प्र1.
अब विचार कीजिए यदि हम विलायक को भी पुनः प्राप्त करना चाहते हैं तो इसके लिए हमें क्या करना होगा?
उत्तर
साधारण वाष्पीकरण के स्थान पर आसवन का उपयोग कीजिए।
वाष्पीकरण: विलयन → विलेय प्राप्त, विलायक वायु में विलुप्त
आसवन: विलयन → विलेय फ्लास्क में शेष तथा विलायक संघनित होकर एकत्रित
आसवन: विलयन → विलेय फ्लास्क में शेष तथा विलायक संघनित होकर एकत्रित
यह क्यों कार्य करता है: दोनों विधियों का पहला चरण एक ही है — विलायक वाष्प बनकर उड़ता है। अंतर आगे है। वाष्पीकरण में यह वाष्प कमरे में बिखर जाती है। आसवन में उसे संघनित्र में ले जाया जाता है, जहाँ बहता हुआ ठंडा जल उसकी गुप्त ऊष्मा हर लेता है, वह पुनः द्रव बन जाती है और एकत्रण-पात्र में टपकती है। कुछ भी नष्ट नहीं होता, अतः दोनों घटक शुद्ध रूप में प्राप्त हो जाते हैं।
क्या आप जानते हैं? शिविर में लगाया गया आसवन उपकरण इसी प्रकार खारे अथवा पंकिल जल से पीने योग्य जल देता है: जल उबलकर वाष्प बनता है और संघनित होकर एकत्रित हो जाता है, जबकि नमक और मैल पात्र में ही रह जाते हैं।