य भाग के लिए खर्च करने योग्य रूप है।
प्र7.
निम्नलिखित में से कोशिकांगों के कौन-से जोड़े में डीएनए होता है? (i) हरितलवक, राइबोसोम (ii) माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक (iii) गॉल्जी उपकरण, राइबोसोम (iv) केंद्रक, लाइसोसोम
उत्तर

सही जोड़ा है (ii) माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक।

कोशिकांगडीएनए है?उसके स्थान पर या साथ में क्या है
केंद्रकहाँडीएनए और विशेष प्रोटीन से बने गुणसूत्र; डीएनए के कार्यात्मक खंड जीन कहलाते हैं
माइटोकॉन्ड्रियाहाँअपना डीएनए और अपने राइबोसोम — यह अपने कुछ प्रोटीन स्वयं बनाता है
हरितलवकहाँइसमें भी अपना डीएनए और अपने राइबोसोम होते हैं
राइबोसोमनहींयह प्रोटीन संश्लेषण का स्थल है, डीएनए का भंडार नहीं
गॉल्जी उपकरणनहींप्रोटीन और लिपिड को रूपांतरित, वर्गीकृत और पुटिकाओं में पैक करता है
लाइसोसोमनहींपाचक एंजाइमों से भरा एकल झिल्ली-आबद्ध थैला

विकल्प (i), (iii) और (iv) में हर बार एक डीएनए-युक्त कोशिकांग के साथ एक ऐसा कोशिकांग जोड़ा गया है जिसमें डीएनए नहीं, अतः तीनों गलत हैं। ध्यान दीजिए कि हरितलवक में डीएनए होता है — विकल्प (i) केवल इसलिए गलत है क्योंकि राइबोसोम में नहीं होता।

ऐसा क्यों होता है: डीएनए वहीं चाहिए जहाँ प्रोटीन स्थानीय स्तर पर बनाने हों। केंद्रक कोशिका की मुख्य प्रति रखता है। माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक एक छोटा निजी समुच्चय इसलिए रखते हैं क्योंकि उनके पास अपने राइबोसोम भी हैं और वे अपने कुछ प्रोटीन वहीं बना लेते हैं — यही वह विशेषता है जो संकेत देती है कि वे प्राचीन स्वतंत्र जीवाणुओं के वंशज हैं। कोशिका का शेष सब कुछ अपने प्रोटीन कोशिकाद्रव्य से बने-बनाए पाता है, अतः उसे अपने डीएनए की आवश्यकता ही नहीं।
प्र8.
एक शोधकर्ता ने एक प्रयोग किया जिसमें उसने समान आकार की दो गाजरों का उपयोग किया। उसने एक गाजर को साधारण जल में और दूसरी को नमक के सांद्र विलयन में रखा (चित्र 2.21)। 24 घंटे के पश्चात उसने अपने अवलोकन अभिलेखित किए। (i) वह इस प्रयोग के माध्यम से कौन-सी परिकल्पना का परीक्षण करना चाहती है? (ii) इस प्रयोग में सुधार के लिए आप क्या सुझाव देंगे? (iii) साधारण जल में रखी हुई गाजर अनम्य (कठोर) और कड़क (कुरकुरी) रहती है लेकिन नमक के सांद्र विलयन में रखी हुई गाजर रबर जैसी लचीली एवं नरम क्यों हो जाती है?
उत्तर

(i) परिकल्पना। कि आस-पास के विलयन की सांद्रता के अनुसार जल परासरण द्वारा पादप कोशिकाओं में भीतर या बाहर जाता है — अतः तनु (अल्पपरासारी) माध्यम में रखी गाजर जल पाएगी और दृढ़ रहेगी, जबकि सांद्र (अतिपरासारी) माध्यम में रखी गाजर जल खोकर ढीली पड़ जाएगी।

(ii) सुधार के सुझाव।

  • दोनों गाजरों का ठीक मिलान कीजिए — समान द्रव्यमान और समान लंबाई के टुकड़े, एक ही आयु और किस्म की गाजर से।
  • 24 घंटे से पहले और बाद में प्रत्येक टुकड़े का भार और लंबाई मापिए, ताकि परिणाम एक अंक हो, केवल एक आभास नहीं। परिवर्तन अभिलेखित कीजिए — अंतिम द्रव्यमान − प्रारंभिक द्रव्यमान।
  • नमक की सांद्रता ठीक-ठीक बताइए (जैसे 20 प्रतिशत) और दोनों बीकरों में समान आयतन तरल लीजिए, दोनों गाजरें पूरी तरह डूबी रहें।
  • दोनों बीकर एक ही तापमान पर रखिए और ढक दीजिए, ताकि वाष्पन से कोई एक विलयन सांद्र न हो जाए।
  • प्रत्येक बीकर में तीन-चार गाजरों के साथ दोहराइए और औसत लीजिए — एक गाजर पर्याप्त प्रमाण नहीं है।
  • केवल अंत में नहीं, अंतरालों पर (मान लीजिए हर 4 घंटे) पाठ्यांक लीजिए, ताकि परिवर्तन की प्रगति भी दिखे।
  • तौलने से पहले दोनों टुकड़ों को एक ही ढंग से पोंछिए, ताकि सतह पर लगा जल न गिना जाए।

(iii) दोनों अलग क्यों लगती हैं।

साधारण जल: बाहर की विलेय सांद्रता < भीतर की (अल्पपरासारी)
→ परासरण द्वारा जल गाजर की कोशिकाओं में भीतर → रसधानियाँ भरीं → कोशिकाएँ स्फीत
→ प्रत्येक कोशिका अपनी दृढ़ भित्ति पर दबाव डालती है → ऊतक कठोर और कुरकुरा

सांद्र नमक: बाहर की विलेय सांद्रता > भीतर की (अतिपरासारी)
→ परासरण द्वारा जल बाहर → रसधानियाँ खाली → कोशिकाएँ शिथिल
→ भित्तियों पर कोई दबाव नहीं → ऊतक नरम, मुड़ने वाला और लचीला
ऐसा क्यों होता है: कुरकुरापन जल-दाब से उत्पन्न एक यांत्रिक गुण है। गाजर इसलिए चटकती है क्योंकि लाखों भरी हुई स्फीत कोशिकाएँ अपनी भित्तियों पर बाहर की ओर दबाव डालती हैं, जिससे ऊतक फूली हुई नलियों के बंडल जैसा व्यवहार करता है और मुड़ने के बजाय साफ टूटता है। जल खींच लीजिए और वही भित्तियाँ अब भी हैं, पर उन पर दबाव नहीं, अतः गाजर खाली नली की भाँति मुड़ जाती है। यही पृष्ठ 19 के प्रश्न 4 का मुरझाना है, और यही तब होता है जब कटी सब्जियों पर नमक डालने से जल रिसने लगता है।
प्र9.
जीवाणु और जंतु कोशिकाओं में निम्नलिखित संरचनाओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति इंगित कीजिए — गुणसूत्र, केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी उपकरण, वर्णीलवक।
उत्तर
कोशिका में संरचनाएँजीवाणु कोशिकाजंतु कोशिका
गुणसूत्रउपस्थितउपस्थित
केंद्रकअनुपस्थितउपस्थित
माइटोकॉन्ड्रियाअनुपस्थितउपस्थित
गॉल्जी उपकरणअनुपस्थितउपस्थित
वर्णीलवकअनुपस्थितअनुपस्थित

दो पंक्तियों पर स्पष्टीकरण आवश्यक है।

  • गुणसूत्र — जीवाणु कोशिका। आनुवंशिक पदार्थ निश्चित रूप से उपस्थित है, पर विभाजित होती सुकेंद्रकी कोशिका के छड़ाकार गुणसूत्रों के रूप में नहीं। पूर्वकेंद्रकी कोशिका में डीएनए विशेष प्रोटीन से संबद्ध एकल गोल अणु होता है जो केंद्रकाभ नामक क्षेत्र में बिना किसी झिल्ली के रहता है। इसे सामान्यतः जीवाणु गुणसूत्र कहते हैं, अतः प्रविष्टि “उपस्थित” है, पर उसका रूप बताना चाहिए।
  • वर्णीलवक। ये लवक हैं, और लवक केवल पादप कोशिकाओं में होते हैं। अतः इस तालिका के दोनों स्तंभों में ये अनुपस्थित हैं।
ऐसा क्यों होता है: पहली दो पंक्तियाँ साथ पढ़िए और पूरा पूर्वकेंद्रकी–सुकेंद्रकी भेद सामने आ जाता है। जीवाणु के पास आनुवंशिक पदार्थ है पर आनुवंशिक कक्ष नहीं — केंद्रक झिल्ली के बिना डीएनए। पंक्तियाँ 3 और 4 इसी सीमा से निकलती हैं — माइटोकॉन्ड्रिया और गॉल्जी उपकरण झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग हैं, और जो कोशिका आंतरिक झिल्लियाँ नहीं बना सकती उसमें ये हो ही नहीं सकते। जीवाणु फिर भी श्वसन करता है और प्रोटीन बनाकर बाहर भेजता है; वह यह सब कोशिकांगों के बजाय कोशिकाद्रव्य में और कोशिका झिल्ली पर करता है।
प्र10.
निम्नलिखित प्रयोग कीजिए — छिले हुए आलू के चार आधे-आधे भाग लीजिए और प्रत्येक में आलू को खोखला करके कप का आकार बनाइए। इनमें से एक कप उबले हुए आलू से बना होना चाहिए। प्रत्येक आलू के कप को जल से भरकर बीकर में रखिए (चित्र 2.22)। कप ‘क’ खाली रखिए; कप ‘ख’ में एक चम्मच चीनी डालिए; कप ‘ग’ में एक चम्मच नमक डालिए; कप ‘घ’ (उबले हुए आलू) में एक चम्मच चीनी डालिए। चारों आलू के कप का कम-से-कम दो घंटे तक अवलोकन कीजिए और उत्तर दीजिए — (i) कप ‘ख’ और कप ‘ग’ के खोखले भाग में जल क्यों जमा होता है? (ii) इस प्रयोग के लिए कप ‘क’ क्यों आवश्यक है? (iii) स्पष्ट कीजिए कि कप ‘क’ और ‘घ’ के खोखले भागों में पानी क्यों नहीं एकत्र होता है।
उत्तर

(i) कप ‘ख’ और ‘ग’ में जल क्यों जमा होता है।

खोखले भाग में चीनी (ख) या नमक (ग) + आलू की अपनी नमी → अत्यंत सांद्र विलयन
बीकर का जल = तनु
बीच में जीवित आलू की कोशिकाएँ = वरणात्मक रूप से पारगम्य अवरोध
→ जल बीकर से आलू के ऊतक होकर परासरण द्वारा खोखले भाग में जाता है
→ खोखला भाग धीरे-धीरे भर जाता है

आलू के कप की दीवार एक मोटी झिल्ली की भाँति व्यवहार करती है। जल सांद्रता प्रवणता के अनुदिश चलता है — तनु ओर से सांद्र ओर की ओर — और चीनी या नमक उलटी दिशा में नहीं आ सकते, अतः खोखले भाग में स्तर बढ़ता जाता है।

(ii) कप ‘क’ क्यों आवश्यक है। कप ‘क’ नियंत्रण है। यह ‘ख’ और ‘ग’ जैसा ही है, केवल इसका खोखला भाग खाली है, अतः कोई सांद्रता प्रवणता है ही नहीं। यदि ‘क’ में भी जल जमा हो जाता तो यह सिद्ध होता कि जल गुरुत्व या किसी रिसाव के कारण आलू से छनकर आ रहा है, और प्रयोग परासरण के विषय में कुछ न बताता। ‘क’ सूखा रहता है, इसीलिए हम निश्चित हो सकते हैं कि ‘ख’ और ‘ग’ में जल को चलाने वाली केवल सांद्रता का अंतर है — और कुछ नहीं।

(iii) ‘क’ और ‘घ’ के खोखले भाग सूखे क्यों रहते हैं।

कपस्थितिजल जमा न होने का कारण
‘क’कच्चा आलू, खोखला भाग खालीदोनों ओर समान रूप से तनु — कोई सांद्रता प्रवणता नहीं, अतः जल की कोई शुद्ध गति नहीं
‘घ’उबला आलू, खोखले भाग में चीनीउबालने से कोशिकाएँ मर जाती हैं और कोशिका झिल्लियाँ नष्ट हो जाती हैं, अतः ऊतक अब वरणात्मक रूप से पारगम्य नहीं रहा। परासरण के लिए जीवित झिल्ली चाहिए; उसके बिना चीनी बाहर विसरित हो जाती है और जल जमा नहीं होता
ऐसा क्यों होता है: प्रयोग इस प्रकार रचा गया है कि हर कप एक संभावित वैकल्पिक व्याख्या को काट दे। ‘ख’ और ‘ग’ प्रभाव दिखाते हैं; ‘क’ दिखाता है कि सांद्रता प्रवणता आवश्यक है; और ‘घ’ दिखाता है कि जीवित, अक्षुण्ण झिल्लियाँ आवश्यक हैं। दोनों नियंत्रणों में ‘घ’ अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि उबले आलू में भी कोशिका भित्तियाँ हैं और आकार तथा मोटाई भी वही है — बदला केवल इतना है कि झिल्लियाँ मृत हैं। ताप प्रोटीनों को विकृत कर देता है और लिपिड द्विपरत को अव्यवस्थित, और गेटकीपर के हट जाने पर ऊतक दोनों दिशाओं में रिसने लगता है।
सुझाव: ‘ख’ में चीनी और ‘ग’ में नमक कारण सहित रखे जाते हैं। यदि दोनों भर जाएँ तो आपने सिद्ध कर दिया कि प्रभाव सांद्रता पर निर्भर है, इस पर नहीं कि कौन-सा पदार्थ लिया गया।
प्र11.
उस युग्म की पहचान कीजिए जो कोशिकांग और उसके कार्य के साथ सुमेलित नहीं है। (i) राइबोसोम — प्रोटीन संश्लेषण (ii) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका — लिपिड और सेल्युलोस का संश्लेषण (iii) लाइसोसोम — बाह्य पदार्थों का पाचन
उत्तर

असुमेलित युग्म है (ii) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका — लिपिड और सेल्युलोस का संश्लेषण।

युग्मसही?कारण
(i) राइबोसोम — प्रोटीन संश्लेषणसहीराइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण के स्थल हैं, चाहे वे कोशिकाद्रव्य में मुक्त हों या जालिका से जुड़े
(ii) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका — लिपिड और सेल्युलोस का संश्लेषणगलतचिकनी जालिका वसा और हार्मोन के संश्लेषण और भंडारण में सम्मिलित है। सेल्युलोस यहाँ नहीं बनता — वह कोशिका भित्ति का कार्बोहाइड्रेट है जो ग्लूकोस इकाइयों से कोशिका झिल्ली पर जुड़ता है
(iii) लाइसोसोम — बाह्य पदार्थों का पाचनसहीलाइसोसोम एंजाइमों से भरे थैले हैं जो अवांछित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और क्षतिग्रस्त कोशिकांगों को विघटित करते हैं
ऐसा क्यों होता है: विकल्प (ii) का जाल यह है कि उसका आधा भाग सही है। चिकनी जालिका वास्तव में लिपिड बनाती है, अतः जल्दबाजी में पढ़ने वाला पूरा कथन मान लेता है। परंतु सेल्युलोस का स्थान झिल्ली के बाहर, कोशिका भित्ति में है, और वह अनेक ग्लूकोस इकाइयों के जुड़ने से बनता है — इस कार्य का चिकनी जालिका से कोई संबंध नहीं। यह भी याद दिलाने योग्य है कि चिकनी जालिका जंतु कोशिकाओं में भी होती है, जहाँ सेल्युलोस होता ही नहीं।
प्र12.
यदि किसी सुकेंद्रकी कोशिका से सभी माइटोकॉन्ड्रिया निकाल दिए जाएँ तो आप किस परिणाम की आशा करते हैं?
उत्तर

कोशिका के पास उपयोग योग्य ऊर्जा समाप्त हो जाएगी और वह मर जाएगी, क्योंकि उसमें और कुछ भी ऐसा नहीं जो ग्लूकोस में संचित ऊर्जा निर्मुक्त करके उसे एटीपी के रूप में पैक कर सके।

माइटोकॉन्ड्रिया नहीं → कोशिकीय श्वसन नहीं
→ कोशिका की ऊर्जा मुद्रा एटीपी नहीं
→ ऊर्जा माँगने वाली हर गतिविधि रुक जाती है

विशेष रूप से ये सब विफल हो जाएँगे —

  • झिल्ली के पार ऊर्जा-आधारित परिवहन रुक जाएगा, अतः कोशिका अपनी आंतरिक संरचना को परिवेश से भिन्न नहीं रख पाएगी।
  • राइबोसोम पर प्रोटीन संश्लेषण, तथा जालिका और गॉल्जी उपकरण द्वारा उनका पैकिंग और परिवहन रुक जाएगा।
  • कोशिका विभाजन रुक जाएगा, अतः न वृद्धि होगी न मरम्मत।
  • गति — जंतु में पेशी का सिकुड़ना, पक्ष्माभों का हिलना — तुरंत रुक जाएगी। शुक्राणु, जिसकी पूँछ में माइटोकॉन्ड्रिया भरे होते हैं, गतिहीन हो जाएगा।
  • सबसे अधिक ऊर्जा माँगने वाली कोशिकाएँ — हृदय पेशी, तंत्रिका कोशिकाएँ, वृक्क कोशिकाएँ — सबसे पहले विफल होंगी।
ऐसा क्यों होता है: इस स्थिति में पादप कोशिका भी बेहतर नहीं होगी, और यह बात सोचने योग्य है। उसके हरितलवक अब भी सूर्य का प्रकाश पकड़कर शर्करा बना सकते हैं, पर शर्करा केवल संचित ऊर्जा है; कोशिका उसे सीधे खर्च नहीं कर सकती। उसे एटीपी में — उस छोटे, तुरंत उपयोग योग्य पैकेट में जिसे कोशिका की हर प्रक्रिया स्वीकार करती है — केवल माइटोकॉन्ड्रिया बदलता है। अतः माइटोकॉन्ड्रिया रहित पादप कोशिका अपने ही भोजन के बीच भूखी रह जाएगी। कुछ विशेषीकृत कोशिकाएँ इसके बिना काम चला लेती हैं — परिपक्व लाल रक्त कोशिका में माइटोकॉन्ड्रिया नहीं होते और वह कोशिकाद्रव्य के कहीं कम कुशल पथ पर चलती है — पर कोई सामान्य कोशिका अधिक समय तक कार्य नहीं कर सकती।
प्र13.
मानव शरीर में अर्बुद के निर्माण को कौन-सी परिघटना रोकती या संदमित करती है? क्या पौधों में भी अर्बुद का विकास हो सकता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

वह परिघटना है संपर्क अवरोध — अनेक जंतु कोशिकाओं में कोशिका विभाजन उस समय रुक जाता है जब कोशिका अपनी निकटवर्ती कोशिकाओं के संपर्क में आती है।

स्वस्थ ऊतक: कोशिका विभाजित → संतति कोशिकाएँ रिक्त स्थान भरतीं → कोशिकाएँ पड़ोसियों को छूतीं → विभाजन रुक जाता है
कैंसर: संपर्क अवरोध खो गया → स्थान न होने पर भी विभाजन चलता रहा → अर्बुद

क्या पौधों में अर्बुद हो सकते हैं? पौधों में ऊतक की असामान्य, अनियंत्रित सूजन बन सकती है — पर वह मानव अर्बुद जैसी नहीं होती, और अंतर यह है।

जंतु (मानव) अर्बुदपादप में असामान्य वृद्धि
संपर्क अवरोधसामान्यतः उपस्थित; कैंसर में खो जाता हैदर्शाया ही नहीं जाता — पादप कोशिकाओं में यह कभी था ही नहीं, क्योंकि उनकी दृढ़ कोशिका भित्तियाँ उन्हें अलग रखती हैं
क्या कोशिकाएँ चल सकती हैं?हाँ — दुर्दम कोशिकाएँ आस-पास के ऊतक में प्रवेश कर अन्य अंगों तक फैलती हैंनहीं — प्रत्येक कोशिका अपनी भित्ति से अपने स्थान पर जुड़ी है, अतः वृद्धि स्थानीय ही रहती है
परिणामफैलने पर प्राणघातक हो सकता हैस्थानीय गाँठ या पिंड; पौधा प्रायः जीवित रहता है
ऐसा क्यों होता है: पूरी तुलना की कुंजी कोशिका भित्ति है। चूँकि पादप कोशिकाएँ संपर्क अवरोध नहीं दर्शातीं, वे वृद्धि के एक भिन्न प्रतिरूप का अनुसरण करती हैं और उनका नियंत्रण अन्य साधनों से होता है — मुख्यतः उन रासायनिक संकेतों से जो तय करते हैं कि पौधा कहाँ बढ़े। और चूँकि वही दृढ़ भित्तियाँ हर कोशिका को उसके पड़ोसी से चिपकाए रखती हैं, पादप कोशिका भौतिक रूप से टूटकर किसी दूसरे अंग तक जा ही नहीं सकती। इसीलिए मानव कैंसर की सबसे खतरनाक विशेषता, उसका फैलना, पादपों में नहीं मिलती। मनुष्यों में अर्बुद को रोकने में दो सुरक्षा-तंत्र साथ काम करते हैं — संपर्क अवरोध, जो स्थान न होने पर विभाजन रोकता है, और क्रमादेशित कोशिका मृत्यु, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को कैंसरयुक्त बनने से पहले ही हटा देती है।
प्र14.
कोशिका की कोशिका झिल्ली प्रोटीन और लिपिड से निर्मित होती है। बताइए कि कोशिका झिल्ली के संश्लेषण में कौन-से कोशिकांग सहायता करते हैं? इन यौगिकों के संश्लेषण के स्थान से कोशिका झिल्ली तक के पथ को लिखिए और इसे एक नामांकित चित्र के द्वारा दर्शाइए।
उत्तर

इसमें चार कोशिकांग सम्मिलित हैं — राइबोसोम, रूक्ष अंतर्द्रव्यी जालिका, चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका और गॉल्जी उपकरण

कोशिकांगइसका योगदान
राइबोसोम (रूक्ष जालिका पर)झिल्ली के प्रोटीन संश्लेषित करते हैं
रूक्ष अंतर्द्रव्यी जालिकाउन प्रोटीनों को ग्रहण कर आगे भेजती है
चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिकाद्विपरत के लिपिड (वसा) संश्लेषित करती है
गॉल्जी उपकरणप्रोटीन और लिपिड को रूपांतरित, वर्गीकृत और पुटिकाओं में पैक करता है

पथ —

रूक्ष जालिका पर राइबोसोम (प्रोटीन)  +  चिकनी जालिका (लिपिड)
→ जालिका से परिवहन पुटिका अलग होती है
गॉल्जी उपकरण — रूपांतरण, वर्गीकरण, पैकिंग
→ गॉल्जी से स्रवण पुटिका अलग होती है
→ पुटिका सतह तक जाकर कोशिका झिल्ली से जुड़ जाती है
→ उसकी अपनी झिल्ली कोशिका झिल्ली का भाग बन जाती है
केंद्रक रूक्ष जालिका — प्रोटीन चिकनी जालिका — लिपिड गॉल्जी उपकरण रूपांतरण · वर्गीकरण · पैकिंग पुटिकाएँ कोशिका झिल्ली
झिल्ली के प्रोटीन रूक्ष जालिका पर और लिपिड चिकनी जालिका पर बनते हैं; दोनों पुटिकाओं में गॉल्जी उपकरण तक जाते हैं, वहाँ पैक होते हैं, और अंत में पुटिकाएँ कोशिका झिल्ली से जुड़कर उन्हें वहाँ पहुँचा देती हैं।
ऐसा क्यों होता है: इस पथ का सबसे सुंदर भाग अंतिम चरण है। पुटिका अपनी सामग्री को झिल्ली के आर-पार धकेलती नहीं — वह स्वयं झिल्ली की एक छोटी बंद थैली है, अतः कोशिका झिल्ली से जुड़ते ही उसकी अपनी लिपिड द्विपरत कोशिका-सतह की द्विपरत में मिल जाती है, और उसके प्रोटीन वहीं सही दिशा में अंतःस्थापित हो जाते हैं। इसी प्रकार झिल्ली बिना कभी खुले बढ़ती रहती है। यह भी स्पष्ट होता है कि जालिका को केंद्रक आवरण की बाहरी झिल्ली से सतत क्यों कहा जाता है — केंद्रक आवरण, जालिका, गॉल्जी, पुटिकाएँ और कोशिका झिल्ली मिलकर एक ही जुड़ा हुआ झिल्ली-तंत्र हैं जिसमें सामग्री एक ही दिशा में बहती है।
प्र15.
यदि युग्मक समसूत्री विभाजन द्वारा बनाए जाएँ तो क्या होगा?
उत्तर

गुणसूत्रों की संख्या प्रत्येक पीढ़ी में दोगुनी होती जाएगी, और जाति जीवित नहीं रह पाएगी।

सामान्य (अर्धसूत्री विभाजन):
जनक कोशिका 46 → युग्मक 23 ; 23 (शुक्राणु) + 23 (अंडाणु) = 46 — संख्या पुनर्स्थापित

यदि युग्मक समसूत्री विभाजन से बनें:
युग्मक = 46 (जनक कोशिका के बराबर)
46 + 46 = संतान में 92
अगली पीढ़ी: 92 + 92 = 184
फिर 368, 736, … संख्या हर पीढ़ी में दोगुनी
अर्धसूत्री विभाजन से (सामान्य) यदि युग्मक समसूत्री से बनें 46 46 23 23 46 46 46 46 46 92 गुणसूत्र संख्या 46 पर स्थिर हर पीढ़ी में दोगुनी
अर्धसूत्री विभाजन निषेचन से पहले गुणसूत्र संख्या आधी कर देता है, अतः जाति की संख्या स्थिर रहती है। समसूत्री विभाजन से बने युग्मक उसे हर बार दोगुना कर देते।

परिणाम ये होते —

  • गुणसूत्र संख्या स्थिर नहीं रहती। प्रत्येक जाति की एक निश्चित संख्या होती है जिसे संभालने के लिए उसकी कोशिकाएँ बनी हैं। दोगुना होने पर कोशिका विभाजन की मशीनरी ही टूट जाती, और ऐसे अधिकांश भ्रूण जीवित न रहते।
  • गंभीर असामान्यताएँ और बंध्यता। गुणसूत्रों के अतिरिक्त समुच्चय का अर्थ है हर जीन की अतिरिक्त प्रतियाँ, जिससे जीन-उत्पादों का संतुलन बिगड़ जाता।
  • विविधता कहीं कम। अर्धसूत्री विभाजन माता-पिता के गुणसूत्रों को मिलाता है; इसीलिए बच्चे माता-पिता से मिलते-जुलते होते हैं पर पूर्णतः उनके जैसे नहीं। समसूत्री युग्मक जनक के संयोजन ज्यों के त्यों आगे बढ़ाते, और वह विविधता समाप्त हो जाती जो किसी समष्टि को अनुकूलन का अवसर देती है।
ऐसा क्यों होता है: अर्धसूत्री विभाजन ठीक इसी समस्या को हल करने के लिए है। लैंगिक जनन दो कोशिकाओं को जोड़ता है, अतः प्रत्येक की संख्या पहले आधी होनी चाहिए, अन्यथा केवल जोड़ ही संख्या को बेकाबू कर देता। इसीलिए अर्धसूत्री विभाजन का पहला विभाजन गुणसूत्र संख्या को आधा करता है, और दूसरा केवल समसूत्री जैसा होता है — आधा करना एक ही बार आवश्यक है और ठीक एक ही बार होना चाहिए।
प्र16.
दीपा नामक एक कृषक अपने खेत में आँवले और नींबू की पैदावार से बहुत प्रसन्न थी। यद्यपि वह स्थानीय बाजार में अपनी उपज के मात्र एक-चौथाई भाग को ही बेच सकी। तथापि यह अनुमान लगाते कि फसल संग्रह के बाद अधिक मात्रा में उत्पाद नष्ट हो सकता है, उसने आँवलों और नींबू की निधानी आयु (shelf life) अवधि को बढ़ाने के लिए एक पारंपरिक किंतु वैज्ञानिक रूप से सही विधि अपनाई। उसने विकारीय उत्पाद (perishable produce) को लाभदायक उत्पादों, जैसे — अचार और शरबत में परिवर्तित किया। उसने अतिरिक्त उपज का उपयोग करके फलों के छोटे-छोटे टुकड़ों और उनके रस में उपयुक्त मात्रा में नमक, चीनी या गुड़ मिलाकर अचार, मुरब्बा और शरबत तैयार किए। इन्हें बिक्री के लिए छोटी काँच की बोतलों में संग्रहीत किया गया जिससे कटाई के पश्चात उपज को व्यर्थ होने से बचाने में सहायता मिली। उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए — (i) कृषक ने खेत उत्पाद के संरक्षण में कौन-सी वैज्ञानिक अवधारणा का उपयोग किया है? (ii) नमक और चीनी के उच्च सांद्रता में मिलाने से किस प्रकार एक ऐसा पर्यावरण बनता है जो भोजन को दूषित करने वाले जीवाणुओं और कवकों की वृद्धि को रोकता है? (iii) इस प्रकार के खाद्य परिरक्षण के लिए एक स्वास्थ्यवर्धक पाकविधि सुझाइए। (iv) उपर्युक्त स्थिति में कौन-से वैज्ञानिक मूल्यों पर ध्यान दिया गया है?
उत्तर

(i) वैज्ञानिक अवधारणा। परासरण — और उसी के साथ अतिपरासारी माध्यम का विचार। दीपा फल को ऐसे विलयन से घेर देती है जो किसी भी सूक्ष्मजीव की कोशिका की अंतर्वस्तु से कहीं अधिक सांद्र है, अतः सूक्ष्मजीवों से जल खिंच जाता है और वे बढ़ नहीं पाते।

(ii) नमक और चीनी जीवाणुओं और कवकों को कैसे रोकते हैं।

नमक या चीनी उच्च सांद्रता में मिलाई गई
→ भोजन के चारों ओर का विलयन प्रबल रूप से अतिपरासारी हो जाता है
→ जीवाणु और कवक की कोशिकाओं से उनकी वरणात्मक पारगम्य झिल्लियों के पार जल बाहर निकलता है
→ कोशिकाएँ सिकुड़ जाती हैं और जीवद्रव्यकुंचित होती हैं; झिल्ली भित्ति से हट जाती है
→ एंजाइम अभिक्रियाओं के लिए भीतर लगभग कोई मुक्त जल नहीं बचता
→ सूक्ष्मजीव न बढ़ सकते हैं, न गुणन कर सकते हैं, न भोजन दूषित कर सकते हैं
  • यही खिंचाव भोजन से भी मुक्त जल हटा देता है, और जिस भोजन में उपलब्ध जल कम हो उसमें सूक्ष्मजीव पनप नहीं सकते — इसीलिए अच्छी तरह बना अचार या मुरब्बा महीनों चलता है।
  • ध्यान दीजिए कि सूक्ष्मजीव प्रायः मरते नहीं; वे बस ऐसी अवस्था में रोक दिए जाते हैं जहाँ वे कार्य नहीं कर सकते। अचार का पानी पतला कर दीजिए और खराब होना फिर आरंभ हो जाएगा।

(iii) एक स्वास्थ्यवर्धक पाकविधि।

नमूना उत्तर — गुड़ से बना आँवला मुरब्बा (कम परिष्कृत चीनी वाला रूप)
  1. 500 g ताजा आँवला धोइए, हर फल को काँटे से चारों ओर गोदिए और 4–5 मिनट भाप या हल्के उबाल में नरम कीजिए।
  2. लगभग 400 g गुड़ को 250 mL जल में घोलकर उबालिए और छानकर अशुद्धियाँ हटा दीजिए।
  3. आँवले डालकर तब तक पकाइए जब तक चाशनी गाढ़ी होकर फलों पर चढ़ न जाए। सांद्रता इतनी होनी चाहिए कि माध्यम अतिपरासारी बना रहे।
  4. स्वाद के लिए एक चुटकी इलायची, कुछ केसर के धागे और सोंठ का छोटा टुकड़ा डालिए, तथा थोड़ा नींबू का रस, जिसकी अम्लीयता सूक्ष्मजीवों के विरुद्ध दूसरी बाधा बनती है।
  5. पूरी तरह ठंडा कीजिए, स्वच्छ, सूखी और निर्जर्मीकृत काँच की बोतल में भरिए, और फल को चाशनी में पूरी तरह डूबा रखिए। सदा सूखा चम्मच ही उपयोग कीजिए।

यह अधिक स्वास्थ्यवर्धक क्यों है — परिष्कृत चीनी के स्थान पर गुड़ में कुछ लोहा और खनिज बचे रहते हैं, आँवला विटामिन C का सबसे समृद्ध प्राकृतिक स्रोतों में से है, और इसमें कोई रासायनिक परिरक्षक या कृत्रिम रंग नहीं। नींबू के रस, हल्दी और सरसों के तेल के साथ धूप में सुखाया कम नमक वाला नींबू का अचार भी इसी सिद्धांत पर काम करता है।

(iv) वैज्ञानिक मूल्य जिन पर ध्यान दिया गया।

  • वैज्ञानिक ज्ञान का वास्तविक जीवन में उपयोग — कृषि की एक समस्या हल करने के लिए परासरण का प्रयोग।
  • पारंपरिक ज्ञान का सम्मान, विज्ञान द्वारा परखा हुआ — अचार और मुरब्बा पुरानी भारतीय प्रथाएँ हैं, और इस अध्याय का विज्ञान ठीक-ठीक बताता है कि वे क्यों काम करती हैं।
  • संधारणीयता और अपशिष्ट की रोकथाम — जो उपज सड़ जाती, वह उत्पाद बन गई।
  • खाद्य सुरक्षा — मौसमी फल पूरे वर्ष उपलब्ध हो गया।
  • उद्यमशीलता और आत्मनिर्भरता — मूल्य-संवर्धन से कृषक की आय बढ़ती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है।
  • स्वच्छता और सुरक्षा — स्वच्छ, सूखी, निर्जर्मीकृत बोतलें और सही सांद्रता; लापरवाही से फफूँदी लग जाती।
  • अवलोकन और तर्क — कटाई के बाद होने वाली हानि को पहचानना और उसके कारण पर कार्य करना।
ऐसा क्यों होता है: यह वही भौतिकी है जो पृष्ठ 11 पर बीकर ‘ख’ के आलू और प्रश्न 8 की सिकुड़ी गाजर में थी — बस अब जल खोने वाली कोशिका आलू की नहीं, किसी जीवाणु या कवक के बीजाणु की है। इसीलिए नमक या चीनी से परिरक्षण में न बिजली चाहिए, न कोई रसायन; बस परिवेश इतना सांद्र बना रहे कि कोई सूक्ष्मजीव अपना जल थामे ही न रख सके।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ