कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 5 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
क्रियाकलाप 5.2 में दिए गए विलेयता वक्रों का संदर्भ लीजिए। यदि यौगिक ‘क’ और ‘ख’ के गर्म, संतृप्त विलयनों के समान द्रव्यमान को 80°C से 60°C तक ठंडा किया जाए, तो किस विलयन से अधिक ठोस निक्षेपित होने की संभावना है?
उत्तर

यौगिक ‘ख’ के विलयन से कहीं अधिक ठोस निक्षेपित होगा।

चरण 1 — चित्र 5.6 से विलेयताएँ पढ़िए (प्रति 100 g जल में g में):

यौगिक ख: 80 °C पर ≈ 360 g   60 °C पर = 287 g
यौगिक क: 80 °C पर ≈ 66 g   60 °C पर ≈ 56 g

चरण 2 — प्रति 100 g जल पर निक्षेपित ठोस

यौगिक ख: 360 g − 287 g ≈ 73 g
यौगिक क: 66 g − 56 g ≈ 10 g

चरण 3 — प्रश्न में विलयन का समान द्रव्यमान कहा गया है, अतः 100 g विलयन के लिए निकालिए

ख: 100 g जल + 360 g विलेय = 460 g विलयन
   निक्षेप = (73 g ÷ 460 g) × 100 g ≈ 15.9 g प्रति 100 g विलयन
क: 100 g जल + 66 g विलेय = 166 g विलयन
   निक्षेप = (10 g ÷ 166 g) × 100 g ≈ 6.0 g प्रति 100 g विलयन

दोनों प्रकार की गणना एक ही निष्कर्ष देती है: ‘ख’ से अधिक निक्षेप होता है — समान द्रव्यमान के विलयन के लिए लगभग 2.6 गुना अधिक।

ऐसा क्यों होता है: क्रिस्टलों की मात्रा यह नहीं तय करती कि कोई यौगिक कितना घुलता है, बल्कि यह कि ठंडा होने पर उसकी विलेयता कितनी तीव्रता से गिरती है। ‘ख’ का वक्र 80 °C से 60 °C के बीच तेजी से गिरता है, अतः बड़ी मात्रा में अतिरिक्त विलेय बाहर आ जाता है। ‘क’ का वक्र लगभग सपाट है, अतः कुछ भी नाममात्र ही पृथक होता है। इसी कारण पोटैशियम नाइट्रेट जैसे तीव्र ढाल वाले यौगिक क्रिस्टलीकरण से शुद्ध किए जाते हैं, जबकि सोडियम क्लोराइड जैसे लगभग सपाट वक्र वाले पदार्थ विलायक को वाष्पित करके प्राप्त किए जाते हैं।
संकेत: ग्राफ से पढ़े गए मान सन्निकट होते हैं। इन्हें “लगभग 360 g” लिखिए, “360.0 g” नहीं — चित्र 5.6 पर केवल 287 g और 241 g ही ठीक-ठीक अंकित हैं।
प्र2.
वाष्पीकरण की दर बढ़ाने अथवा घटाने पर साधारण नमक के क्रिस्टलों के आकार में क्या कोई परिवर्तन होगा? व्याख्या कीजिए।
उत्तर

हाँ। धीमे वाष्पीकरण से बड़े क्रिस्टल बनते हैं और तीव्र वाष्पीकरण से अनेक छोटे-छोटे क्रिस्टल।

वाष्पीकरण की दरविलयन में क्या होता हैप्राप्त क्रिस्टल
धीमी (उथला पात्र, मंद धूप, स्थिर वायु)विलयन धीरे-धीरे संतृप्तता पार करता है, अतः कम केंद्र बनते हैं और प्रत्येक बढ़ता रहता हैकम, बड़े और सुरूपित क्रिस्टल
तीव्र (तेज तापन, शुष्क हवा, पतली परत)विलयन एकाएक संतृप्तता से बहुत आगे निकल जाता है, अतः एक साथ बहुत अधिक केंद्र बन जाते हैंअनेक छोटे, कुरूप क्रिस्टल
ऐसा क्यों होता है: प्राप्त होने वाले नमक का कुल द्रव्यमान इस बात से तय होता है कि कितना घुला था — वाष्पीकरण की दर उसे नहीं बदल सकती। दर केवल यह बदलती है कि वह नियत द्रव्यमान कितने क्रिस्टलों में बँटता है। तीव्र वाष्पीकरण अनेक वृद्धि-केंद्र बना देता है, अतः प्रत्येक को थोड़ा ही भाग मिलता है; धीमा वाष्पीकरण कम केंद्र बनाता है, अतः प्रत्येक बड़ा हो जाता है। कणों को क्रिस्टल के नियमित ज्यामितीय प्रतिरूप में सज्जित होने के लिए समय भी चाहिए, जो तीव्र वाष्पीकरण नहीं देता।
क्या आप जानते हैं? भारत के नमक-निर्माता यह बात विज्ञान लिखे जाने से बहुत पहले से जानते थे: करकच नमक समुद्री जल के उथले पानों में धीमे वाष्पीकरण से बनता था, जबकि पंगा नमक सांद्र खारे जल को उबालकर — और दोनों विधियों से स्पष्ट रूप से भिन्न आकार के क्रिस्टल मिलते थे।
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