प्र1.
चित्र 5.9 को ध्यानपूर्वक देखिए। यह दर्शाता है कि समुद्री जल से नमक के क्रिस्टल किस प्रकार प्राप्त किए जाते हैं। इस प्रक्रिया का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर
समुद्री जल → संतृप्त विलयन → नमक के क्रिस्टल। यह विलायक के वाष्पीकरण से चलने वाला क्रिस्टलीकरण है, जो तटवर्ती क्षेत्रों में उथले नमक-पानों में विशाल पैमाने पर किया जाता है।
- समुद्री जल को उथले पानों में भरा जाता है। समुद्री जल एक तनु विलयन है — प्रत्येक 100 g जल में लगभग 3.5 g घुले लवण — अतः आरंभ में वह संतृप्तता से बहुत दूर होता है। पान चौड़े और उथले बनाए जाते हैं जिससे बहुत बड़ा पृष्ठ धूप और हवा के संपर्क में रहे।
- जल वाष्पित होता है और खारा जल संतृप्त विलयन बन जाता है। जल के अणु पृष्ठ से निकलते रहते हैं, परंतु नमक नहीं निकल सकता; अतः विलायक का द्रव्यमान घटता जाता है जबकि विलेय का वही रहता है और सांद्रता लगातार बढ़ती जाती है। जब उस तापमान पर जल और नमक नहीं रख सकता, तो खारा जल संतृप्त हो जाता है।
- आगे वाष्पीकरण से नमक के क्रिस्टल निक्षेपित होते हैं। इसके बाद उड़ने वाला प्रत्येक ग्राम जल उतना नमक पीछे छोड़ जाता है जिसे वह अब धारण नहीं कर सकता, और यह अतिरिक्त नमक पान के तल पर घनाकार क्रिस्टलों के रूप में जम जाता है। इन्हें बटोरकर, धोकर और सुखाकर उपयोग में लाया जाता है।
शीतलन के स्थान पर वाष्पीकरण क्यों: शीतलन केवल उसी विलेय के लिए उपयोगी है जिसकी विलेयता तापमान के साथ तीव्रता से बदलती हो। साधारण नमक 10 °C पर लगभग 36 g प्रति 100 g जल घुलता है और 80 °C पर भी केवल लगभग 37 g (तालिका 5.4) — वक्र व्यावहारिक रूप से सपाट है। अतः समुद्री जल को ठंडा करने से लगभग कोई क्रिस्टल नहीं मिलेगा। एकमात्र कार्यकारी उपाय विलायक को हटाना है, और यह कार्य सूर्य नि:शुल्क कर देता है।
क्या आप जानते हैं? भारत के तटों पर यह एक प्राचीन कौशल था: करकच नमक समुद्री जल के वाष्पीकरण से और पंगा नमक सांद्र समुद्री खारे जल को उबालकर बनाया जाता था — दोनों विधियों से भिन्न-भिन्न आकार के क्रिस्टल मिलते थे।