प्र1.
क्या आपने कभी किसी ऐसे स्थान का भ्रमण किया है जहाँ प्रकृति में बड़े-बड़े क्रिस्टल दिखाई दिए हों?
उत्तर
प्राकृतिक क्रिस्टल वहीं बनते हैं जहाँ खनिजों से भरा विलयन बहुत लंबे समय तक स्थिर पड़ा रहे — गुफाओं में, खदानों में और भू-पर्पटी के भीतर।
नमूना उत्तर: विद्यालय की यात्रा में हम मेघालय के सोहरा (चेरापूंजी) स्थित मावसमाई गुफा (चित्र 5.10 क) गए थे। चूना-पत्थर की छत से टपकता जल घुले हुए कैल्सियम यौगिक साथ लाता है। प्रत्येक बूँद छत पर लटकी रहकर धीरे-धीरे जल और कार्बन डाइऑक्साइड खोती है, विलयन संतृप्त हो जाता है और थोड़ा-सा ठोस निक्षेपित हो जाता है। हजारों वर्षों में ये निक्षेप ऊपर से लटकते स्तंभों और तल से उठते स्तंभों का रूप ले लेते हैं। स्फटिक (चित्र 5.10 ख), अपने स्वच्छ छह-फलकीय नुकीले क्रिस्टलों के साथ, खदानों और चट्टानों की गुहाओं में मिलने वाला एक और सुंदर उदाहरण है।
प्रकृति हमसे बेहतर क्रिस्टल क्यों बनाती है: क्रिस्टल का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितने धीरे बढ़ा। प्रयोगशाला में हम विलयन को एक घंटे में ठंडा करते हैं; गुफा में विलयन शताब्दियों तक बूँद-बूँद पहुँचता रहता है। अत्यंत धीमी वृद्धि का अर्थ है बहुत कम केंद्र और प्रत्येक को नियमित ज्यामितीय प्रतिरूप में कण जोड़ने के लिए असीमित समय — इसीलिए प्राकृतिक क्रिस्टल विशाल और अत्यंत सुरूपित हो सकते हैं।
यह कीजिए: यदि गुफा तक जाना संभव न हो तो बाजार से सेंधा नमक, मिश्री, फिटकरी अथवा स्फटिक लेकर आवर्धक लेंस से देखिए। जो आकार दिखे उसका चित्र बनाइए — प्रत्येक यौगिक का अपना विशिष्ट क्रिस्टल-आकार होता है।